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कहानी- सर्कस का शेर (Short Story- Circus Ka Sher)

"यही तो मेरा दुखान्त है और प्रायः समय का यह दुखान्त भी हो सकता है, जिसे आप जैसे आलोचकों ने कभी देखने का प्रयास नहीं किया. मेरे अन्दर की स्त्री चाहती है कि मेरा पति एक बलवान, धाकड़ प्रकार का पुरुष हो..."

जब शौरी मुझे यार कहकर पुकारती है तो मुझे बहुत बुरा लगता है. मैंने उसे कई बार कहा है कि वह मुझे मेरे पूरे नाम कृष्ण कुमार से नहीं पुकार सकती तो कुमार कहकर ही आवाज़ दे दिया करे, परन्तु वह अपने व्यावसायिक वातावरण में कुछ इस प्रकार रम गई है कि चार शब्द उसका तकिया-ए-कलाम बन गया है, जिसमें छोटे-बड़े का कोई अन्तर नहीं रखा जाता, उदाहरण के तौर पर वह टाइप करते-करते टाइप मशीन में से पन्ने खींच कर लाई और बोली, "यार देखना इस समाचार का मुख बन्द कुछ ठीक नहीं बन रहा, संपादक कहीं पूरी स्टोरी ही रद्द न कर दे, यदि कहो तो फिर से टाइप कर दें."

यार कह कर सम्बोधित‌ करना इस वातावरण का स्वभाव सा बन गया है. पत्रकारों की नई पीढ़ी ऊटपटांग क़िस्म के कपड़े पहनती है. अनोखी प्रकार की अंग्रेज़ी बोलती है, जिसमें लिंग का कोई भेदभाव नहीं रखा जाता. बालों की कटिंग और सज्जा कुछ इस प्रकार की चल निकलती है कि कुर्सी की पीठ से पता ही नहीं चलता कि लड़का काम कर रहा है या लड़की. यह लोग मिलते हैं तो 'हाय' कहकर हाथ मिलाते हैं. ऐसे वातावरण में यदि आयु में कुछ बड़े लोग भी नई पौध की देखा-देखी उनका रंग-ढंग और बोलने का तरीक़ा अपना ले तो यह कोई अजीब बात नहीं है.

फिर शौरी जैसा कि उस के मदिरा भरे नाम से प्रत्यक्ष है किसी धार्मिक विचारों या पुरानी परम्परा वाले परिवार से संबंध नहीं रखती. उसका पिता सेना में एक अधिकारी था. उम्र भर इधर से उधर भटकता रहा. शौरी ने भी घाट-घाट का पानी पिया, कई कॉलेजों के होस्टल देखे. इसी आवारागर्दी में अपने पांव पर खड़े होने का शौक पैदा हुआ. उसने एम.ए. करने के पश्चात पत्रकारिता में डिप्लोमा किया. समाचार पत्रों में छोटे-मोटे काम करती रही. विवाहित जीवन की बाधा को वह अधिक समय सहन नहीं कर सकी और घर बसाकर भी उसने नौकरी करना उचित समझा और हमारे समाचार पत्रों में एक संवाददाता बन गई.

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बेशक अपनी माता से विरासत में मिले शिष्टाचार के कारण वह पत्रकारों की नई पीढ़ी से बहुत भिन्न थी. किन्तु दूसरे लड़के-लड़कियों के साथ व्यवसाय में कदम मिला कर चलने के लिए उसने भी उनके ही रंग-ढंग अपना लिए थे. वह भी आकर सब से हाथ मिलाती थी. गले में दुपट्टा या मफलर डालना आवश्यक नहीं समझती थी और मैंने एक दो बार उसे अन्य पत्रकारों की ओर से सिगरेट की भेंट स्वीकार करते हुए भी देखा था. यदि ड्रिंक्स की पार्टी में कभी किसी ने बियर का ग्लास उसे पकडा दिया तो वह भी अन्य पत्रकारों की भांति ग्लास थामे सिगरेट सुलगाए अपने व्यावसाविक कार्य में लगी रहती थी. उसे समाचारों की अच्छी समझ भी थी और कई बार तो उसकी कॉपी समाचार पत्र के पहले पन्ने के योग्य होती थी. इसलिए मैंने उसकी इन छोटी-मोटी कमज़ोरियों की ओर कभी अधिक ध्यान नहीं दिया, क्योंकि जब पूरा समाज ही स्त्रियों की स्वतन्त्रता के नाम पर एक नई डगर पर चल निकला है तो किसी एक लड़की को बाजू से पकड़ कर उस रास्ते से अलग करना कुछ अच्छा नहीं लगता. इसलिए मैंने शौरी को सिगरेट या बियर पीते देख कर कभी बुरा नहीं माना. हां, जब वह मुझे यार कहकर सम्बोधित करती है तो न जाने मेरे मस्तिष्क पर चोट सी क्यों लगती है. विशेष तौर पर उस समय जब वह अपने घरेलू जीवन के संबंध में भी मुझसे परामर्श कर रही हो.

शौरी के दो बच्चे हैं. दोनों अब स्कूल जाने लगे है. यदि वे अस्वस्थ हों तो वह मुझ से ही दवा-दारू के बारे में पूछेगी. यदि बूढ़ी सास का कहीं चेकअप कराना हो तो वह मुझे ही कहेगी कि अस्पताल में किसी को फोन कर दूं. बच्चों को स्कूल में भरती कराना था तो उसने मुझ से ही प्रार्थना की कि मैं मुख्य संपादक से वहां फोन करा दूं.

इस पहलू से शौरी का दोहरा व्यक्तित्व है. दफ़्तर के बछड़ों में वह बछड़ा भी बनी रहना चाहती है और उल्टी-सीधी भेटवार्ता और जो पुलिस केस कोई और न करना चाहता हो उसे वह करने के

लिए झट तैयार हो जाती है और घर में वह एक गाय है जिसे सब की सुख-सुविधा की चिन्ता बनी रहती है. वह बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर उन्हें अपने पांव पर खड़ा करना चाहती है.

दफ़्तर में फोन पर इतनी खुल कर बात करती है कि पुरुष भी नहीं करते होंगे. छोटी-मोटी गालियां देने से भी संकोच नहीं करती. जैसे कि एक दिन फोन पर किसी मित्र से कह रही थी-

"यार आज मौसम बड़ा आशिक़ाना हो रहा है. दफ़्तर मैं बैठे क्यों दिल जला रहे हो. चलो किसी बार में चलकर बैठे."

एक बार वह दफ़्तर में ही एक विदेशी व्यापारी के साथ ऐसी बेतकल्लुफ़ी से बात कर रही थी मुझे बहुत बुरा लगा. जब वह उस विदेशी से भेटवार्ता का विवरण टाइप करके मुझे दिखाने के लिए लाई तो मैंने उसे कहा, "शौरी, मैं कुछ देर से अनुभव कर रहा हूं कि तुम में स्त्रीत्व समाप्त होता जा रहा है और तुम स्त्री से अधिक पुरुष दिखाई देने लगी हो."

"नहीं यार..."

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"यार नहीं कृष्ण..." मैंने उसे टोका, मेरी बात से मानो उसे एक प्रकार की क्षति पहुंची. वह कुर्सी खींच कर मेरे निकट ही बैठ गई और कहने लगी.

"कृष्ण जी, आप ने यह कैसे कह दिया? मैं दो बच्चों की मां हूं. उनकी पूरी देखभाल करती हूं. मेरी बूढ़ी सास है, उसकी सुख-सुविधा की ज़िम्मेदारी मुझ पर है. मेरा पति है, उसकी पूरी देखभाल करती हूं. मैंने घर के कार्यों की कभी अवहेलना नहीं की. फिर आप यह कैसे कह रहे हैं?"

"देखो शौरी स्त्री हो या पुरुष वह अपनी बात, पहनावे और चलने से पहचाने जाते हैं. और मैंने धीरे-धीरे तुम्हारे बारे में जो धारणा बनाई वह तुम से कह दी है."

"किन्तु कृष्ण जी आप ने यह विचार बनाने से पूर्व यह भी सोचा है कि मुझे किस प्रकार के काम करने पड़ते हैं और किन परिस्थितियों में कार्य करना पड़ता है. इस व्यवसाय में जो पुरुष भरे पड़े हैं वह बुद्धिजीवी कहलाते हैं. लिंग के अंतर को जानते ही नहीं. उनका विष निकालने के लिए उनकी दी हुई सिगरेट सुलगानी पड़ती है. उनके साथ ड्रिंक भी करना पड़ता है.

यदि ग्लास थामकर उनसे बात न करो तो इसका बुरा माना जाता है और जो समाचार पुरुष निकाल लेते हैं, उससे हम वंचित रह जाते हैं. यूरोप से स्त्रियों की स्वतंत्रता की जो हवा यहां पहुंची है उन्होंने बहुत सी लक्ष्मण रेखाएं मिटा दी हैं. पुरुष बहुत सी बातों को अब पाप नहीं समझते और स्त्रियों को भी उनसे कोई अवरोध नहीं है. आप मेरे बारे में कोई विचार करने से पहले इस पृष्ठभूमि को तो देखें. बल्कि मैं तो समझती हूं कि मैंने अपने अन्दर की स्त्री को प्रत्येक मूल्य पर जीवित रखा है."

"मैं अन्दर की नहीं बाहर की बात कर रहा हूं."

"कृष्ण जी आप मुझ पर यह आरोप लगा सकते हैं, यदि मैं बच्चों से मां के रूप में न मिलूं. पति से पत्नी जैसा व्यवहार न करूं या अपनी मां से बेटी जैसा सलूक न करूं. यदि मित्रों में मुझे मित्रों की भांति रहना पड़ता है, जो लिंग भेद को नहीं मानते तो आप इस आधार पर कोई निर्णय कैसे ले सकते हैं."

शौरी की बातों से मुझे यह महसूस हुआ कि मेरे केवल एक वाक्य से उसे बहुत दुख पहुंचा है. उसके अहम् को ठेस लगी है. वह अपनी सीट पर जा कर काम करने की अपेक्षा मेरे पास ही बैठी रही, मानो एक थकी हुई स्त्री कुछ कहना चाहती हो.

"कृष्ण जी. आप ठीक कहते हैं, मैं स्वयं कई दिनों‌ से महसूस करती हूं कि मेरा उत्तरदायित्व मेरे स्त्रीपन पर छा रहा है. जैसे मैं अपने काम के लिए बस की प्रतीक्षा नहीं कर सकती हेलमेट उठाती हूं. स्कूटर का बटन दबाती हूं और पवन की भांति उड़ने लगती हूं. रास्ते में ओवरटेक करते हुए भी मैंने कभी मुड़ कर नहीं देखा कि कार कोई स्त्री चला रही थी या कोई पुरुष, क्योंकि मेरी दृष्टि तो सदा अपने काम पर लगी रहती है कि मुझे किस समय कहां पहुंचना है. फिर मुझे यह विचार भी घेरे रहता है कि मुझे जितना वेतन मिलता है. मुझे भी पुरुष संवाददाताओं जितना ही काम करना चाहिए, मुझे वेतन स्त्रीपन के लिए एवं शारीरिक आकर्षण के लिए नहीं मिलता.

हां, इतना अवश्य कह सकती हूं कि मेरी घरेलू ज़िम्मेदारियां मेरे स्त्रीत्व पर प्रभाव डाल रही हैं. बच्चों की फीस जमा कराने जाती हूं. बिजली-पानी के बिल देने भी मैं ही जाती हूं. फ्लैट की किश्त भी मैं ही भरने जाती हूं, क्योंकि व्यवसायिक सुविधा के कारण मैं यह कार्य शीघ्र निपटा लेती हूं. घर लौटते समय आवश्यक चीज़ें भी ले जाती हूं.

हां कृष्णा जी. यह बात आपने कभी नोट नहीं की होगी. परन्तु जो बात मेरे स्त्रीपन को बुरी तरह घायल कर रही है, वह यह है कि मेरे कारण मेरे पति बचन में पौरुषपन की चेतना कम होती जा रही है."

"वह कैसे?" मैंने चौंक कर पूछा.

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"यही तो मेरा दुखान्त है और प्रायः समय का दुखान्त भी हो सकता है, जिसे आप जैसे आलोचकों ने कभी देखने का प्रयास नहीं किया. मेरे अन्दर की स्त्री चाहती है कि मेरा पति एक बलवान धाकड़ प्रकार का पुरुष हो जिसकी मुट्ठी में सारा संसार हो, जो हर बात पर आख़िरी विचार रखता हो. उसे विश्वास हो कि वह धरती पर पांव रख कर पानी निकाल सकता है. परन्तु बचन में यह गुण दिन-प्रतिदिन कम होते जा रहे हैं. उसने कभी नहीं सोचा कि पूरे घर का बोझ मेरे कन्धों पर है. उसे बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना है. फीस जमा करानी है. राशन लाना है. वह तो यह भी नहीं सोचता कि उसे समय पर घर जाना-आना है.

चूंकि मेरे वेतन से घर का आटा-दाल चल जाता है इसलिए वह कई बार अपना वेतन भी एक-एक सप्ताह लेट लाता है. दफ़्तर में किसी की बात सहन नहीं कर सकता. बात-बात पर त्यागपत्र की धमकी दे देता है. वह एक अच्छा अकाउन्टेन्ट है तो इसका अर्थ यह तो नहीं है कि वह कहीं टिक कर ही न बैठे. पांच वर्ष में उसने तीन कंपनियां तब्दील की हैं. तीनों जगह उसे अपने वेतन से ख़ुशी नहीं है और मुझे घबराहट लगी रहती है कि किसी दिन काम छोड़ कर आ जाएगा. इसका कारण उसके मन की अस्थिरता नहीं है, बल्कि यह सन्तुष्टि है कि घर की दाल-रोटी तो चल रही है और मेरी जान-पहचान का क्षेत्र काफ़ी बड़ा है. उसे कहीं न कहीं काम मिल ही जाएगा. यदि यह अनुभव हो कि घर की नाव उसे ही चलानी है तो वह कभी भी इतना गैरज़िम्मेदार न हो. यदि उसे बच्चों की शिक्षा, मां की दवा और मेरी सुख-सुविधा की चिन्ता हो तो वह कभी दफ़्तर से लौटते समय ड्रामा या पिक्चर देखने न चला जाए, और कृष्ण जी मैं यह अनुभव कर रही हूं कि बचन के अन्दर का मर्द दिन-प्रतिदिन मरता जा रहा है.

मैं उसे कहती हूं, "बच्चों को तैयार कर दो उन्हें देर हो रही है तो वह उन्हें नहलाने लगता है. उनके कपड़े बदल देता है. जूते पालिश करता है. कई बार प्रातः उठकर चाय भी बना देता है और कई बार मुझे बहुत लज्जा आती है, जब बचन नाश्ते के लिए परांठे भी बनाने लगता है, बिस्तर भी लपेट देता है. और मेरे अन्दर की स्त्री को सबसे अधिक ठेस उस समय लगती है जब वह कहता है कि "वर्तमान समय में स्त्री-पुरुष दोनों को मिल कर गाड़ी खींचनी पड़ती है."

मुझे यह समझ नहीं आता कि यदि पति और पत्नी दोनों ही घोड़े बन गए तो खींचने के लिए गाड़ी कहां से आएगी."

मैं चाहती हूं कि जब मैं उस से कोई काम करने के लिए कहूं, तो वह विरोध में बच्चों के जूते कपड़े दीवार पर दे मारे कि यह उसका काम नहीं है, किन्तु वह तो मेरी पतलून भी प्रेस कर देता है और अपने जूते के साथ मेरे सैण्डल भी पॉलिश कर देता है. यदि उसके घर पर होते मुझे कोई मिलने आ जाए तो, वह चाय भी बना देता है.

कृष्ण जी मुझे यह भी पता है कि बचन के अन्दर के पुरुषार्थ की घातक मैं हूं, परन्तु आप मुझे यह‌ ताना मत दीजिए कि मेरा स्त्रीत्व समाप्त होता जा रहा है. मैं चाहती हूं कि बचन के हाथ में हंटर और वह सर्कस के रिंग मास्टर की भांति मुझ से अपने आदेश मनवाए, परन्तु वह तो स्वयं सर्कस का शेर बन गया है जो अब गुर्राता भी नहीं है."

- एम. के. महताब

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