
उसका शरीर सुन्न हो गया. वह कैसे भी हो उसे ढूंढ़ निकालेगा. उसे सॉरी तक नहीं कह पाया है वह. कनक को कैसे बताए कि उसकी गिल्ट उसे जीने नहीं दे रही है. प्यार न सही, माफ़ी तो दे दे वह उसे बस एक बार. कल शाम फिर जाएगा वह कैफे में!
ऑफिस से निकली, तो देखा अभी टाइम है. वह कैफे में जाकर बैठ गई. कुछ ही दिन पहले खुला है यह कैफे, लेकिन वह अक्सर वहां जाने लगी है. वजह है उसका लुक और एक ऊर्जा से भरता माहौल. दीवारों पर बने रंग-बिरंगे मोजेक, हल्का-हल्का बजता सूफियाना संगीत, कटलरी से लेकर मेज़-कुर्सियों, प्यालों तक में एक अलग रंग और शैली की झलक कुछ देर के लिए उत्साह भर देता है यहां का साजो-सामान और कॉफी. मानो कह रहे हों कि चाहे कितनी ही परेशानियां क्यों न आएं, रंगों से दुनिया को रोशन करते रहो और कॉफी का सिप लेते रहो. कई बार वह सोचती है कि बेशक बोला जाता है कि चाय की तलब उठती है, पर कॉफी आपको उकसाती है, ललचाती है और ख़ुद को पीने को बाध्य करती है. घूंट-घूंट कर गले में धीरे-धीरे उसे उतारते और उसके स्वाद को महसूस करते, सिप किया जाता है.
ज़्यादातर युवा ही आते हैं इस कैफे में. वैरायटी भी तो ख़ूब है कॉफी और सैंडविच की. अकेले लड़के-लड़की ही नहीं, लड़के-लड़कियों के झुंड भी बैठे होते हैं दो-चार मेज़ों को साथ जोड़कर. कई तो घंटों बैठे लैपटॉप पर काम करते रहते हैं. यह कल्चर पिछले कुछ सालों में शुरू हुआ है कि कैफे में जाकर काम भी कर सकते हैं और खा-पी भी सकते हैं. जितनी देर बैठेंगे, फ़ायदा कैफे वाले को ही होगा, आख़िर फिर बार-बार ऑर्डर जो देते रहते हैं. वह कोने की एक मेज़ पर जाकर बैठ गई. अक्सर यहीं बैठती है वह. खिड़की से बाहर की हरियाली और पेड़ों पर टंगी छोटी-छोटी सजावटी लालटेन नज़र आती हैं वहां से. लालटेन के अंदर से निकलती कृत्रिम रोशनी न जाने उसमें कैसी तो ऊर्जा और हिम्मत भर देती है.
कृत्रिम रोशनी बहुत तेज़ नहीं होती, लेकिन अपने आसपास के दायरे में तो प्रकाश फैलाने की क्षमता रखती ही है. जब हिम्मत टूटने लगती है, तो जीतने से ज़्यादा कई बार हारना आसान लगता है. बस तब सरेंडर ही तो करना होता है परिस्थितियों के सामने. टोटल सरेंडर! और बस चुपचाप बैठ जाओ, कोई प्रयास करने की ज़रूरत तक नहीं महसूस होती. पर जब-जब लालटेन की फीकी रोशनी को देखती है, तो लगता है जब यह इस बात से दुखी नहीं कि उसकी रोशनी दूर तक नहीं जाती और लगातार जलती रहती है, तो वह क्यों नहीं फीकी चमक के साथ टिमटिमा नहीं सकती? प्रेम में इतना हारा हुआ महसूस करना… ठीक नहीं है कनक, हज़ारों बार वह समझा चुकी है अपने आपको. सब भूलने की कोशिश करती है पूरी तरह से सरेंडर करके कि बिल्कुल नहीं सोचेगी, लेकिन कुछ दिनों बाद फिर एक ज़िद की तरह वह उसे चुनौती देने लगता हैे.
हिम्मत रखनी ज़रूरी है! वह जब भी कैफे में आती है, मन ही मन इस बात को दोहराती है या शायद वह आती ही इसीलिए है यहां.
कैफे को देखकर वह सोचती है कि उसे एक मूर्त रूप देने, उसे साकार करने में जैसे किसी ने अपने सपनों को उतार दिया है उसके अंदर. सपनों को साकार करने के लिए निर्जीव जगह को भी जीवंत बना दिया है. इंसान चाहे तो क्या नहीं कर सकता! मन हुआ कि रिसेप्शन पर जाकर पूछे कि इसके ओनर से क्या मुलाक़ात हो सकती है. मोटिवेशन और मिल जाए शायद! फिर अपने ही ख़्याल पर उसे हंसी आ जाती है.
वेटर जानता है उसकी पसंद कैपीचीनो और ग्रिल्ड सैंडविच. वह आकर खड़ा अवश्य हुआ था ऑर्डर लेने के ख़्याल से. फिर जब उसने रिपीट कहा, तो मुस्कुराता हुआ चला गया था. कुछ देर बाद कैपीचीनो और ग्रिल्ड सैंडविच रख गया था. देख रही है कि कॉफी ठंडी हो रही है, फिर भी अभी तक सिप नहीं लिया था. इंतज़ार क्यों कर रही है और किसका? बस आदत सी हो गई है. मेज़ पर आकर बैठती है, वेटर कॉफी रख जाता है और वह कॉफी को ठंडी होते देखती रहती है. हर रोज़ वह ख़ुद से ही यही सवाल करती है आख़िर वेटर को क्यों नहीं कहती कि थोड़ा रुक कर लाना.
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वह तो रोज़ यह सवाल भी करती है कि आख़िर वह इसी कैफे में क्यों आती है बार-बार? उसे तो यहां आना तभी छोड़ देना चाहिए था जब शुभम ने इसी कैफे की किसी टेबल पर कॉफी का सिप लेते हुए कहा था, “लगता है बस इतना ही था हमारा साथ. हर रिश्ते मुकाम पर पहुंचे, ज़रूरी तो नहीं. हर साथ मंज़िल एक साथ तय करे, ज़रूरी तो नहीं. कभी-कभी रास्ते बदलना ही ठीक रहता है.” उससे गुडबाय कहता हुआ लापरवाही से हाथ हिलाता हुआ चला गया था वह.
लेकिन वह फिर भी यहां आती है. शायद ख़ुद को मज़बूत करने के लिए या उस टिमटिमाती लालटेन से प्रेरणा लेने के लिए. तभी तो अब दर्द नहीं होता… सच है अगर किसी चीज़ से लड़कर बाहर आना है, तो चुनौती इंसान को ख़ुद को ही देनी चाहिए!
कॉफी का कप उठाने लगी थी कि रुक गई. उसे देखने से पहले ही वह उसे सुन सकती है, जैसे हवाएं उसके कानों में आकर फुसफुसा जाती हैं कि वह यहीं कहीं है आसपास. महसूस कर लेती है वह उसके होने को बहुत आसानी से.
दरवाज़ा खुला. दरवाज़े के ऊपर लगी छोटी सी घंटी बजी. मानो उसकी उपस्थिति को दर्ज करने के लिए कोई धुन बजाई हो. दरवाज़ा खुलने पर हर आने वाले के स्वागत के लिए घंटी बजती है, पर जब वह प्रवेश करता है, तो घंटी की आवाज़ जैसे किसी धुन में बदल जाती है. सुर, ताल, लय, रिद्म… सब यकायक एकाकार हो जाते हैं.
उसने कॉफी का एक घूंट भरा, सैंडविच का टुकड़ा कुतरा. मोबाइल देखने के बहाने चोर निगाहों से उसे देखने लगी. बिल्कुल भी नहीं बदला है. काले, चमकीले बाल हमेशा की तरह कायदे से सेट थे. हाथों में गर्मी लाने के लिए उसने उन्हें रगड़ा. आदत गई नहीं है उसकी यह. सर्दी हो या गर्मी वह ऐसा करता ही है. जैसे मौसम को अपनी हथेलियां में उतार लेना चाहता हो मेहंदी की ख़ुशबू की तरह! टाइट जींस और शर्ट में फैशन आइकन आज भी दिख रहा था. अच्छे-अच्छे फैशन स्टाइलिस्ट को मात देने की क़ाबिलियत रखता है. उसके परफ्यूम की महक यहां-वहां फैल गई. लैपटॉप में सिर घुसाए बैठी कुछ लड़कियों के चेहरे उठे उसे देखने के लिए. उन्हें क्या पता कि उसके जिस्म से भी एक महक आती है, जिसे केवल वह ही महसूस कर सकती है.
उसने काउंटर पर जाकर कॉफी का ऑर्डर दिया. वह काउंटर से दूर बैठी थी, इसलिए सुन नहीं पाई कि क्या ऑर्डर किया है. क्या उसे अभी भी आइरिश कॉफी ही पसंद है या कोई और फ्लेवर पीने लगा है? हो सकता है बदल गई हों उसकी आदतें.
मेज़ तलाशने के लिए उसने नज़रें घुमाईं. देखा उसने. वह उसकी ओर आया. होंठों पर प्यारी सी मुस्कान थिरक रही थी. उसके गाल चूमते हुए बोला, “व्हाट ए प्लेज़ेंट सरप्राइज़! कैसी हो? क्या चल रहा है और यहां क्या कर रही हो तुम कनक?”
कितना सहज है अभी भी… कनक को एहसास हुआ कि न जाने कब से वह इस आवाज़ को मिस कर रही है. दो साल से गुपचुप बैठी तितलियां उसके शरीर में चक्कर काटने लगीं. दिल-दिमाग़, शरीर के हर अंग में एक अजीब सी चहलकदमी शुरू कर दी थी उन बेचैनी और अधीरता की तितलियों ने. बीते दिनों की बातें कितने सवालों के साथ उसके मन के बंद कपाटों पर थिरक-थिरक कर दस्तक देने लगी थीं.
उसका कनक को देखना. वह अपने भीतर एक ख़ुशी की धारा बहती महसूस कर रही थी. शायद अभी भी उसकी परवाह करता हो या शायद प्यार अभी भी बचा हो.
वे दोनों क्या कर रहे हैं, जॉब से ख़ुश हैं कि नहीं, फिर ये सब बातें शुरू हो गईं. बीते दिनों की कोई भी बात उठाने से दोनों ही डर रहे थे. कनक का दिल तोड़ा है उसने. न जाने कैसे संभाला होगा कनक ने अपने आपको. कितनी टूटी होगी कनक. वह उससे पूछना चाहता था कि क्या वह उसे माफ़ कर सकेगी, लेकिन हिम्मत ही नहीं हुई.
कनक को क्या पता कि टूटा तो वह भी है.
कनक ने अपने पास रखी फाइल जिसे उसने उसके आने से पहले खोला ही था, बंद कर दी. काम नहीं करती वह आकर, बस फाइल फैला लेती है, ताकि औरों की तरह वह भी व्यस्त लगे, ताकि उसे यों अकेले बैठा देख कोई परिचय बढ़ाने के लिए उसकी सामने वाली कुर्सी पर आकर न बैठ जाए. अक्सर वह अपना बैग रख देती है दूसरी कुर्सी पर.
ध्यान से देखा उसने शुभम को. वैसे बदल तो वह भी गया है. अल्हड़ता की जगह मैच्योरिटी ने ले ली है. उसकी चाल में भी वह अहंकार भाव नहीं दिखा उसे, जो कभी हुआ करता था. सधे कदमों से नियंत्रित चाल से प्रवेश किया था उसने कैफे के अंदर. आंखों में भी वह नूर नहीं दिख रहा था, जो देखने वाले को आकर्षित कर जाता था.
शुभम ने हाथ मेज़ पर रखा हुआ था. कनक ने अपना कप उठाया तो उसकी उंगलियां छू गईं. एक थरथराहट हुई उसके पोरों में. स्पर्श में वैसी ही गुनगुनाहट थी, जो पहले हुआ करती थी. घंटों वह उसका हाथ थामे बैठी रहती थी. शुभम ने हाथ नहीं हटाया. वह चाह रहा था कि पहले की तरह कनक उसका हाथ थामे बैठी रहे. लेकिन कनक ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया था. बदल तो कनक भी गई है! पहले जैसी घबराहट अब उसके व्यक्तित्व से नहीं झलकती. आत्मविश्वास के गुच्छे उसके चेहरे पर, आंखों में, हर जगह शान से लटके दिखाई दिए. अच्छा ही है, शुभम ने सोचा कम से कम इस आत्मविश्वास ने उसे उसके दिए दर्द से बाहर निकलने में मदद की होगी.
मोबाइल पर बार-बार टाइम देखते देख शुभम ने पूछा, “जल्दी है? कहीं जाना है?”
“हां रिसर्च वर्क कर रही हूं्. उसी के लिए अपने गाइड से मिलने जाना है. साढ़े सात बजे बुलाया है उन्होंने.”
“वाह, जॉब के साथ रिसर्च भी कर रही हो. ख़ूब व्यस्त रहती होंगी फिर तो?”
“व्यस्त रहना ज़िंदगी जीने का सबसे ख़ूबसूरत ढंग है. तुम्हें नहीं लगता ऐसा?”
शुभम जानता है क्यों कर रही है वह ऐसा सवाल! जिस अकेलेपन के साथ वह उसे छोड़ गया था, उसे भरने के लिए व्यस्त रहने से बेहतर और क्या विकल्प हो सकता था कनक के लिए.
“चलती हूं.”
“मेरा मोबाइल नंबर वही है. पुराना वाला.” अचानक शुभम के मुंह से निकला. जैसे चाहता हो कि वह उसके संपर्क में रहे. बातचीत का सिलसिला फिर से शुरू करना चाहता हो जैसे. उसके जाने के बाद शुभम को एहसास हुआ कि कनक का नंबर या पता तक नहीं लिया उसने.
अगले दिन भी वह उसी कैफे में आया. कनक नहीं दिखी कहीं. काफ़ी देर तक बैठा रहा इस उम्मीद में कि शायद आ जाए. दो साल तक उसकी कोई ख़बर नहीं ली थी तो आज क्यों जानना चाहता है वह उसके बारे में! क्यों कर रहा उसका इंतज़ार? गिल्ट है या प्यार खींच
रहा है? कनक से उसने रिश्ता तोड़ा, क्योंकि चुलबुली सरिता उसके जीवन में आ गई थी. माता-पिता की पसंद, अमीर पिता की इकलौती संतान… शादी हुई और टूट भी गई. जाते-जाते कहा था सरिता ने, “तुम न प्यार करना जानते हो न निभाना, इसलिए प्यार पाने के भी हक़दार नहीं हो.”
तो क्या वह कनक से फिर से जुड़कर सरिता को जताना चाहता था कि वह प्यार पाने का हक़दार है?
शुभम ने फेसबुक पर कनक का प्रोफाइल चेक किया. धोखा दिए जाने से जुड़ी बहुत सारी कविताएं थीं. उसके पापा गुज़र गए हैं, यह भी पता चला. इसके अलावा और कोई ख़ास पोस्ट नहीं थी, जिससे वह जान सके कि उसकी ज़िंदगी में इस समय क्या चल रहा है. उसने मैसेंजर पर जाकर उसे मैसेज लिखा- हेलो!..
इससे अधिक कुछ लिखने का साहस भी नहीं है उसमें.
कोई जवाब नहीं आया. वह कैफे से बाहर निकल यूं ही सड़क पर चलने लगा. वह बार-बार अपने हाथों को रगड़ रहा था जैसे ख़ुद को तसल्ली देना चाहता हो कि अगर वह जवाब नहीं देगी, तो भी वह उसे ग़लत नहीं मान सकता. मैसेज तो वह बहुत देर पहले देख चुकी थी उसका! वह क्यों चाहेगी कि एक बार फिर से उसका दिल दुखे. शुभम पर विश्वास क्यों करे वह?
कुछ देर बाद उसने फिर उसका प्रोफाइल चेक किया. बहुत देर तक ढूंढ़ता रहा. कहीं नहीं दिखा. उसके नाम से बहुत बार सर्च किया, नहीं दिखा. शुभम को ब्लॉक कर दिया था कनक ने. उसका शरीर सुन्न हो गया. वह कैसे भी हो उसे ढूंढ़ निकालेगा. उसे सॉरी तक नहीं कह पाया है वह. कनक को कैसे बताए कि उसकी गिल्ट उसे जीने नहीं दे रही है. प्यार न सही, माफ़ी तो दे दे वह उसे बस एक बार. कल शाम फिर जाएगा वह कैफे में!

