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हंसकर न टालें बच्चों की ग़लतियों को

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बच्चों की मासूमियत और भोली नादानियां सभी को लुभाती हैं... लेकिन यही नादानियां कब ग़लतियों में तब्दील हो जाती हैं, अभिभावक समझ ही नहीं पाते. ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि बच्चों के सही विकास और उचित मार्गदर्शन के लिए उनकी हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान दें और उनकी ग़लतियों को हंसकर न टालें, वरना आगे चलकर यही ग़लतियां गंभीर रूप धारण कर सकती हैं.
  ग़लतियां किससे नहीं होतीं? फिर बच्चे तो बच्चे हैं. ग़लतियां करेंगे ही. ऐसे में अभिभावकों की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि समय-समय पर बच्चों को सही व ग़लत का फ़र्क़ समझाएं. इस बारे में मनोचिकित्सक टी.पी. जिंदल कहते हैं, “बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं. उन्हें अभिभावक जिस सांचे में ढालेंगे, वे ढलते चले जाएंगे. बच्चे की रुचि, आदतें, व्यवहार आदि बातें अभिभावक के व्यवहार पर निर्भर करती हैं.” मनोवैज्ञानिक डॉ. लॉरेंस के. फ्रेंक के अनुसार, “विकास की तीन स्थितियां हैं- ‘मत करो’, ‘करो’ और ‘क्यों’. जैसे ही बच्चा क्रियाशील होता है और आसपास के परिवेश के बारे में समझना प्रारंभ करता है- ‘मिट्टी मुंह में डालता है’, ‘उंगली नाक या मुंह में डालता है’, अथवा ‘यौनांगों को छूता है’, पैरेंट्स उसे ‘मत करो’, कहकर रोकते हैं. प्रायः ‘मत करो’ के साथ-साथ ‘करो’ या ‘करना चाहिए’ की स्थिति भी चलती रहती है- ‘दांत साफ़ करो’, ‘ठीक से कपड़े पहनो’ आदि आचरण और व्यवहार संबंधी ऐसी अनेक बातें बच्चा सीखता है. ज्यों-ज्यों बच्चा बड़ा होता है, जीवन और दुनिया के प्रति उसकी जिज्ञासाएं- ‘ऐसा क्यों होता है?’, ‘वैसा क्यों होता है?’ आदि बढ़ने लगती हैं. ऐसे में अपने अनुभव के आधार पर बच्चा यह समझने लगता है कि किस काम को करने पर पैरेंट्स ख़ुश होते हैं. फिर जब पैरेंट्स उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ कर हंसते हैं, तो वह समझ ही नहीं पाता कि वह ग़लत है. यही ग़लतियां धीरे-धीरे उसकी आदत बन जाती हैं और उसे बुरी मनोवृत्तियों की ओर उन्मुख करती हैं. नतीज़तन बच्चा झूठ बोलने लगता है, ज़िद्दी हो जाता है और कभी-कभी ग़लत संगत में भी पड़ जाता है. हर अभिभावक का सपना होता है कि उनका बच्चा समझदार, संस्कारी और आज्ञाकारी बने, पर बच्चा संस्कारी तभी बनता है, जब घर का वातावरण स्वस्थ हो. मनोचिकित्सक अरुणा ब्रूटा के अनुसार, “बच्चों के संस्कारी न होने के 2 प्रमुख कारण हैं. पहला- आज संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार ने ले ली है, जिसके कारण बच्चे बुज़ुर्गों से मिलनेवाले संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं. दूसरा- पैरेंट्स कामकाजी होने के कारण बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं और इसकी क्षतिपूर्ति वे उनकी फ़रमाइशों को पूरा करके करते हैं. अधिक लाड-प्यार में उनकी ग़लतियों को अनदेखा कर देते हैं या हंसकर टाल देते हैं. उनका ऐसा करना ही बच्चे को बुरी प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर करता है. अत: ज़रूरी है कि अभिभावक समय रहते अपने बच्चों की मनोवृत्तियों को समझें और उनका सही मार्गदर्शन करें.” 16
क्या करें अभिभावक?
घर में बच्चों को उचित माहौल दें, जिससे उनमें दूषित मनोवृत्ति न पनपने पाए, क्योंकि घर का आदर्श वातावरण बच्चों के सही व स्वस्थ विकास के लिए ज़रूरी है. बच्चों में अनुकरण करने की प्रवृत्ति होती है. अभिभावक जैसा व्यवहार व आचरण उनके साथ करेंगे, वे भी वैसा ही सीखेंगे. अत: अपना व्यवहार संतुलित रखें. बच्चों के साथ न तो अधिक सख़्ती से पेश आएं और न ही अधिक लाड-प्यार दिखाएं. उनकी समस्याओं को धैर्यपूर्वक सुनें और समझकर उचित समाधान करें. बच्चों के बुरी संगत में पड़ने का कारण जानने का प्रयास करें. उन्हें मारने-पीटने की बजाय उन कारणों का निवारण करें. बच्चों को उनकी ज़रूरत के अनुसार ही पॉकेट मनी दें. ज़्यादा पॉकेट मनी देने से उनमें बुरी संगत, फ़िज़ूलख़र्ची आदि आदतें पड़ने लगती हैं. अभिभावक द्वारा अपनाए गए सुरक्षापूर्ण रवैए से बच्चे बाहरी दुनिया को सीखने-समझने से वंचित रह जाते हैं. अत: बच्चों को उनकी नज़रों से दुनिया देखने दें. बच्चों के दोस्तों पर नज़र रखें. उन्हें घर बुलाएं तथा उनकी आदतों, परिवार आदि के बारे में जानकारी रखें. पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ उनके अंदर छिपी प्रतिभा को खोजें और प्रोत्साहन दें. अभिभावक व्यस्त होने पर भी समय-समय पर बच्चों के शिक्षक से मिलकर उनकी प्रगति के बारे में जानकारी अवश्य लें. बच्चों की गैरज़रूरी फ़रमाइशें पूरी न करें. इससे वे जब-तब ज़िद करके अपनी बातें मनवाएंगे. बच्चों को अपने काम स्वयं करने दें. इससे वे आत्मनिर्भर बनेंगे. ग़लती करने पर बच्चों को दूसरों के सामने अपमानित न करें. बच्चों पर अपने फैसले ज़बरदस्ती न थोपें. उन्हें अपनी रुचि व क्षमता के अनुसार स्वयं फैसले लेने दें. समयानुसार सेक्स संबंधी बातों से बच्चों को अवगत कराते रहें, जिससे उम्र के नाज़ुक दौर में अज्ञानतावश वे कोई अनुचित क़दम न उठा लें. बच्चों के साथ बैठकर टीवी देखें और उनकी पसंद को जानें. कुछ अनुचित देखने पर उन्हें प्यार से समझाएं. इंटरनेट इस्तेमाल करते समय बच्चे पर निगरानी रखें. कहीं वह पोर्न साइट्स तो नहीं देख रहा है. बच्चों को अच्छी पुस्तकें व साहित्य पढ़ने को दें. इससे उनमें पढ़ने की आदत विकसित होगी. साथ ही महान लोगों के अच्छे विचार व संस्कार उन्हें गुमराह होने से बचाएंगे. दूसरे बच्चों से तुलना न करें. इससे उनके मन में ईर्ष्या अथवा हीनभावना पनप सकती है. बच्चों के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करें, ताकि बच्चे भी आपके साथ कम्फ़र्टेबल फील कर अपनी समस्याएं आपसे शेयर करें. बच्चों को उनकी योग्यता व क्षमता से अधिक ऊंचे सपने न दिखाएं. इससे उन पर मानसिक दबाव पड़ेगा और वे डिप्रेशन में भी जा सकते हैं. अभिभावकों को यह भी समझना चाहिए कि बाल मन बहुत कोमल होता है. अपनी उम्र के हर अनुभव उन्हें पूरी तरह से याद रहते हैं. इसलिए उनका यह कर्त्तव्य है कि बच्चों की ग़लतियों को नज़रअंदाज़ कर टालें नहीं, बल्कि उचित मार्गदर्शन कर उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाएं. इसी में सबका हित निहित है.
- डॉ. विमला मल्होत्रा

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