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कहानी: एकालाप- एक अधूरी यात्रा… (Short Story- Ekalap- Ek Adhuri Yatra…)

ज्योति चली गईं… लेकिन अपने पीछे बहुत कुछ छोड़ गईं, मैं उन्हें हर दिन महसूस करता हूं... शिवी की मुस्कान में, अपनी ख़ामोशी में, घर की आलमारियों में और अपनी हर धड़कन में...

शाम की हल्की बारिश हो रही थी. बालकनी में रखे दो कपों में से एक कप की चाय ठंडी हो चुकी थी. दूसरा कप आज भी वैसे ही रखा था… जैसे वह अभी कमरे से बाहर आएगी, हल्का सा मुस्कुराकर कहेगी, “चाय पी लीजिए… नहीं तो ठंडी हो जाएगी.”

लेकिन अब वह आवाज़ सिर्फ़ यादों में थी.

मैं अक्सर सोचता हूं, क्या सच में कोई इंसान अचानक किसी की ज़िंदगी से यूं चला जाता है… जैसे आंधी का तेज झोंका आए और सब उजाड़ कर चला जाए? या फिर वह कहीं जाता ही नहीं…बस हमारे आसपास रह जाता है.

कमरे की दीवारों में, आलमारी में रखे उसके कपड़ों की ख़ुशबू में, मोबाइल की पुरानी तस्वीरों में और उस दुपट्टे में, जिस पर आज भी उसके बालों की हल्की महक बाकी है.

हमारी शादी को अभी छह साल भी पूरे नहीं हुए थे. बस पांच साल… कुछ महीने… और ढेर सारे अधूरे सपने...

हमारी शादी भी उस दौर में हुई थी, जब पूरी दुनिया कोविड के साए में जी रही थी. न कोई बड़ी भीड़, न बैंड-बाजा-बारात. कुछ क़रीबी लोगों की मौजूदगी में बहुत सादगी से हमारी शादी हुई थी.

शादी के शुरुआती दिनों में हमारे पास ज़्यादा कुछ नहीं था. न अपना घर, न गाड़ी, न बहुत पैसा.

लेकिन हमारे पास एक-दूसरे का साथ था… और वही हमारी सबसे बड़ी दौलत थी.

लोग अक्सर कहते थे-

“आप दोनों बहुत भाग्यशाली हैं, एक ही शहर में सरकारी नौकरी और साथ रहने का सुख सबको कहां मिलता है.” सच भी था.

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सुबह की शुरुआत हमेशा भागदौड़ से होती थी. जल्दी उठना, घर के काम निपटाना, बेटी को उठाना, उसके साथ थोड़ी देर खेलना, उसका टिफिन तैयार करना, उसे स्कूल भेजना… फिर हम दोनों का टिफिन पैक करना और अपने-अपने ऑफिस के लिए तैयार होना.

जिस दिन बेटी का स्कूल नहीं होता था, उस दिन ज्योति थोड़ा राहत महसूस करती थी. कहती, “आज कम से कम सुबह इतनी भागमभाग नहीं है." और फिर ख़ुद ही हंस पड़ती.

शहर के ही एक राजकीय महाविद्यालय में मेरी पत्नी ज्योति मनोविज्ञान विषय की सहायक प्राध्यापक थीं. शांत स्वभाव, गंभीर व्यक्तित्व और अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित.

वह सिर्फ़ पढ़ाती नहीं थीं, बल्कि अपने विद्यार्थियों को समझती भी थीं. उनकी परेशानियां सुनती थीं, उनका मनोबल बढ़ाती थीं और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती थीं.

कॉलेज में छात्र उन्हें सिर्फ़ मैम ही नहीं कहते थे,  बल्कि उन्हें एक मार्गदर्शक, एक संरक्षक की तरह मानते थे. उनकी क्लास में सिर्फ़ पढ़ाई नहीं होती थी, अपनापन भी होता था. शायद यही कारण था कि छात्र उन्हें बेहद चाहते और सम्मान करते थे.

कई बार कॉलेज से लौटते समय वह मुझसे कहती थीं, “आज एक बच्ची बहुत परेशान थी… मानसिक तनाव से गुज़र रही थी. उससे देर तक बात करनी पड़ी. मैंने उसे मेडिटेशन करना सिखाया… समझाया कि ज़िंदगी कैसे जीना चाहिए."

मैं उन्हें चुपचाप सुनता रहता. मुझे अपनी पत्नी पर गर्व होता था. मुझे लगता था कि ज्योति सिर्फ़ मेरे घर की रोशनी नहीं थीं, बल्कि न जाने कितने विद्यार्थियों के भविष्य की भी रोशनी थीं.

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धीरे-धीरे ज़िंदगी आगे बढ़ती रही. हमारी छोटी-सी दुनिया थी… और उस दुनिया का सबसे प्यारा हिस्सा थी हमारी चार साल की नन्ही बेटी शिवी.

जब ज्योति कॉलेज से लौटतीं, तो सबसे पहले बेटी को गोद में उठा लेती थीं.

फिर शाम को हम दोनों सोफे पर बैठकर चाय पीते और घर, परिवार, ऑफिस और ज़िंदगी की बातें करते रहते. उधर शिवी पूरे घर में अपनी खिलखिलाहट बिखेरती रहती.

ज्योति छोटी-छोटी बातों में ख़ुश हो जाती थीं. न पैसे कमाने का घमंड, न किसी तरह का दिखावा. बहुत साधारण पहनावा, सरल स्वभाव और अपने काम से मतलब रखने वाली. लेकिन शायद ज़िंदगी को इतनी ख़ुशी मंज़ूर नहीं थी.

उस दिन भी सब सामान्य ही था. शाम ढल रही थी. हम दोनों साथ घर लौट रहे थे. किसे पता था कि वही शाम हमारी पूरी ज़िंदगी बदल देगी.

कुछ ही घंटों में सब बिखर गया.

अस्पताल के सफ़ेद कमरे में मशीनों की आवाज़ें थीं. परिवारजनों की भागदौड़ थी. प्रार्थनाएं थीं…

और एक पति था, जो बार-बार सिर्फ़ इतना कह रहा था, “भगवान… इसे बचा लो. एक छोटी बेटी के लिए इसे बचा लो…”

लेकिन कुछ दुआएं अधूरी रह जाती हैं.

अक्सर वह मुझसे कहती थीं, “आप बहुत समयबद्ध और‌ सिद्धांतवादी हैं... आपसे कोई ग़लती न हो...‌ हमेशा अच्छा करने की कोशिश करते हैं…” लेकिन मुझे नहीं पता था कि ज़िंदगी की सबसे बड़ी जगह पर मैं ख़ुद ही चूक जाऊंगा.

उस रात के बाद घर तो वही रहा… लेकिन 'घर' जैसा कुछ नहीं बचा. अब शामें काटने दौड़ती हैं.

रातें बहुत लंबी हो गई हैं. सुबह अब पहले जैसी नहीं लगती.

ऑफिस से लौटने के बाद अब कोई यह नहीं पूछता, “आज इतने चुप क्यों हो?”

रात को जब शिवी सो जाती है तो मैं अक्सर पुरानी तस्वीरें देखता हूं. साथ बिताए हुए ख़ुशनुमा लम्हे…

यात्राओं की मुस्कुराती तस्वीरें… परिवार के साथ बिताई ख़ुशियां… सब कुछ जैसे किसी और जीवन की बातें लगती हैं.

कभी-कभी शिवी अपनी मां की तस्वीर देखकर पूछती है, “पापा… मम्मा कब आएंगी?”

उस पल मेरे पास कोई जवाब नहीं होता. मैं बस उसे सीने से लगा लेता हूं…और चुपचाप रो लेता हूं.

लोग कहते हैं- समय सब ठीक कर देता है. लेकिन कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जो कभी ठीक नहीं होते.

बस इंसान उन्हें लेकर जीना सीख जाता है.

मैं अक्सर सोचता हूं- अभी तो बहुत कुछ बाकी था. शिवी का बड़ा होना… उसका स्कूल… उसकी उच्च शिक्षा, उसकी शादी… हम दोनों का साथ बूढ़ा होना… साथ में कई धार्मिक और पर्यटक स्थलों की यात्राएं…

और न जाने कितने अधूरे सपने…

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लेकिन हमारी यात्रा बीच रास्ते में ही रुक गई.

ज्योति चली गईं… लेकिन अपने पीछे बहुत कुछ छोड़ गईं, मैं उन्हें हर दिन महसूस करता हूं...‌ शिवी की मुस्कान में, अपनी ख़ामोशी में, घर की आलमारियों में और अपनी हर धड़कन में...

यह कहानी सिर्फ़ एक अंत की नहीं है, यह एक ऐसे संबंध की कहानी है, जो अधूरा होकर भी कभी ख़त्म नहीं होता.

(एक पति-पत्नी की कहानी, जो शादी के छह साल का सफ़र भी पूरा न कर सके.)

आशुतोष श्रीवास्तव

आशुतोष श्रीवास्तव

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Photo Courtesy: Freepik

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