गली में घुप अंधेरा देखते ही रवि का मूड ख़राब हो गया. एक तो वह पहले से ही अपनी पत्नी उपमा से भयभीत था, ऊपर से उसे यह भय सता रहा था कि कहीं कोई कुत्ता न काट ले. लेकिन घर तो पहुंचना ही था, अतः वह नगरपालिका को कोसता गली में घुस गया. 'एक बजता होगा. आज पुनः उपमा से झिकझिक होगी, प्रतिदिन का एक ही ग़म है.' वह तेजी से डग भरते हुए सोचता जा रहा था.
उसकी शादी के छह वर्ष पूरे हो गए थे. दो वर्ष का एक मुन्ना भी था. वह भी ग्रेजुएट, उपमा भी ग्रेजुएट, फिर भी गृहस्थी में शांति नहीं थी. छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा शुरु हो जाता.
एक वर्ष पूर्व तो दोनों के बीच मतभेद की खाई इतनी गहरी हो गई कि तलाक़ तक की नौबत आ गई थी. किन्त इस खाई को पाटने वाला मुन्ना था. उसने ही टूटी कड़ी पुनः जोड़ दी, दोनों के दिमाग़ में यही बात आई कि मुन्ना का क्या होगा? तलाकू के बाद वह किसी के पास रहे, पर वह एक साथ मां-पिता का प्यार नहीं पा सकता.
और तलाक़ लेने का समझौता भंग हो गया. गृहस्थी पुनः लंगड़ाती चल पड़ी. ऐसी बात नहीं है कि वे झगड़े का निपटारा नहीं चाहते, इस समस्या पर दोनों गंभीरता और ईमानदारी से सोचते हैं, इसका समाधान ढूंढ़ते हैं और शांति के लिये एक नया समझौता करते हैं. लेकिन कुछ दिनों के बाद ही वह समझौता भंग हो जाता है.
और प्यार?.. प्यार तो दोनों के दिल में है. यह बातदूसरी है कि कोई किसी पर प्रकट नहीं करता. दोनों के बीच एक मौन रहती है. दफ़्तर जाने से पहले और दफ़्तर से आने के बाद रवि जितनी देर भी घर पर रहता है, कोई न कोई पत्रिका पढ़ता रहता है और उपमा किसी घरेलू कार्य में व्यस्त रहती है या मुन्ने के साथ खेलती रहती है.
अपने घर के सामने पहुंच कर रवि थम गया. वह अब अपने मित्र राजनाथ पर कुढ़ रहा था जिसने रमी (ताश का एक खेल) में उलझा कर इतनी रात बिता दी थी. उसने दरवाज़ा खटखटाने के पहले ही सोच लिया कि आज मौक़ा मिलते ही वह फिर एक नया समझौता उपमा के समक्ष पेश करेगा.
यह भी पढ़ें: रिश्तों में बढ़ रहा है ‘स्लीप डिवोर्स’ का ट्रेंड (Why Is Sleep Divorce Trend Increasing Among Couples?)
झिझकते हुए दरवाज़े पर दो-तीन बार थपकियां दी. उत्तर के इंतज़ार में वह कुछ क्षण ठिठका रहा पर अंदर से कोई उत्तर नहीं आया. लाचार हो उसने पुकारा उपमा... उपमा... आओ उपमा."
'ऊंह' अंदर से आवाज आई और थोड़ी देर बाद दरवाज़ा खुल गया. वह क़ैदी की तरह सिर झुकाए तेज़ी से अंदर प्रवेश कर गया. उसने अपने पीछे ज़ोर से किवाड़ बंद करने की आवाज़ सुनी.
वह मौन शयन कक्ष में चला गया और कपड़े बदलने लगा. उसी समय उपमा के तेज स्वर उसके कान में पड़े, "परमात्मा ने जैसे सारे अधिकार पुरुषों को ही सौंप दिए हैं. बेचारी स्त्रियां तो दासी हैं. खाना पकाओ, बच्चे पैदा करो और जब पति देवता सैर-सपाटे से लौटें तो उनके भोजन का प्रबंध करो, उनका जी बहलाओ." और फिर 'झन्न' से थाली बजी.
वह कपड़े बदल कर ख़ामोश बैठा था. उसने अपने समक्ष एक स्टूल लगा ली थी. उपमा उस पर भोजन की थाली रख कर चली गई. कुछ ही क्षणों में वह पुनः आई और पानी का ग्लास रख कर मौन खड़ी हो गई. वह रवि की चुप्पी पर अंदर ही अंदर ग़ुस्से से उबल रहीथी. जब बहुत देर तक रवि नहीं बोला तो उसने पूछा, "कितने बजे हैं?"
"डेढ़." वह धीरे से बोला.
"इतनी रात तक कहां थे?"
"राजनाथ के पास."
"हूं!" वह उबल कर बोली, "राजनाथ! न जाने कहां से आ गया ऑफिस में. एक ही महीने की दोस्ती में यह हाल है."
"तुम तो बेकार उसे कोस रही हो. इसमें उसका क्या दोष है?"
"मैं अकेली इतनी रात तक बैठी रहती हूं और आपको घूमने से ही फ़ुर्सत नहीं मिलती. यह भी कोई बात हुई भला."
"तुम भी कहीं घूम आया करो. मैंने रोका है क्या तुम्हें?"
"मैं कोई आवारा औरत हूं क्या कि रात में घूमती फिरूं?" वह चिढ़ कर बोली, "और फरमा तो ऐसे रहे हैं जैसे मुझे घूमने की आज़ादी दे रखी है. कितने नौकर रखे हैं घर की देखभाल करने के लिए. एक दिन कहीं चली जाती हूं तो चार दिन नाक-भौं चढ़ी रहती है."
"अच्छा, अब चुप भी रहो. रात को चिल्ला रही हो मोहल्ले वाले क्या कहेंगे?"
यह भी पढ़ें: संबंधों से निकलने की नई तस्वीर- फंबलिंग (New image of getting out of relationships- fumbling)
"किसी के कहने से मैं बुरी नहीं हो जाऊंगी." वह बाहर जाते-जाते बोली, "हूं, राजनाथ!"
"तुम्हारे इसी स्वभाव के कारण मैं उसे यहां नहीं ला रहा हूं. कई दिनों से वह कह रहा है. एक उसकी पत्नी है- साक्षात देवी. कितनी शाति है उसके घर में."
ऐसा सुनते ही उसके पांव रुक गए. ग़ुस्से से उसके नथुने फड़कने लगे. वह चीख कर बोली "दूर का ढोल बड़ा अच्छा लगता है. हर पुरुष को दूसरे की पत्नी अच्छी लगती हैं. अपना दोष कौन स्वीकार करता है." वह थाली लेकर कमरे से निकलती हुई बोली, "मैं कोई दासी नहीं हूं. कल ही यहां से चली जाऊंगी."
रवि ख़ामोश पलंग पर पड़ा था. उसने अपने समक्ष कोई पत्रिका फैला रखी थी, पर उसकी नज़र उपमा की ओर थी. जो बुदबुदाती हुई एक अटैची में अपने कपड़े सहेज रही थी.
वह सोच रहा था इस मुसीबत से मुक्ति कैसे पाई जाए. उसने कलाई घड़ी की ओर देखा-ढाई बज रहे थे. तभी मुन्ना कुनमुनाने लगा. उसका सिर थपथपाते हुए वह उपमा की ओर देखता रहा. जब मुन्ना शांत हो गया तो उसने प्यार से पुकारा, "उपमा!"
उपमा ने मौन उसकी ओर देखा. उसकी नज़रों को देख कर उसने भांप लिया कि उसके अंदर भी एक कोमल भावना खेल रही है. 'समझौते की गुंजाइश है' उसने सोचा और कहा, "आओ उपमा, एक और समझौता करें."
"कितनी बार करेंगे समझौते?" वह धीरे से बोली, "ऐसे समझौते बहुत बार हो चुके हैं."
"एक और सही." वह उतावलेपन से बोला.
वह उसके पास आ बैठी.
"मेरा नया समझौता इस प्रकार है." वह बोला, "आज से हम दोनों स्वतंत्र हैं. हम एक-दूसरे के व्यक्तिगत मामले में हस्तक्षेप नहीं करेंगे. आंतरिक क्षेत्र तुम्हारा है. तुम अपनी इच्छानुसार गृहस्थी चलाओ. आय पर तुम्हारा पूर्णतः अधिकार होगा."
"और आपका क्षेत्र?"
"बाहघ क्षेत्र. आय की पूर्ति करना मेरा काम होगा."
वह मुस्कुराई, "हालांकि आपने अपने लिए बहुत बढ़िया क्षेत्र चुना है, फिर भी गृहस्थी की सुख-शांति के लिए मुझे यह समझौता मंज़ूर है."
कुछ देर के लिए ख़ामोशी छा गई. उपमा ने नीरवता भंग की, "अगर कभी यह प्रश्न उठे कि अमुक बात किसके विभाग में आएगी तो इसका निर्णय कौन करेगा?"
" हम दोनों."
"ठीक है."
और शेष रात दोनों प्यार की नींद सोए.
महीने हीने की पहली तारीख़.
आज ही रवि को पदोन्नति के आदेश का काग़ज़ मिला. वह बहुत ख़ुश था और सोच रहा था कि सचमुच शुभ कार्य शांतिमय वाताबरण में ही संभव है.
क्षण भर में सारे दफ़्तर में यह ख़ुशख़बरी फैल गई. उसके स्टाफ के सारे कर्मचारियों ने उसे आ घेरा. उसे मजबूर होकर एक छोटी सी पार्टी का आयोजन करना पड़ा. वेतन में से कुछ रुपए ख़र्च हो गए.
संध्या समय वह प्रसन्न मुद्रा में घर पहुंचा. उसने वेतन के सारे पैसे उपमा को सौंप दिए, वह पैसे गिन कर बोली, "इसमें तो इतने रुपए कम हैं. इससे समझौता भंग हो रहा है, क्योंकि मेरे क्षेत्र की सीमा का अतिक्रमण हुआ है."
"वह कैसे?" वह संभल कर बोला.
"समझौते के अनुसार आय पर पूर्णतः मेरा अधिकार है. अतः मेरी इजाज़त के बिना आप एक पैसा भी ख़र्च नहीं कर सकते."
"ऐसे कैसे चलेगा उपमा?" वह हताश स्वर में बोला.
"समझौता आपके अनुसार हुआ है, मेरे अनुसार नहीं." वह गंभीर मुद्रा में बोली.
"तुम एक छोटी बात को भी बड़ी बात बना देती हो."
"छोटी-छोटी बातों से भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होता है."
"अच्छा बाबा, ग़लती हो गई." वह मुंह बना कर बोला.
उसकी सूरत पर उपमा को हंसी आ गई. उसने मुंह फेर कर कहा, "मैं मंदिर से होकर आती हूं."
ताश के चक्कर में रवि को आज पुनः देर हो गई. वह आधी रात को घर पहुंचा.
यही सोच-सोच रास्ते भर परेशान रहा कि उपमा आज फिर शोर मचाएगी, पर उसे यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उपमा सामान्य मुद्रा में थी. उसने सोचा कि यह समझौते का परिणाम है.
किन्तु, जब वह भोजनोपरात पलंग पर लेटा तो उपमा भी उसके पास आ बैठी और शांत मुद्रा में बोली, "देखिए जी, आप इतनी देर से रात में न आया कीजिए."
यह भी पढ़ें: अपने रिश्ते के प्रति कितने ज़िम्मेदार हैं आप? (How responsible are you towards your relationship?)
"तुम्हें ऐसा कहने का कोई अधिकार नहीं है." वह तैश में बोला, "समझौते के अनुसार तुम मेरी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधा पहुंचा रही हो."
"कैसे?"
उसने तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा, "मैं कहां जाता हूं, क्यों जाता हूं और कब आता हूं- यह मेरा व्यक्तिगत मामला है. मेरा क्षेत्र भी वाह्य है, अतः तुम्हें इस बारे में रोकटोक करने का कतई अधिकार नहीं है."
"आपका तर्क ग़लत है. वह दायां हाथ नचा कर बोली, "जब मेरे अधिकार पर आघात होगा तो मैं आपके व्यक्तिगत मामले में भी हस्तक्षेप कर सकती हूं. आपकी पत्नी होने के नाते मुझे यह जानने का हक़ है कि आप कहां जाते हैं और क्यों जाते हैं. आप ग़लत रास्ते पर भटकेंगे तो मेरा व्यक्तिगत नुक़सान हो सकता है." कुछ क्षण रुक कर वह आगे बोली, "यह ठीक है कि समझौते के अनुसार आपका क्षेत्र वाहघ है. मगर इसका यह मतलब नहीं कि आप नाजायज़ फ़ायदा उठाएंगे. यदि मैं दरवाज़ा खुले छोड़ कर सो जाती हूं तो घर में कोई चोर या लफंगा घुस सकता है और यदि उसे बंद रखती हूं तो मुझे रात जाग कर बितानी पड़ती है."
"इस समझौते से भी कोई लाभ नहीं है." वह बौखलाए हुए स्वर में बोला, "तुम्हारे तर्क के कारण हमारे बीच शांति रह ही नहीं सकती."
"क्या मैं निरर्थक तर्क कर रही हूं?"
"देखो उपमा, छह वर्ष में दस समझौते हुए, पर कोई समझौता कामयाब नहीं हुआ, अब दूसरा उपाय क्या है?"
"अब तक जितने समझौते हुए उनके मसौदे आपने पेश किए. परस्पर समझ, त्याग और ईमानदारी के बिना कोई भी समझौता कामयाब नहीं हो सकता. आज मैं समझौते का एक मसौदा पेश करती हूं. उसे स्वीकार करेंगे आप?"
"मैं बिल्कुल ऊब चुका हूं इस रोज़-रोज़ की झिकझिक से. तुम जो भी समझौता करोगी वह मुझे मान्य है. तो कहो, क्या चाहती हो?"
"मैं भी तंग आ चुकी है इस रोज़-रोज़ के झगड़े से."
"घर-संसार को प्रेमपूर्वक, शांतिपूर्वक और सुचारुपूर्वक चलाने के लिए समझौते की नहीं, समझदारी की ज़रूरत है. पति-पत्नी के झगडे का निपटारा विभाग या क्षेत्र के बंटवारे से कदापि संभव नहीं है."
"तो फिर?"
"पति-पत्नी में सामंजस्य की भावना होनी चाहिए." उपमा ने मुस्कुरा कर कहा, "पति-पत्नी अपना-अपना व्यक्तित्व अलग-अलग रख कर गृहस्थी की गाड़ी सुचारुपूर्वक औरशांतिपूर्वक नहीं चला मकते, क्योंकि उनका व्यक्तित्व एक है, अलग नहीं. आइए, हम एक-दूसरे को आत्मसमर्पण कर दें यह मेरा नया समझौता."
"तो यह समझौता तुमने पहले क्यों नहीं किया." वह मुस्कुरा कर बोला.
"सफलता तभी मिलती है जब कोई काम उचित समय पर किया जाए." उपमा ने प्यार भरी दृष्टि से उसकी ओर देखा और उसके बालों में उंगलियां उलझा कर बोली, "स्वीकार है आपको यह मेरा नया समझौता?"
"शत प्रतिशत!" कह, उसने मुस्कुरा कर उपमा को अपने बाहुपाश में जकड लिया.
- घनेश्वर प्रसाद
अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES
