मालती हमारे घर की सहायिका थी. पहले उसकी सास हमारे घर काम करती थी और अब वह. उसकी बदौलत ही मैं अपनी टीचर की जॉब और घर दोनों को ठीक से संभाल पाती थी. उसकी बातचीत का ठेठ बुंदेली अंदाज़ मुझे बड़ा प्यारा लगता था. वह समय की बड़ी पाबंद थी, लेकिन उस शाम वह कुछ देर से आई तो अम्मा जी उस पर तंज कसती हुई बोलीं, "शाम को इतनी लेट क्यों आई? और आज सुबह भी नहीं आई थीं तुम!" अम्मा जी के तंज पर मालती धीमे से बोली.
"अम्मा! जाड़े आ गए तो दोनों मोड़ियन के लाने गर्म कपड़ा लैवे बाज़ार चले गए हाते, ई से सुवेरे नई आ पाए और शाम को भी आवे में तनक देर हो गई."
"गर्म कपड़ा? तुम्हें तो हमने गर्म कपड़ो से भरा पूरा थैला दिया था, उसका क्या?''
अब वह और सकुचाई सी बोली, ''अम्मा, वे कपड़ा तो हम पहनत हैं, लेकिन हमाई बड़ी मोड़ी ट्यूशन करत है. अपने ट्यूशन के पाईसा से वा अपने लाने और हल्की बहन के लाने बाहर पहनवे खौं नए सुटर लै आई."
यह भी पढ़ें: अपने रिश्ते के प्रति कितने ज़िम्मेदार हैं आप? (How responsible are you towards your relationship?)
उसकी इस बात से मानो अम्मा को चार सौ चालीस वॉल्ट का झटका लगा. जीवन भर जो हमारे घर की उतरन पहनते रहे वे. अब ख़ुद के ख़रीदे कपड़े पहने यह बात अम्मा जी को आराम से कहां हजम होनी थीं. मालती चुपचाप जाकर घर के काम करने लगी और मैं अम्मा के पास बैठी स्कूल के बच्चों की परीक्षा की कॉपी चेक करने लगी.
देर तक कुछ सोचने के बाद अम्मा मुझसे बोलीं, "बहू, देख रही हो, इन लोगों की नवाबी, तुम बड़ी तारीफ़ें करती हो ना इसकी बेटी की, देखो कैसी नाकचढी बेटी है, उतरन छोड़कर नए कपड़े ख़रीद के पहनतीं हैं."
अम्मा जान-बूझकर ऊंचे स्वर में बोल रही थीं, ताकि उनके शब्द मालती के कानों तक पहुंच जाएं. उनकी बात सुनकर मालती रुआंसी सी हो गई. कुछ ही देर में वह काम ख़त्म करके जाने लगी तो मैं उसके पीछे चल दी. अम्मा की अनुपस्थिति में मैंने उससे कहा, ''अम्मा की बातों को दिल से मत लगाना मालती.''
''दीदी, अम्मा की बात हमें बिल्कुल बुरी नई लगी, पर हम का करें हमाई मोड़ी काउके उतरन नई पहनत ना अपनी हल्की बहन को पहनन देत. हमसे कहत है कि "मम्मी, हम भले सस्ते कपड़ा पहने पर अपनी कमाई के कपड़ा ही पहने, बड़ी ज़िद्दी है हमाई मोड़ी,आज कान पकड़के खिंचे हम मोड़ी के.''
यह भी पढ़ें: जीवन में ऐसे भरें ख़ुशियों के रंग (Fill Your Life With Happiness In The Best Way)
बेटी पर ग़ुस्से से बड़बड़ाती हुई मालती को शांत करती हुई मैं बोली, ''मालती, तुम्हारी बेटी ज़िद्दी नहीं, बल्कि स्वाभिमानी है और उसका यह स्वाभिमान बना रहने देना. इस बात के लिए तुम उसे डांटना नहीं, बल्कि शाबासी देना.'' मालती मेरी बात पर मुस्कुराकर चली गई. मैं वापस कॉपी चेक करने बैठी तो मालती की बेटी की कॉपी हाथ लगी. मोती सी चमकती उसकी लेखनी और उसके लिखे सारे सटीक उत्तर उसके उज्ज्वल भविष्य की घोषणा कर रहे थे.

पूर्ति खरे
अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES
Photo Courtesy: Freepik
