पहला अफेयर: दिल क्यों दिया… (Pahla Affair: Dil Kyun Diya)

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पहला अफेयर: दिल क्यों दिया…

कॉलेज पूरा होते ही मुझे एक बैंक में सर्विस मिल गई. मैं बहुत ख़ुश थी. आत्मनिर्भर होने का एहसास अलग ही होता है, इसलिए मैं स्वयं पर गर्वान्वित थी.

अपने काम को मैं दिल लगाकर किया करती थी, ताकि मेरे काम में कोई कमी न निकाल दे. व़क़्त इसी तरह बीत रहा था. एक दिन बैंक में एक स्मार्ट नौजवान आया, अपना अकाउंट खुलवाने के लिए. जानकारी व पूछताछ के लिए वह मेरे काउंटर पर आया. इसके बाद वो अक्सर बैंक में आने लगा. कभी खाते में पैसा डिपोज़िट करने के लिए तो कभी पैसा निकलवाने के लिए. जब भी वो मेरे काउन्टर पर आता तो ऐसे लगता जैसे वो मुझसे कुछ कहना चाह रहा हो.

एक दिन जब वह मेरे काउटंर पर आया तो ज़्यादा भीड़ नहीं थी. वह मौक़ा मिलते ही बोल पड़ा, “मैं आदित्य शर्मा, सिंचाई विभाग में कार्यरत हूं. आप बहुत ख़ूबसूरत हैं. आपकी शालीनता, सौम्यता, गंभीरता और इन सबके साथ आपके चेहरे पर कभी-कभी आनेवाली मुस्कुराहट किसी को भी अपनी तरफ़ खींच सकती है.”

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अपनी तारीफ़ सुनकर मैं मन ही मन बहुत ख़ुश हुई. उसे देख मेरे चेहरे की रौनक अचानक बढ़ जाती. शायद उसे भी इस बात का एहसास हो गया था. अब आदित्य बैंक के काम से कम और मुझसे मिलने ज़्यादा आता.

मुझ पर भी आदित्य का नशा चढ़ने लगा. उसकी आवाज़ मेरे कानों में हर पल गूंजती रहती. उसका चेहरा हर पल मेरी आंखों के सामने छाया रहता. मुझे लगने लगा कि मैं उससे प्यार करने लगी हूं. और यही एहसास मुझे आदित्य की बातों मेें भी नज़र आने लगा. पर मैं प्यार के चक्कर से दूर ही रहना चाहती थी. जब हक़ीक़त के धरातल पर सोचने लगी तो मैंने अपने आपको सतर्क कर लिया. इसीलिए जब आदित्य ने मुझसे मेरा मोबाइल नंबर मांगा तो मैंने उसे यह कहकर टाल दिया कि ये मोबाइल अक्सर मेरे पापा के पास ही रहता है.

आदित्य जब भी काउंटर पर आता तो मैं उससे कतराने लगती, क्योंकि मुझे मेरी ग़लती का एहसास हो गया था. मैं सपनों की दुनिया से यथार्थ में आ गई थी. जो हासिल नहीं हो सकता, उससे कैसा प्यार? मैंने अपनी विवशता के आगे अपने प्यार को मन ही मन रौंद डाला था.

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आदित्य को मेरा उसे नज़रअंदाज़ करना समझ में आने लगा था. वो मुझे अपना जीवनसाथी बनाना चाहता था. मेरे इनकार करने पर उसने मुझे अपनी क़सम दे दी. कहने लगा, “बात क्या है, आख़िर मुझमें क्या कमी है?फफ उसके बार-बार दबाव डालने पर मैं परेशान हो गई और मैंने मजबूर होकर उससे कहा, ङ्गङ्घठीक है. चलो बगल के रेस्टॉरेंट में चलते हैं. वहीं बैठकर सारी बातें
हो जाएंगी.”

इसके बाद अपने काउंटर से उठकर जैसे ही मैंने एक-दो क़दम बढ़ाए, आदित्य भौंचक्का होकर मुझे देखता ही रह गया. कभी मेरे चेहरे को देखता, तो कभी मेरे पोलियोग्रस्त पैरों की ओर. उसके मुंह से निकल पड़ा, “तुम बैठो. रेस्टोरेंट किसी और दिन चलेंगे. मुझे कोई ज़रूरी काम याद आ गया.” और वो चला गया. फिर कभी वह मेरे काउंटर पर नज़र नहीं आया. जिसका मुझे डर था, वही हुआ. मेरे पोलियोग्रस्त पैर के कारण उसने मेरा हाथ नहीं थामा. मेरी विकलांगता के आगे उसका प्यार छू-मंतर हो गया.

आज दस साल बीत गए, पर आदित्य शर्मा आज भी जब जाने-अनजाने याद आ जाता है तो मुंह से अनायास ही निकल पड़ता है-
हे ईश्‍वर, जिसके नसीब में प्यार नहीं उसको दिल ही क्यों दिया?

– संगीता बलवंत

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