भोपाल गैस ट्रैजेडी- दर्द के वो 32 साल (Bhopal Gas Tragedy- painful 32 years)

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झूठ कहते हैं लोग कि समय के साथ दर्द का एहसास कम होने लगता है, क्योंकि आज भी वो मंज़र भोपाल में देखने को मिल जाता है. एक ऐसा दिन, जिसने न जाने कितनी ज़िंदगियां लील लीं. न जाने कितनी मांओं की गोद सूनी हो गई, घर का चिराग़ बुझ गया और न जाने ऐसे ही कितने दर्द का एहसास भोपाल के लोगों ने उस दिन किया. उस घटना को 32 साल हो चुके हैं, लेकिन ऐसा लगता है जैसे अभी की बात हो. मन मानने को तैयार ही नहीं होता कि ऐसा भी कुछ हो सकता है, जिससे स़िर्फ आज ही नहीं, बल्कि आनेवाला कल भी बर्बाद हो जाएगा.

क्या थी घटना?
भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड नामक कंपनी के कारखाने से एक ज़हरीली गैस का रिसाव हुआ, जिससे लगभग 15000 से अधिक लोगों की जान गई और बहुत सारे लोग कई तरह की शारीरिक अपंगता से लेकर अंधेपन के भी शिकार हुए. भोपाल गैस कांड में मिथाइलआइसोसाइनाइट (मिक) नामक ज़हरीली गैस का रिसाव हुआ था, जिसका उपयोग कीटनाशक बनाने के लिए किया जाता था. भोपाल गैस त्रासदी को लगातार मानवीय समुदाय और पर्यावरण को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिना जाता है.

दर्द बढ़ाने वाला था साल 1984 का दिसंबर माह
दिसंबर की कड़ाके की ठंड में अपने-अपने घरों में सोए लोगों को इस बात का बिल्कुल एहसास नहीं था कि ये माह उन्हें दर्द का ऐसा एहसास कराएगा कि उनकी आनेवाली पीढ़ियां भी नहीं भूल पाएंगी.

उस काली रात की सुबह भी काली थी
आज भी भोपाल गैस ट्रैजेडी को याद करते मन सिहर जाता है. आधी रात को जब यूनियन कार्बाइड से गैस लीक होना शुरू हुई, तो सुबह होने तक उस गैस ने न जाने कितनी ही ज़िंदगियों को अपनी आगोश में ले लिया था. कहने को तो सूरज नया सवेरा लेकर आया था, लेकिन असल में भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिए वो काला सवेरा था. सुबह की हर एक किरण दर्द का आभास करा रही थी. चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल, लोगों की आंखों में सूखे आंसू, अपनों के खोने का डर, उजड़ते सपने और न जाने ऐसे ही कितने दर्द का एहसास समेटे लोग इधर-उधर भाग रहे थे. दुनिया भर की मीडिया लोगों को कैमरे में ़कैद करने के लिए भोपाल पहुंच चुकी थी, लेकिन ख़ुद भोपाल कहीं खो-सा गया था.

…और भोपाल ग़ुम हो गया दर्द के साये में
ये पहला ऐसा वाकया था, जिसने भोपाल ही नहीं, बल्कि पूरे देश को हिला कर रख दिया. एक ऐसी त्रासदी, जिसके लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाए, समझ ही नहीं आ रहा था. इस त्रासदी में वो पहले का हंसता-खेलता और चहकता भोपाल सदा के लिए दुख के साये में समा गया था. पूरा शहर थम-सा गया था. जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था.

भयावह मंज़र
उस समय भोपाल में ख़बरों के लिए मीडिया का तांता लगा था. कई पत्रकार उस भयावह मंज़र का गवाह बने. जब ये पत्रकार भोपाल शहर में पहुंचे, तो उन्हें लाशें ही लाशें दिखाई दीं. चाहे इंसान हों या जानवर, मौत सबको लील चुकी थी. उस मंज़र को देखकर एक बात तो साफ़ हो गई थी कि मौत किसी में भेद नहीं करती. उस निर्मम ने तो मासूम बच्चों तक को नहीं छोड़ा.

परिवार तबाह… आशाएं ख़त्म… सपने हुए चूर-चूर
यूनियन कार्बाइड कंपनी के कारखाने के सामनेवाली बस्ती पर इस गैस का असर सबसे ज़्यादा हुआ. बस्ती में तबाही का मज़र था. लोगों की आंखों पर ठंडी पट्टियां बंधीं थीं, लेकिन सामने घनघोर अंधियारा था. रात में सोते समय सुनहरे सपने देखनेवाली आंखें अब सदा के लिए अंधी हो चुकी थीं. परिवार का परिवार तबाह हो चुका था. उनकी आशाएं अब ख़त्म हो चुकी थीं. परिवार के सपने चूर-चूर हो चुके थे.

एक ऐसी बीमारी मिली, जिसका इलाज नहीं
ये एक ऐसी घटना थी, जिसने भोपाल वासियों को एक ऐसी बीमारी सौगात में दे गई, जिसका इलाज संभव नहीं. पीढ़ियां बर्बाद हो गईं. पूरी नस्ल ख़राब हो गई. होनेवाले बच्चे बीमार और अपंग हुए. आख़िर उन मासूमों का क्या कसूर था, जो अपनी मां के पेट में थे. बात वहीं ख़त्म नहीं हुई. उन बच्चों के बच्चे भी न उस गैस की वजह से कई बीमारियों के चंगुल में फंस गए.

भोपाल में शादी करने से कतराने लगे थे लोग
यह औद्योगिक दुर्घटना पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दी की आख़िर इस तरक्क़ी से क्या फ़ायदा, जो इंसानी ज़िंदगी को ही तबाह कर दे, लेकिन देश के अंदर कुछ ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने इस घटना के बाद अपने बच्चों का विवाह तक भोपाल के लोगों से करना पसंद नहीं किया. ऐसी बहुत सी बातें आसपास से सुनने को मिलती रही हैं कि वहां कौन शादी करेगा, आनेवाली पीढ़ी भी बीमार पैदा होगी.

भोपाल के लोगों पर जो बीता उसे भुलाया नहीं जा सकता. आज भी लोग उस घटना को अपने भीतर समेटे हुए सिहर जाते हैं. इंसान होने के नाते हमें इस तरह की स्थिति होने पर लोगों का सपोर्ट करना चाहिए और आगे बढ़कर लोगों की मदद करनी चाहिए.

– श्वेता सिंह