पहला अफेयर: मेरे हमसफ़र̷...

पहला अफेयर: मेरे हमसफ़र… (Pahla Affair: Mere Humsafar)

Pahla Affair, Mere Humsafar

पहला अफेयर: मेरे हमसफ़र… (Pahla Affair: Mere Humsafar)

मन बड़ा बेईमान होता है. आप उसे लाख समझाएं कि वह काबू में रहे, पर वो नादान कहां आपकी सुनता है. बस आपको दगा दे जाता है. और आपके कई राज़ों को फाश कर देता है. उसके कहे में चेहरे और आंखें क्या कह-सुन जाते हैं. आपको पता ही नहीं चलता कि कब आपका मन आपका रहा ही नहीं… वह तो किसी और का हो गया.

मेरी नज़रों में वो मंज़र और ज़ेहन में वो सफ़र आज भी ताज़ा है, जब कसौली में एक अजनबी ज़िंदगी में आया और फिर इश्क़ वादियों में घुल-मिल गया. कहां तो बस सफ़र में एक पड़ाव पर मिले और बाद में मन में उसकी हर ख़ुशबू बस गई.

हर साल गर्मियों की छुट्टियों में पूरा परिवार पहाड़ों पर छुट्टियां मनाने जाता था. उत्तर भारत की भीषण गर्मी से राहत पाने के लिए बर्फीले पहाड़ों से बेहतर पनाह कहां मिलती. और इस बार योजना बनी, तो कसौली जाने की ठानी, जहां मामाजी एयरफोर्स में पदस्थ थे.

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सुना था छोटी-सी मगर प्यारी-सी जगह है और मामाजी का ख़ूब आग्रह भी था. तपिश के बीच ट्रेन में सवार हुए. फिर टैक्सी से पहाड़ों के घुमावदार रास्ते पर चलते चले गए. चीड़ के पेड़ों के साथ-साथ दौड़ते-दौड़ते आख़िरकार हमारी मंज़िल भी आ गई.

मामाजी का घर बेहद ख़ूबसूरत था. चारों ओर बस पहाड़ ही पहाड़. हम सब बहुत ख़ुश हुए. मामाजी ने बताया कि हम लोगों के आने की ख़ुशी में एक छोटी-सी दावत रखी है रात को. वाह, कहते हुए पता नहीं था कि क्या करवट लेगी ज़िंदगी. दोपहर में थकान उतारने के लिए जो सोई, तो मां के जगाने पर ही आंख खुली.

रात की दावत में मामाजी ने बहुत सारे लोगों को बुलाया था. उन्हीं में से एक थे पंकज. उस रात पार्टी में हम लोग मिले, यहां-वहां की बातें कीं. फिर अपनी-अपनी राह चल दिए. अगले दिन सुबह यूं ही टहलते हुए हम फिर मिले. फिर बातें हुईं. जाने क्यों पंकज की बातें बड़ी भली-सी लगीं. मन बावरा दिनभर पकंज के बारे में सोचता रहा. शाम को चर्च की छांव तले फिर हम मिले. मन में कुछ गुदगुदाहट-सी हुई. “कीनू, इस ड्रेस में तुम बहुत सुंदर लग रही हो.” पंकज कहने लगे. मेरे गाल गुलाबी हो गए. हफ़्तेभर से ज़्यादा हम लोग रहे और पंकज लगातार मिलते रहे.

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फिर एक दिन मामाजी ने शिमला चलने का ऐलान कर दिया. मन कुछ बुझ गया. जब जीप में सवार हुए, तो पंकज एक सरप्राइज़ की तरह मिले. हौले-हौले मैंने उनकी आंखों में देखा. उनमें ग़ज़ब का आकर्षण था. शिमला में रहने के दौरान हमारी बातें-मुलाक़ातें जारी रहीं. देवदार के पेड़ों तले टहलते कितनी ही बातें कीं. फिर जुदाई का दिन आ गया. औपचारिक रूप से एक-दूसरे को अलविदा कह दिया.

घर लौटने के बाद मन बुझ गया. पंकज की बातें और उनकी सूरत ही हर ओर दिखती. परिवार में इश्क़ की बात कहना और क्या पता पंकज को भी ऐसा कुछ महसूस हुआ कि नहीं. मन को समझा लिया कि पंकज को एक मीठी याद समझकर अपनी नींद में दफ़न कर ले.

दिन बीते, व़क्त गुज़रा, साल बीत गया. मामाजी का ट्रांसफर हो गया. कॉलेज की पढ़ाई भी ख़त्म हो चली. लेक्चररशिप मिल गई. एक दिन मां ने कहा, “शाम को लड़केवाले आ रहे हैं. आज छुट्टी कर लो.” उस समय न जाने क्यों अचानक पंकज आंखों में तिर गए. मन को समझाया और परीक्षा देने के लिए जुट गई.

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शाम को लड़केवाले आए. लड़का साथ नहीं था. पर उसके मम्मी-पापा से मिलकर लगा कि पहले से पहचान हो. उनके अपनेपन ने कुछ पलों के लिए पंकज को कहीं गुम कर दिया. मां-पापा ख़ुश थे. अगले ही दिन मंगनी भी होनेवाली थी. मन में बड़ी बेचैनी थी. एक अंजान के साथ बंधने की. मन में दुविधा-सी थी. एक ओर प्यार, जो मेरी तरफ़ से था और दूसरी ओर परिवार की ख़ुशी. मंगनी की रस्म के लिए जब पहुंची, तो सिर शर्म से झुका रहा. “अरे देख लो, बाद में न कहना कि कहां ब्याह दिया.” मां ने टल्ला मारा. मैंने सिर उठाकर सामनेवाले शख़्स को देखा, “अरे, आप…” इतना ही कह सकी. सब हंस पड़े.

कहने की ज़रूरत ही नहीं थी कि प्यार एक तरफ़ा नहीं था. वह तो दोनों ओर से था. यह पूरी साज़िश मेरे मामाजी ने रची थी, जिन्होंने बिना किसी शोर-शराबे के कसौली बुलाकर हम लोगों को मिलने-जुलने का मौक़ा दिया था, ताकि हम जीवन की राह में हमक़दम बनें.

– राजेश्‍वरी शुक्ला

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