“ओफ्फो! आजकल की बहुएं ज़रा सी बात का बवाल बना देती हैं… हम लोग बहुत हिम्मती थे.. है कि नहीं?” चाची इतनी तेज़ आवाज़ में बोल रही थीं कि मुझे सुनाई दे जाए.
घर आते ही देखा, मांजी और पड़ोस वाली उर्मिला चाची चाय पी रही थीं. मैं ‘नमस्ते’ कहकर सीधे अपने कमरे में चली गई और बिस्तर पर पसर गई.
“ये काॅलेज से आते ही सो जाती है क्या?” उर्मिला चाची फुसफुसाईं.
“नहीं! आज दूसरा दिन है ना, इसको बहुत तकलीफ़ होती है.” मांजी ने धीरे से कहा.
“ओफ्फो! आजकल की बहुएं ज़रा सी बात का बवाल बना देती हैं… हम लोग बहुत हिम्मती थे.. है कि नहीं?” चाची इतनी तेज़ आवाज़ में बोल रही थीं कि मुझे सुनाई दे जाए.
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“नहीं उर्मिला, ऐसा नहीं है… यहां से दस किलोमीटर दूर काॅलेज है इसका. आना-जाना मिलाकर बीस किलोमीटर स्कूटी चलाना, दिनभर इस क्लास से उस क्लास जाना, खड़े होकर पढ़ाना, सीढ़ी चढ़ना उतरना, फिर आकर घर के बीसों काम… अरे, हम लोग छुआ-छूत के नाम पर ही सही, लेकिन पांच दिनों तक आराम तो कर लेते थे… है कि नहीं?” मांजी मुस्कुराते हुए बोलीं.
बेचारी उर्मिला चाची का मुंह उतर गया. क्या करें?जिन घरों में सास बहू के संबंध मीठे होते हैं ना; उनके पड़ोसी ऐसे ही दुखी रहते हैं!
– लकी राजीव
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