पहला अफेयर: ज़ख़्म सहलाए नहीं… (Pahla Affair: Zakhm Sehlaye Nahi…)

Pahla Affair: Zakhm Sehlaye Nahi

पहला अफेयर: ज़ख़्म सहलाए नहीं… (Pahla Affair: Zakhm Sehlaye Nahi…)

उस रोज़ तरुण से सामना हुआ, तो बहुत ख़फा-ख़फा लगा. सबब पूछा, तो बोला, “पापा को फिर से दिल का दौरा पड़ा है. मौत से लड़ रहे हैं.” सुनकर दिल में एक अजीब-सी हलचल मची. कारण- कुछ दिन पहले तरुण से ही मालूम हुआ था कि उसकी कानपुर वाली मामी की भतीजी, जो मेडिकल कर रही है, वहां से उसके लिए रिश्ता आया है. “एक तो मां के पक्ष का रिश्ता, फिर अमीर पिता की बेटी, तिस पर मां उसकी सुंदरता की तारीफ़ों के पुल बांधते नहीं थकती.” फिर कुछ रुककर वह बोला था, “पापा तो बस बीमार अवस्था में बिस्तर पर लेटे-लेटे, ख़ामोश निगाहों से छत की कड़ियां गिनते हैं.” उसकी उदासी ने मुझे भी बहुत उदास कर दिया.

तरुण से मेरी पहली मुलाक़ात कॉलेज के कॉरीडोर में मेरी सखी रेखा ने करवाई थी. “इनसे मिलो, ये हैं मियां तरुण. हमारे कॉलेज की जान, कुड़ियों की शान. गाने में तानसेन और कविताएं ऐसी लिखते हैं कि कालीदास और निराला को भी मात दे जाएं.” मेरे कॉलेज का वो पहला दिन मेरी ज़िंदगी का बहुत ख़ास दिन बन गया.

मैं शुरू से ही शर्मीली, अपने आप में गुमसुम रहनेवाली लड़की थी. संगीत की थोड़ी-बहुत शिक्षा मैंने भी ली थी. उस दिन हम दोनों पार्क में घास पर बैठे थे. तरुण की फ़रमाइश पर मैंने एक ग़ज़ल गुनगुनाई-
चिराग़ इश्क़ के हुए जो रौशन,
जहां हसरतों का खिल उठा…
मिली तुमसे निगाह,
हर एहसास चुलबुला उठा…
फ़िज़ाएं भी सुर की सरगम में शामिल हो लीं उस दिन. तरुण ने मेरा हाथ थाम इतना ही कहा, “मीरा, शायद हम दोनों एक-दूजे के लिए ही बने हैं. ये साथ जीवनभर का हो, तो कैसा रहेगा?” वो लम्हा, मेरी ज़िंदगी
का ख़ास लम्हा बन गया. मैं अक्सर तन्हाई में गुनगुनाया करती-
चंद लम्हों का हमें साथ मिला है दोस्त…
चंद लम्हों को तो, ख़ुशबू में लपेटा जाए…

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मेरे सेकंड ईयर के पेपर ख़त्म होते ही मैं अपनी नानी के घर राजकोट आ गई. कुछ ही दिन बीते थे कि एक दिन मां की चिट्ठी मिली. दो ही ख़बरें मेरे वजूद को हिलाने के लिए काफ़ी थीं. तरुण के पिता का देहांत और तरुण का कानपुर में रिश्ता पक्का होना. तरुण ने पिता की बात का मान रखा, उनकी रूह को राहत दी और मेरी रूह को लाश बना दिया.

कभी-कभी ऐसा क्यों लगता है, जैसे हमारे ऊपर से रेत-सा कुछ सरक रहा है. मुझे यह एहसास होने लगा कि ख़ुशियां कभी खून से सने दरवाज़ों पर दस्तक नहीं देतीं. क्यों तरुण की भीतरी ज़मीन पर किसी पराए पेड़ का साया पड़ गया है? मुझे यूं लगने लगा कि वो पेड़ किसी कंटीली झाड़ी का रूप ले रहा है. और… मैं उसमें धंसती जा रही हूं. एक सूखा तालाब… दलदल… मुरझाए फूल… एक बेदम हाथी-सी मैं कीचड़ में फंसी… तड़प रही हूं, छटपटा रही हूं… मैंने बहुत बार पतझड़ में फूलों को झड़ते हुए देखा है और आज…?

उ़फ्! बस, एक ही फूल था, उस डाल पर… आंधियों के बवंडर से वो भी झड़ गया… मैंने काग़ज़ उठाया और सोचा तरुण के नाम लिखूं एक आख़िरी पैग़ाम. हाथ ऐसे कांपे कि क़लम हाथ से छूटते-छूटते बची. ऐसी नाज़ुक घड़ियों में काग़ज़-क़लम सभी धोखा दे जाते हैं. ऐसे में शब्दों का साथ भी छूटने लगता है- शायद यहीं से हमारे रिश्तों के रिसने की शुरुआत भी हो रही थी… फिर भी दिल को मज़बूती से पकड़ मैंने तरुण को एक पुर्ज़ा लिखही डाला-
हवाओं की बेरुख़ी, चिराग़ हमने जलाए नहीं
ज़ख़्म जो गहराए, तो हमने सहलाए नहीं…
उठे दिल से जो हूक, तो प्यार भरा इक ख़त लिखना…
तुम्हारी मीरा,

– मीरा हींगोरानी

 

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