कुछ महीनों बाद मॉनसून आया. इस बार वही मोहल्ले पानी में नहीं डूबे. हैंड-पंपों का जल-स्तर ऊपर आया. पार्क हरे थे, गलियां सूखी थीं. स्थानीय अख़बार ने शीर्षक छापा- जहां सरकार नहीं पहुंची, वहां छात्रों ने व्यवस्था को पहुंचा दिया!
विश्वविद्यालय में जल दिवस पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी से लौटते हुए राहुल के शब्दों में बेचैनी थी.
"बचपन से सुन रहे हैं- गरीबी हटाओ, जल बचाओ, विकास लाओ. हर साल बाढ़ आती है, हर गर्मी में पानी का संकट खड़ा हो जाता है. बदलता क्या है? बस सरकारी रिपोर्टों के आंकड़े."
रमेश ने कहा, "समस्या केवल बारिश की नहीं, व्यवस्था की है."
बात वहीं खत्म नहीं हुई.
अगले सप्ताह सोलह जागरूक छात्रों ने एक समूह बनाया. शहर के सोलह मोहल्ले चुने. उन्होंने तय किया कि शिकायत नहीं, शुरुआत करेंगे. घर-घर गए, लोगों को समझाया कि शहर को लंदन बनाने से पहले शहर को अपने ही देश की प्राचीन सभ्यता मोहनजोदड़ो के ड्रेनेज सिस्टम जैसी बेहतरीन व्यवस्था अपनाने की ज़रूरत है. साथ ही पिन्नियों, प्लास्टिक को टाटा बाय करने की ज़रूरत है; जिससे जल का प्राकृतिक बहाव बना रहे.
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जल निकासी व्यवस्था और जल संरक्षण व्यवस्था सुचारू करने के लिए घर व छतों का जल पाइपों से पार्कों और रिचार्ज गड्ढों तक पहुंचाया जाए. छात्रों ने घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा किया; निवासियों को विश्वास में लिया और साथ में निवासियों का अनुभव भी जोड़ा. छात्रों ने वर्षा जल संचयन विशेषज्ञ को भी साथ लिया.
कुछ महीनों बाद मॉनसून आया.
इस बार वही मोहल्ले पानी में नहीं डूबे. हैंड-पंपों का जल-स्तर ऊपर आया. पार्क हरे थे, गलियां सूखी थीं.
स्थानीय अख़बार ने शीर्षक छापा-
जहां सरकार नहीं पहुंची, वहां छात्रों ने व्यवस्था को पहुंचा दिया!
शैतानी वर्ग के बड़े ठेकेदारों और व्यापारियों के कान खड़े हो गए और वह छात्र समूह शैतान वर्ग की आंखों की किरकिरी बन गया.
- नील मणि
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