बाइपोलर पर्सनैलिटी या बाइपोलर डिसऑर्डर एक मानसिक विकार है, जिसमें व्यक्ति के व्यवहार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है. इसे पहले मैनिक-डिप्रेसिव इलनेस के नाम से जाना जाता था, जिसमें व्यक्ति के मूड, ऊर्जा और कार्य करने की क्षमता में अत्यधिक उतार-चढ़ाव आते हैं.

बाइपोलर डिसऑर्डर में मरीज़ का दिमाग़ दो एकदम अलग छोरों यानी बहुत ज़्यादा ख़ुश होना और डिप्रेशन के बीच घूमता रहता है. आमतौर पर लोगों को लगता है कि यह सामान्य मूड स्विंग्स है, लेकिन इसमें मरीज़ का ख़ुद के इमोशंस पर कोई कंट्रोल नहीं रहता. इस संदर्भ में सीनियर कंसल्टेंट न्यूरो सर्जन डॉक्टर राज कुमार जी से विस्तृत जानकारी दी.
बाइपोलर डिसऑर्डर क्या है?
इसे आसान भाषा में समझें तो जब कोई व्यक्ति एक ही समय में ख़ुश हो और उसी समय आत्महत्या करने को उतारू हो जाए, तो इसे बाइपोलर पर्सनैलिटी कहते हैं. यही वजह है कि यह बीमारी किसी लाइलाज रोग से कम नहीं है. इसमें मरीज़ का माइंड लगातार बदलता रहता है. यह एक कॉम्प्लेक्स मानसिक बीमारी है, यह स्थिति ज़रूरी नहीं कि केवल कुछ पलों के लिए हो, बल्कि इसमें रोगी का मन लगातार कई महीनों या हफ़्तों तक या तो बहुत उदास रहता है या फिर बहुत ज़्यादा उत्साहित रहता है. यह एक साइक्लिक डिसऑर्डर है, जिसमें पीड़ित व्यक्ति की मनोदशा बारी-बारी से दो अलग और विपरीत अवस्थाओं में जाती रहती है. अगर किसी व्यक्ति को यह बीमारी हो, तो अचानक ही उसका व्यवहार बदल जाता है.
इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति अचानक से तनाव में आ जाता है और उसका आत्मविश्वास एकदम बढ़ जाता है और अगले ही पल में वह एकदम शांत हो जाता है. यह बीमारी लगभग सौ में से एक व्यक्ति को जीवन में कभी ना कभी होती ही है. इस बीमारी की शुरुआत अक्सर 14 साल से 19 साल के बीच में होती है. यह पुरुषों और महिलाओं को सामान रूप से प्रभावित करता हैं.
बाइपोलर डिसऑर्डर किस वजह से होता है?
- अगर परिवार में किसी को यह समस्या है, तो इसका होना आनुवांशिक कारणों को माना जाता है.
- मस्तिष्क में होनेवाले भौतिक बदलाव बायपोलर डिसऑर्डर के लिए ज़िम्मेदार होते हैं.
- दिमाग़ में कुछ रसायन होते हैं, जो हमारे मूड को कंट्रोल करते हैं, जैसे सेरोटोनिन, डोपामाइन और नॉरपेनेफ्रिन. बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्ति के दिमाग़ में इन रसायनों का संतुलन बिगड़ जाता है. जब इनका स्तर बहुत बढ़ जाता है, तो व्यक्ति मेनिया (उन्माद) में चला जाता है, और कम होने पर डिप्रेशन (अवसाद) में.
- जिन लोगों में इस बीमारी के जींस पहले से होते हैं, उनके जीवन में कुछ बड़ी या तनावपूर्ण घटनाएं इस बीमारी की शुरुआत कर सकती हैं.
इसके लक्षण क्या हैं?
बाइपोलर डिसऑर्डर के लक्षण बहुत स्पष्ट होते हैं, क्योंकि इसमें व्यक्ति का मूड दो अलग-अलग एुींीशाशी के बीच झूलता है. इसके मुख्य रूप से दो चरण होते हैं- मेनिया और डिप्रेशन. साथ ही नॉर्मल फेज़ (र्एीींहूाळर) और मिक्सड स्टेट (चळुशव ऋशर्रींीीशी) भी होती है.
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मेनिया के लक्षण
- किसी भी काम को शुरू कर लेना, लेकिन उसे पूरा ना कर पाना.
- ख़ुद को चोट पहुंचाना.
- किसी एक काम पर फोकस ना करना. कभी ये करना कभी वो करना.
- बिना वजह बोलते रहना और बहुत ज़्यादा बातें करना.
- हर वक़्त दिमाग़ का नई-नई योजनाएं या प्लानिंग करने में लगा रहना.
- बेकार की चीज़ों पर बहुत पैसा ख़र्च करना भी इस बीमारी का आम लक्षण है. व्यक्ति सोच ही नहीं पाता कि वह क्या कर रहा है.
डिप्रेशन के लक्षण
- बिना बात रोने का मन करना.
- बेवजह चिड़चिड़ापन.
- ख़ुद को बहुत ज़्यादा तनाव में महसूस करना, जबकि कोई समस्या भी न हो.
- ख़ुद को बेकार समझना.
- हर बात के लिए ख़ुद को दोषी मानना और भविष्य को लेकर पूरी तरह निराश हो जाना.
- आत्महत्या तक के विचार आना.
नॉर्मल फेज़ होता है
मेनिया और डिप्रेशन के बीच कुछ ऐसा समय भी होता है जब रोगी पूरी तरह ठीक होता है और अपने डेली रूटीन के काम आम इंसान की तरह करता है. इसे नॉर्मल फेज़ कहते है.
मिक्सड स्टेट भी होता है
कई बार किसी व्यक्ति में मेनिया और डिप्रेशन को आप एक साथ भी देख सकते हैं. जैसे व्यक्ति के शरीर में एनर्जी तो बहुत ज़्यादा हाई होती है, लेकिन उसका मन पूरी तरह डिप्रेस होता है. इसी वजह से वह चाहते हुए भी अपनी उस एनर्जी का इस्तेमाल कर कोई काम नहीं कर पाता. यह स्थिति काफ़ी तकलीफ़देह होती है. इसे ही मिक्सड स्टेट कहते हैं.
इस समस्या से कैसे बच सकते हैं?
इस समस्या के उपचार के लिए कई चीज़ें एक साथ काम करती हैं जैसे कि दवाइयों का भी रोल है. साथ ही थेरेपी और लाइफस्टाइल में बदलाव भी इसे ठीक करने में मदद करता है. ये कैसे होता है आइए जानें.
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दवाइयों की मदद से
यह बीमारी दिमाग़ के रसायनों (Neurontransmitters) के असंतुलन की वजह से होती है. ये दवाइयां मूड को संतुलित रखती हैं, ताकि व्यक्ति न तो बहुत ज़्यादा मेनिया में जाए और न ही डिप्रेशन में.
जैसे कि अगर डिप्रेशन ज़्यादा हो, तो व्यक्ति के माइंड को रिलैक्स करने की दवा दे जाती है, जिससे उसे काफ़ी नींद आती है और उसका माइंड रिलैक्स होता है. इसके लिए बहुत सी दवाइयां डॉक्टर की सलाह पर ली जाती हैं और उन्हें डॉक्टर की सलाह पर ही बंद किया जाता है.
साइकोथेरेपी क्या है और कैसे इसकी मदद से उपचार करते हैं?
यह एक थेरेपी है, जिसमें उन विचारों, व्यवहार और जज़्बात के बारे में जाना जाता है, जिस कारण यह डिसऑर्डर और अधिक बढ़ सकता है और प्रॉपर गाइडेंस और एजुकेशन के द्वारा इसे बदला जाता है. इस उपचार के अंतर्गत कई अन्य उपचार भी आते हैं.
साइकोएजुकेशन एक थेरेपी है, जो बाइपोलर डिसऑर्डर के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध करवाती है.
कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) क्या है?
यह एक ऐसी थेरेपी है, जिसमें ये माना जाता है कि हमारे विचार ही हमारी भावनाओं और व्यवहार को तय करते हैं. इसमें एक व्यक्ति के सोचने और उसके व्यवहार के तरी़के को बदला जाता है, ताकि समस्या को सुलझाया जा सके. उइढ इन नकारात्मक विचारों को अपनी बातों और पॉजिटिविटी के ज़रिए सकारात्मक विचारों में बदल देती है.
इंटरपर्सनल थेरेपी (IPT) क्या है?
यह उइढ का ही एक रूप है, यह थेरेपी विशेषकर उन लोगों पर काम करती है, जिनका अपनी फीलिंग्स या भावनाओं पर काबू नहीं रहता है. यह थेरेपी ग़ुस्सा और उदासी को कंट्रोल करना भी सिखाती है. इससे व्यक्ति काफ़ी हद तक डिप्रेशन से बाहर आता है और ख़ुद को नुक़सान नहीं पहुंचाता.
लाइफस्टाइल में बदलाव मदद करता है
इस मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारी से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति को हेल्दी खाना, समय पर सोना, एक्सरसाइज़ और मेडिटेशन करना चाहिए.

ये भी आज़माएं
- अगर आपका पार्टनर बाइपोलर डिसऑर्डर से पीड़ित है, तो वह कभी भी ग़ुस्से के मूड में हो या बात-बात में आपसे बहस करने की कोशिश करे, तो अपने पार्टनर को हंसाने की पूरी कोशिश करें. इससे उस व्यक्ति को शांत करने में आपको मदद मिलेगी, क्योंकि ऐसे व्यक्ति जितने ज़्यादा ख़ुश रहेंगे, उनका कॉन्फिडेंस लेवल भी उतनी ही तेजी से बढ़ेगा.
- कई बार पुरानी बातें और ख़ूबसूरत यादें आपके रिश्ते को बचाने में बहुत मददगार साबित होती हैं. अपने बाइपोलर पार्टनर को पुराने फोटोज़ दिखाएं, पुरानी बातें याद दिलाएं, ताकि वह पहले की तरह होने की कोशिश कर सकें.
- योग, मेडीटेशन और प्राणायाम को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं.
- अत्यधिक काम के दबाव या तनावपूर्ण माहौल से बचें.
- पर्याप्त नींद लेकर भी इस समस्या से बचा जा सकता है.
- ज़्यादा मात्रा में ड्रग और कैफीन लेने से बचें.
- डेली कुछ कसरत करें, इससे एंडोर्फिन और सेरोटोनिन जैसे हैप्पी हार्मोन्स रिलीज़ होते हैं, जो मूड को बेहतर रखते हैं.
- शिखा जैन

