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बिखरती शादी से बेहतर है तलाक़? पर क़ानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों? (Is divorce better than a marriage that is falling apart? But why is the legal process so long?)

जनवरी से लेकर अब तक जाने कितनी ही लड़कियां ससुराल की दहेज़ की मांग के चलते मौत के मुंह में जा चुकी हैं. जहां एक तरफ़ दिल्ली के जज अमन शर्मा ने भी अपनी पत्नी से तंग आकर आत्महत्या कर ली, वहीं बैंगलुरु के अतुल सुभाष का केस, उत्तर प्रदेश के मेरठ में नीले ड्रम वाला केस हो या फिर इंदौर का सोनम रघुवंशी का अपने पति को मार देने का केस हो.
इन सभी में जो कॉमन है, वह है इन सभी की शादियों का ठीक ना चलना. ये सभी अपनी बोझ बन गई इन शादियों से बाहर निकलने की जद्दोजेहद में लगे थे, तो कहीं ’लोग क्या कहेंगे’ के डर से ऐसी बेजान शादी का बोझ ढोते-ढोते एक दिन या तो ज़िंदगी की जंग ही हार गए या फिर आज भी ऐसी शादी से निकलने का रास्ता ही ढूंढ़ रहे हैं. आइए जानें जब शादी महज़ कुछ घंटों में हो जाती है, तो उससे निकलने में सालों क्यों लग जाते हैं. इस पर हमने दिल्ली कड़कड़डूमा कोर्ट के वकील करण से बातचीत की.

परिवार और समाज का दबाव शादी को तोड़ने का फ़ैसला ला नहीं लेने देता
यह बात इस समाज की सबसे कड़वी सच्चाइयों में से एक है. अक्सर लोग बिखरते रिश्ते के दर्द से उतना नहीं डरते, जितना इस बात से डरते हैं कि लोग क्या कहेंगे... भारत में शादी को स़िर्फ दो लोगों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और समाज का बंधन माना जाता है. यही वजह है कि जब यह बंधन टूटने की कगार पर होता है, तो पूरा तंत्र व्यक्ति पर इसे बनाए रखने का दबाव बनाने लगता है. यही दबाव रिश्ते को उस समय भी ज़ारी रखने के लिए मजबूर करता है, जब सुलह की थोड़ी भी गुंजाइश न बची हो. दूसरे, क़ानूनन पति-पत्नी को अलग होने का अधिकार है, पर लंबी अदालती प्रक्रिया और समाज का दबाव इसमें मुश्किलें पैदा करता है.

भारतीय समाज में तलाक़ एक टैबू है
भारतीय समाज में तलाक़ एक वर्जित विषय रहा है. आज भी माना जाता है कि लड़की डोली में जाए और अर्थी में आए. यही नहीं शादी को सात जन्मों का रिश्ता बना दिया गया है, भले ही वह रिश्ता एक जन्म भी निभाया ना जा रहा हो. लेकिन उसे तोड़ने का सामाजिक डर बहुत बड़ा है. जब एक लड़की वापस आती है तो बोला जाता है कि इसने ही एडजस्ट नहीं किया होगा, ये कहां ससुराल में टिकने वाली लड़की थी... सहनशीलता की कमी है, या अहंकारी है... भविष्य में तुम्हारा क्या होगा? तुम्हें कौन पालेगा? वहीं पुरुषों को ज़िम्मेदारियों से भागने वाला कह दिया जाता है...

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अगर छोटे भाई-बहन हों, तो उनके रिश्ते में भी द़िक्क़तें आती हैं, इसलिए कई बार लोग अपनी बोझिल व बिखरी हुई शादी को अपने परिवार के नाम पर झेलते रहते हैं. भले ही हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, लेकिन जब बात शादी टूटने की आती है, तो समाज का नज़रिया आज भी बेहद रूढ़िवादी और जजमेंटल हो जाता है.

समाज में बदलाव की धीमी लहर भी चली है
हालांकि पिछले कुछ सालों में शहरी और शिक्षित समाज में एक सकारात्मक बदलाव भी देखने को मिल रहा है. अब कई माता-पिता समाज की परवाह छोड़कर अपनी संतान की मानसिक और शारीरिक सुरक्षा के लिए उनके तलाक़ के ़फैसले में खुलकर साथ खड़े हो रहे हैं. वे समझने लगे हैं कि तलाक़शुदा बेटी, मृत या डिप्रेशन में जी रही बेटी से कहीं बेहतर है... लेकिन कई बार तलाक़ का फ़ैसला लेने के बाद भी अदालतों में तलाक़ लेने में सालों साल लग जाते हैं.

तलाक़ की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों है?
रिकंसिलिएशन मतलब पुनर्विचार का मौक़ा देती हैं अदालतें
कूलिंग-ऑफ पीरियड
आपसी सहमति से तलाक़ (र्र्चीींीरश्र उेपीशपीं ऊर्ळींेीलश) में भी क़ानूनन 6 महीने का वेटिंग पीरियड दिया जाता है, ताकि लोग ग़ुस्से या जल्दबाज़ी में लिए गए ़फैसले पर दोबारा सोच सकें (हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट के पास विशेष परिस्थितियों में इसे ख़त्म करने का अधिकार है).

अदालतों में पेंडिंग मामले भी हैं वजह
तलाक़ के मुक़दमे बढ़ते ही जा रहे हैं. दोनों पार्टी एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए या फिर अन्य किसी भी वजह से कोर्ट से तारीख़ मांग लेती है या तारीख़ पर नहीं आती, जिससे केस तीन-चार महीने के लिए फिर पेंडिंग हो जाता है, क्योंकि इतना समय एक तारीख़ से दूसरी तारीख़ के बीच में लग ही जाता है. इस तरह एक केस में अगर 10-15 तारीखे़ं भी लग गईं, तो केस 5 से 6 साल तक लटका रहता है. जो पक्ष तलाक़ नहीं चाहता, वह उस केस को लटकाने के लिए हर तरीक़ा अपनाता है. पूरी कोशिश करता है कि तलाक़ न हो और अगर हो तो काफ़ी समय निकल जाए. कुछ पक्ष केस के बीच-बीच में कोई ना कोई अर्जी लगाते रहते हैं. उसके निपटारे में भी समय लगता है.

क़ानूनी प्रक्रियाओं का लंबा होना
समन भेजने, दोनों पक्षों के जवाब दाख़िल करने, काउंसलिंग/मध्यस्थता के दौर से गुज़रने, और फिर ज़िरह (उीेीी-शुराळपरींळेप) होने में एक तय क़ानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होता है, ताकि किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो.

तलाक़ के तरीक़े पर निर्भर करता है कि क़ानूनी कार्रवाई कितनी लंबी होगी
तलाक़ भी दो तरह से होते है एक म्यूचल कंसेंट और दूसरा कॉन्टेस्टेड डिवोर्स.

म्यूचल कंसेंट (सेक्शन 13इ हिंदू मैरिज ऐक्ट 1955). यह तब होता है जब दोनों पार्टनर परिपक्वता दिखाते हुए यह मान लेते हैं कि उनका एक साथ रहना मुमकिन नहीं है. हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-इ के तहत इसके लिए आवेदन किया जाता है. यह तलाक़ जल्दी हो जाता है.
जहां पति-पत्नी में से एक पक्ष ही तलाक़ लेना चाहता है (सेक्शन 13 हिंदू मैरिज ऐक्ट 1955) यह एक क़ानूनी लड़ाई है. जब एक पक्ष तलाक़ की अर्ज़ी देता है और दूसरा पक्ष उसका विरोध करता है, या फिर दोनों अलग तो होना चाहते हैं, लेकिन बच्चे की कस्टडी और पैसों के बंटवारे पर सहमत नहीं हो पाते. इस तरह के तलाक़ में कई बार 8-10 सालों तक भी लोग केस लड़ते रहते हैं और एक दूसरे को तंग करते हैं.

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तलाक़ से जुड़े और भी लीगल इश्यू हैं
तलाक़ की प्रक्रिया जब शुरू होती है तब अदालत को सिर्फ़ शादी को ही ख़त्म नहीं करना होता, बल्कि तलाक़ की मुख्य अर्ज़ी के साथ कई अन्य क़ानूनी और वित्तीय अधिकार जुड़े होते हैं, जिन्हें कनेक्टेड लीगल इश्यूज़ कहते हैं.

एलीमनी और मेंटनेंस
भरण-पोषण और गुज़ारा भत्ता में भी केस चलने के दौरान रोज़मर्रा के ख़र्चे, वकीलों की फीस आदि के लिए भी रकम कोर्ट तय करता है.

परमानेंट एलीमनी
तलाक़ फाइनल होने के समय तय की जानेवाली एकमुश्त रकम या हर महीने दी जाने वाली निश्‍चित राशि. इसके लिए कोर्ट पति की सैलेरी कितनी है, उसकी प्रॉपर्टी क्या है, उसका लाइफस्टाइल कैसा है, क्या पत्नी भी कमाती है, दोनों पर कितनी ज़िम्मेदारियां हैं. ये सब देखकर और समझकर ही ़़फैसला करता है. इसमें भी समय लग जाता है.

बच्चे की कस्टडी
बच्चों की कस्टडी और उनसे मिलने के अधिकार पर भी ़फैसला लेती है कोर्ट. बच्चा किसके साथ रहेगा, बच्चे की पढ़ाई-लिखाई, उसके मेडिकल ख़र्च, किस-किस तरह से दोनों पैरेंट्स के द्वारा उठाए जाएंगे, ये भो कोर्ट में तय होता है. जिन पैरेंट्स को कस्टडी नहीं मिलती, उन्हें बच्चे से मिलने का अधिकार वीकेंड पर, छुट्टियों में या वीडियो कॉल के ज़रिए दिया जाता है.

स्त्रीधन की वापसी
जब किसी लड़की की शादी होती है, तो शादी में या शादी के बाद माता-पिता और अन्य रिश्तेदारों से मिले हुए गिफ्ट, ज्वेलरी, गाडी, अन्य प्रॉपर्टी को स्त्रीधन कहा जाता है. इस पर लड़की का पूरा अधिकार होता है. तलाक़ के समय स्त्रीधन की वापसी की मांग भी की जाती है और कोर्ट उसे लड़की को दिलवाती है.

पति-पत्नी की ज्वाइंट प्रॉपर्टी का बंटवारा भी किया जाता है
अगर कोई घर या प्रॉपर्टी पति-पत्नी दोनों के नाम पर है, तो उसमें दोनों का आधा-आधा हिस्सा बनता है. इसलिए प्रॉपर्टी को बेचकर या फिर ऐसे ही पत्नी को हिस्सा दिलवाया जाता है.

जब तक इन चारों पहलुओं (पैसा, बच्चे, स्त्रीधन और प्रॉपर्टी) पर पूरी तरह से ़़फैसला या समझौता नहीं हो जाता, तब तक क़ानूनन तलाक़ की प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जाती. आपसी सहमति से तलाक़ में इन सभी मुद्दों को एक डीड ऑफ सेटलमेंट में पहले ही लिखकर कोर्ट को दे दिया जाता है, जिससे समय की बचत होती है.

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जब कॉन्टेस्टेड डिवोर्स हो रहा हो तब
एक पक्ष द्वारा लिया जानेवाले इस उेपींशीींशव ऊर्ळींेीलश का प्रोसेस लंबा और मुश्किल भरा होता है. यह तब लिया जाता है जब एक पक्ष तलाक़ लेने का इच्छुक हो और दूसरा नहीं. इस मामले में याचिकाकर्ता को तलाक़ लेने का आधार बताना होता है. वह हिंदू मैरिज ऐक्ट 1955 के सेक्शन 13 में दिए गए आधारों में से किसी पर भी तलाक़ की अर्ज़ी डाल सकता है. ये आधार हैं-
- क्रूरता: मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना.
- व्यभिचार: जीवनसाथी का किसी और के साथ संबंध होना.
- परित्याग: बिना किसी ठोस वजह के कम से कम दो साल से छोड़कर चले जाना.
- धर्म परिवर्तन या मानसिक बीमारी.

इनमें से जिस भी आधार पर तलाक़ की अर्ज़ी दायर की गई है, उसके पुख्ता सबूत होने बहुत ज़रूरी हैं. इसके बाद कोर्ट में अर्ज़ी दाख़िल कर सारे सबूत पेश किए जाते हैं. यह किसी आपराधिक या दीवानी मुक़दमे की तरह चलता है, जिसमें समन भेजना, जवाब दाख़िल करना, गवाहों की गवाही, वकीलों की जिरह होती है. इस तरह के विवादित तलाक़ में सालों तक कोर्ट के चक्कर काटने, पैसे बर्बाद करने और अपनी निजी ज़िंदगी के पन्नों को सरेआम अदालत में खोलने से दोनों ही पक्षों को भारी मानसिक और आर्थिक नुक़सान पहुंचता है.

अक्सर यह देखा गया है कि जो पक्ष तलाक़ के लिए अर्ज़ी दाख़िल करता है, वह अपने केस में जीत हासिल करने के लिए तरह-तरह के इल्ज़ाम दूसरे पक्ष पर लगता है, जो असल में गलत होते हैं. अपने केस को जीतने के लिए शख़्स न केवल दूसरे पक्ष पर बल्कि उसके सभी घरवालों पर भी इल्ज़ाम लगाता है. ऐसा करने से परिवारों के रिश्ते तो ख़राब होते ही हैं, कई बार मर्यादा की सीमा भी लांघ दी जाती है, जिससे कोर्ट में दोनों ही पक्षों को शर्मिंदा होना पड़ता है. इसका नतीज़ा यह होता है कि तलाक़ के मुक़दमों में न केवल पति-पत्नी, बल्कि उनके माता-पिता और उनके बच्चों पर भी बहुत ग़लत असर पड़ता है. साथ ही तलाक़ का मुक़दमा ख़त्म होते-होते काफ़ी साल गुज़र जाते हैं.

इसके लिए एक कारगर तरीक़ा है मध्यस्थता या मीडिएशन. क़ानून और समझदार वकील हमेशा यह सलाह देते हैं कि अदालत में एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने और सालों तक विवादित तलाक़ की लंबी लड़ाई लड़ने से बेहतर है कि दोनों पक्ष बैठकर या मध्यस्थ की मदद से बात करें. बच्चों, एलिमनी और संपत्ति का एक सम्मानजनक सेटलमेंट करके आपसी सहमति का रास्ता चुनें. यह समय, पैसा और मानसिक गरिमा तीनों को बचाता है. यह ज़िंदगी की एक नई और शांतिपूर्ण शुरुआत के लिए सबसे बेहतर रास्ता है.

इसलिए जब लगे कि शादी में रहना संभव नहीं है, तो उसे लगातार खींचते रहने और शायद सब कुछ सही हो जाए के इंतज़ार में एक-दूसरे को तकलीफ़ देते रहना और अपने साथ बच्चों और पूरे परिवार की ज़िंदगी परेशानी में डाल देना कहां तक सही है? कोशिश करें कि ज़िंदगी उस मोड़ तक ना आ जाए कि या तो आप अपने साथ कुछ ग़लत कर जाएं या फिर सामनेवाले को मारने जैसा कोई ग़लत कदम उठाने को मजबूर हो जाएं. इससे अच्छा है कि समय रहते समझ जाएं और साथ रहना मुमकिन ना लगे, तो कोर्ट की प्रक्रिया को ज़्यादा लंबा खींचने की बजाय आपसी सहमति से अलग हो जाएं.
- शिखा जैन

Photo Courtesy: Shutterstock

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