बाज़ार में चलते हुए भी उसे कई आंखें अपनी ओर देखती हुई प्रतीत हुई. वे सभी मदों की आंखें थीं. अपनी पत्नियों को गालियां देने वाले मर्द. उसे लगा कि चारों ओर मर्दों के उस वातावरण में वह जैसे फंस गई थी.
उस दिन फिर शीला को पति ने डांटा, गालियां दीं, यहां तक कि बूट उठा कर उस पर दे मारा… और वह कुछ न कर सकी.
पति उसी ग़ुस्से में लाल पीला बना अपने काम पर चला गया, बाद में शीला सुबकती रही, आंसू पोंछती रही और मन-ही-मन में जलती-भुनती रही कि उसकी क़िस्मत ही खोटी है, जो हर दूसंरे-चौथे दिन पति की जली-कटी सुननी पड़ती है.
वास्तव में, शीला को पति के ग़ुस्से से बहुत डर लगता था. वैसे, उसका पति कमज़ोर से शरीर का दुबला पतला व्यक्ति था. बारहों महीने ज़ुकाम का मरीज़ और हमेशा सिरदर्द की शिकायत करने वाला हमेशा खीझा रहता. उकताया रहता. सुबह दफ़्तर जाते समय भी झल्लाया हुआ होता, शाम को दफ़्तर में आने पर भी झल्लाया हुआ होता. बहुत कम ऐसे मौक़े आते, जब वह शीला के साथ बैठकर प्यार भरी बातें करता और बाज़ार या किसी और जगह घुमाने ले जाता. तब शीला को उस पर आश्चर्य होता वैसे ही, जैसे किसी सुशील व्यक्ति को बेहद ग़ुस्से की हालत में देखकर आश्चर्य होता है.
शीला सुबकती रही, मन ही मन में उबलती रही और अपनी क़िस्मत को कोसती रही. एक बार उसके मन में आया कि उसी समय घर छोड़ कर चली जाए. पर जाए कहां मायके? वहां से तो इसी घर में रहना अच्छा है. फिर एक बार शीला के मन में ख़्याल आया कि आत्महत्या कर ले और सदा के लिए इन दुखों से छुटकारा पा ले. अपने ऊपर मिट्टी का तेल छिड़क ले और साडी के एक छोर को आग लगा दे. और फिर वह ज्यों-ज्यों सोचती गई, उसके मन में डर भरता गया आग में जलना कितना भयानक होगा! कही वह मर न सकी और सारा शरीर आग में झुलस गया तो?
उन्होंने मां की बात मान ली होती तो क्या वह आज इस घर में होती? इस घर में पति की गालियां और जूते खा रही होती? मां की एक न मानी उन्होंने, आंखें मूंद कर यह रिश्ता कर दिया. मां ने एक और जगह रिश्ते की बात चला रखी थी. सूना था, बहुत अच्छा लड़का था. बहुत ही सुशील स्वभाव और ऊंचे कद का. नौकरी भी अच्छी और घर भी अच्छा, पर पिताजी ने एक न मानी. चारों बेटियां जैसे उनके सिर का बोझ थीं, बस उठा कर जहां देखा फेंक दिया, ख़ुद हल्के हो गए. दूसरी दो बहनों का तो सौभाग्य था कि उन्हें अच्छे वर मिल गए. पर उसकी अपनी क़िस्मत खोटी थी. कहीं पिताजी को ऐसी ज़िन्दगी काटनी पड़े तो पता लगे, ऐसी ज़िन्दगी या तो उसकी क़िस्मत में लिखी है या मां की क़िस्मत में, उस बेचारी ने भी दुखों में ही ज़िन्दगी काटी है. कभी पति के सामने ऊंचा बोल नहीं सकी. पता नहीं, मन में डर की कैसी गांठ बनी हुई है कि ज़ुबान ही नहीं खुलती.
वह रिक्शे वाले को देखती हुई अपने पति के बारे में सोच रही थी. क्या कभी उसके स्वभाव की तल्खी कम नहीं होगी? इस तरह कैसे कटेगी सारी ज़िंदगी? आख़िर वह कब तक उससे दबती रहेगी? आख़िर एक दिन तो…
शीला को एक कहानी याद आई, जो उसने एक पत्रिका में पड़ी थी. उसमें एक पत्नी अपने पति को पीटती है और पति उसके सामने हमेशा भीगी बिल्ली बना रहता है. तब शीला को वह कहानी झूठी लगी थी, पर अब शीला को ख़्याल आया कि कुछ स्त्रियां ऐसी ज़रूर होती होंगी. कहीं उसका पति ऐसी नारी के पल्ले पड़ा होता तो मज़ा आता, पर वह है कि गालियां खाकर भी उसके पैर दबाती है, उसका सिर दबाती है, उसकी हर छोटी-से-छोटी बात का ख़्याल रखती.
शीला ने अपनी आंखें पोंछी, फिर घर में बैठे हुए उसे अजीब-सा लगा. उसका मन घुटने लगा. उसने सोचा कि अपनी सहेली के पास जाए और बातें करके मन हल्का करें, वरना सारा दिन बिताना मुश्किल हो जाएगा.
वह उठी और मुंह-हाथ धोकर तैयार हुई. घर से बाहर निकलते समय उसने देखा, पड़ोसी गला फाड़ कर गाता हुआ उसकी और अजीब सी दृष्टि से देख रहा था. शीला के दिल में आया कि पत्थर उठाकर उसके सिर में दे मारे. मर्द की जात, कैसी भूखी नज़रों से उसे देख रहा है. कोई शर्म हया ही नहीं.
बाज़ार में चलते हुए भी उसे कई आंखें अपनी और देखती हुई प्रतीत हुई. वे सभी मर्दों की आंखें थीं. अपनी पत्नियों को गालियां देने वाले मर्द, अपनी बेटियों की क़िस्मत ख़राब करने वाले मर्द. उसे लगा कि चारों ओर मर्दों के उस वातावरण में वह जैसे फंस गई थी. पर नहीं, उसे कोई कुछ नहीं कह सकता, वह उनका डट कर मुक़ाबला करेगी. किसी ने कुछ कहा तो पांव में से चप्पल निकाल कर दे मारेगी और मार-मार कर सिर गंजा कर देगी. बहुत हो चुका. अब वह…
सामने खड़ा रिक्शा वाला उसे देख रहा था. पास आने पर उसने कहा, “आइए बीबीजी, कहां चलेंगी?” और वह हल्का-सा खांसा.
शीला ने रिक्शे में बैठने पर कहा, “मॉडल टाउन.”
शीला रिक्शे में तन कर बैठी हुई थी. उसने एक नज़र रिक्शे वाले को देखा जब वह रिक्शे के पास खड़ा था तो लम्बा-चौड़ा लग रहा था, पर अब वह सामने की ओर झुका हुआ कुछ छोटा-सा लगा. उसके कन्धे ऊपर उठे हुए थे और गर्दन उनमें धंसी हुई थी. उसकी कमीज कंधों पर से फटी हुई थी. पीठ पर भी कमीज़ दो-तीन जगह से फटी हुई थी और उस पर पसीने के बड़े-बड़े दाग़ थे.
शीला को उससे घृणा सी हुई. कुछ तरस भी आया. पर जब उसे दो तीन हिचकोले लगे और कानों में रिक्शों की खड़-खड़ की आवाज़ गूंजी तो उसे ग़ुस्सा आया. ग़ुस्सा ख़ुद पर भी था और रिक्शे वाले पर भी. कैसा पुराना-सा निकम्मा रिक्शा है. ऐसे झूलता हुआ चल रहा है जैसे गिर पड़ेगा, भला इसमें वह कब पहुंचेगी? और रिक्शे वाला इतना हट्टा-कट्टा आदमी होने पर भी कैसे हौले-हौले चला रहा है.
“जल्दी चलो, ऐसे कब पहुंचेंगे ?” उसने कुछ तल्ख होकर कहा.
रिक्शे वाला एक बार खांसा और उसने कुछ मुड़ कर कहा, “लीजिए, अभी पहुंचाए देता हूं.”
वह रिक्शे वाले की टांगों को ऊपर नीचे जाते हुए देख रही थी. रिक्शे वाले ने छोटी सी निकर पहनी हुई थी, जिसमें उसकी टांगे ज़्यादा लम्बी लग रही थी. वे टांगें बालों से भरी हुई थीं. उसके पांव में नए देशी जूते थे. वे अजीब से लगते थे, जैसे उनका उसके व्यक्तित्व से कोई सम्बन्ध न हो एक रिक्शा पास से निकल कर तेजी से आगे बढ़ गया. शीला का ध्यान टूटा और वह उसे देखने लगी. उस पर दो स्त्रियां बैठी हुई थीं. उसके कानों में पड़ोसी के गाने की आवाज़ आई तो उसका ध्यान उसकी और गया वह गला फाड़ कर गा रहा था. कोई पक्का राग था. शोला को उस पर ग़ुस्सा आया, जब देखो, छत सिर पर उठाए रखता है. जैसे और कोई काम ही नहीं. गाने का इतना ही शौक है तो घर में रेडियो क्यों नहीं रख लेता? सारा दिन सिर खाए रहता है. कैसी भौंडी आवाज़ है. उस आवाज़ से शीला को अपने धोबी का ख़्याल आया. इस बार फिर देर कर दी थी कपड़े लाने में पिछली बार नई साड़ी फाड़ लाया था. इस बार आया तो साड़ी उसके सिर में दे मारेगी. कहेगी, ख़ुद ही पहन ले ओर उसके पैसे भर दे. नहीं भरेगा तो उसकी धुलाई के पैसों में से काट लेगी. ऐसी भौंडी आवाज़ है उसकी भी, जैसे गले में कोई चीज़ फंसी हुई हो. जब देखो. उल्टी ही बात करता है. कभी अपनी ग़लती मानता ही नहीं. बस, पिताजी वाली आदत है. वे भी अपनी ही चलाते थे. कहीं रिक्शा बड़ी तेज़ी से भागता जा रहा था और काफ़ी आगे निकल गया था.
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तभी शीला को अपने रिक्शे वाले पर ग़ुस्सा आया. जैसे बदन में जान ही नहीं है. बस, घर में पत्नी पर ही रौब जमाता होगा, गालियां देता होगा, पीटता होगा, पर इस समय क्या हालत बनी हुई है.
एक क्षण के लिए शीला को लगा, जैसे उसने ही रिक्शे वाले की यह हालत बनाई हुई है, जैसे उसके मुंह में लगाम डाली हुई हो और उसे हांक रही हो. अचानक वह और तनकर बैठ गई और बोली, “अब आगे भी बढ़ोगे? मैं कोई सैर करने नहीं निकली, जो इस तरह धीरे धीरे चला रहे हो. मुझे जल्दी पहुंचना है.”
रिक्शेवाला कुछ न बोला. वह काठी पर से कुछ ऊपर उठ गया और पूरा ज़ोर लगाने लगा. रिक्शे की रफ़्तार बढ़ गई. कुछ ही देर में सामने जा रहे एक रिक्शे से वह आगे निकल गया. शीला ख़ुश हुई. बस, चाबुक पड़ने की देर थी, घोड़ा सरपट दौड़ने लगा है.
आगे रेलवे का पुल था, जरा चढ़ाई चढ़नी पड़ती थी, रिक्शे वाला पुल के पास जाकर रिक्शे पर से उतर गया, शीला के दिल में आया कि वह भी उतर जाए. आमतौर पर सवारियां पुल पर चढ़ते समय रिक्शे में से उतर जाया करती थीं, पर शीला बैठी रही. रिक्शे वाले ने एक बार मुड़ कर उसकी ओर देखा, जैसे वह उसे रुकने के लिए कहेगी. शीला ने उसकी ओर से दृष्टि हटा ली.
कुछ आगे जाने पर रिक्शे वाले को खांसी आई और वह लगातार खांसने लगा. शीला को वह खांसी बहुत खोखली सी लगी. इस बीच में रिक्शे की रफ़्तार कम हो गई थी. खांसी रुकने पर भी उसकी रफ़्तार नहीं बढ़ी. शीला के मुंह से निकला, “अब फिर वही चाल पकड़ ली है. जल्दी करो, इस रफ़्तार से तो मैं रात को ही पहुंचेंगी.”
रिक्शे वाला फिर काठी पर से उठा और ज़ोर लगाने लगा. उस समय वह खड़ा होकर दायें बायें हिलता हुआ रिक्शा चला रहा था. शीला उसके ऊंचे-लम्बे कद को एकटक देखती रही.
कुछ आगे जाने पर शीला ने कहा, “दायें हाथ मोड़ लो रिक्शे को. मेडिकल कॉलेज से होकर फिर मॉडल टाउन जाऊंगी.”
रिक्शेवाला दायें हाथ की सड़क पर मुड़ गया. मेडिकल कॉलेज वहां से लगभग चार मील दूर था. उस सड़क पर न ज़्यादा लोग आ-जा रहे थे, न ही ज़्यादा रिक्शे चल रहे थे, चौड़ी सड़क थी और दोनों ओर खुलापन था. उस खुलेपन में से गुज़रते हुए शीला को बहुत अच्छा लगा. सड़क पर जा रहा कोई व्यक्ति उसकी ओर नज़र उठा कर देखता तो उसे और भी अच्छा लगता.
धूप तेज हो गई थी. रिक्शे वाले की गर्दन पर पसीने की धाराएं बह रही थीं, उसकी कमीज़ का पिछला भाग पसीने से तर था और कमीज़ में से दिखने वाले उसके कन्धों पर पसीने की मोटी-मोटी बूंदें चमक रही थीं. रिक्शे वाला कुछ-कुछ हांफ रहा था.
उसे देख कर शीला के होठों पर हल्की सी मुस्कुराहट आई, फिर वह मुस्कुराहट गायब हो गई और उसके होंठ भिच गए. वह रिक्शे वाले को देखती हुई अपने पति के बारे में सोच रही थी. क्या कभी उसके स्वभाव की तल्खी कम नहीं होगी? इस तरह कैसे कटेगी सारी ज़िन्दगी? आख़िर वह कब तक उससे दबती रहेगी? आख़िर एक दिन तो..
“अरे, अब पहुंचाओगे भी या रास्ते में ही रखोगे?” उसने अचानक रिक्शे वाले को कहा, जो खांस रहा था और पहले की अपेक्षा बहुत धीमी रफ़्तार से रिक्शा चला रहा था.
“बीबीजी, थोड़ा पानी पी लूं, अभी आया.” यह कहते हुए वह रिक्शे पर से उतर कर के किनारे नल पर से पानी पीने चला गया.
नल के नीचे मुंह खोले वह देर तक पीता रहा. फिर, उसने पानी की कुछ छींटें मुंह पर मारे और कुछ पानी अपने सिर में डालकर बालों को मला.
जब वह आ रहा था तो शीला को वह भीगा हुआ चेहरा भयानक सा लगा.
वह फिर रिक्शा चलाने लगा.
आख़िर रिक्शा मेडिकल कॉलेज के जाकर रुका तो शीला चौंकी. भला वह यहां क्यों आई है? यहां तो उसे कोई काम नहीं था हो भी क्या सकता है?… फिर भी, वह रिक्शे से उतरी. उसने इधर-उधर देखा. फिर कुछ बढ़ कर वह एक मेडिकल स्टोर में गई और देर के बाद बिना कुछ ख़रीदे वापस आकर रिक्शे में बैठ गई. उसने एक बार रिक्शे वाले को देखा, जो सड़क के किनारे पेड़ की छांव में अपने ही विचारों में खोया हुआ था.
शीला के आवाज़ देने पर यह आया रिक्शा घुमा कर फिर उसी सड़क पर चला. मॉडल टाउन आने पर शीला के मन में आया कि सहेली के घर जाने की बजाय वापस घर लौट जाए. आख़िर सहेली से क्या बातें करेगी, वही हमेशा वाली बातें होंगी. सहेली भी रोना रोएगी. कई बार तो वह इतना ज़्यादा कहती है कि मन उकता जाता है. और फिर, अब हो गई है. घर जाकर आलुओं वाले परांठे बना और मज़े से खाकर सोएगी. तभी उसने रिक्शे वाले को रुकने के लिए कहा. रिक्शा खड़ा होने पर वह “दोपहर कर दी है तुमने तो खाने के समय अगले के घर जाकर क्या करूंगी? वापस चलो.”
रिक्शे वाले ने एक बार आश्चर्य से देखा. फिर वह उसी सड़क पर वापस हो लिया.
इस बार रास्ते में शीला ने उसे ज़्यादा कुछ नहीं कहा और वह अपने विचारों में खोई रही.
अपने घर की गली में पहुंच कर रिक्शे से उतरी. रिक्शे वाला भी उतरा. शीला को वह सामने खड़ा बहुत बड़ा लगा, पर कैसे हांफ रहा था! कैसा दयनीय चेहरा था उसका देखकर शीला को विचित्र सी तृप्ति का एहसास हुआ. वह जैसे उस पर सवारी करके उसे अपने हुक्म में चलाती रही थी.
– अनिता पदम
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