कहानी- फ़ैसला (Short Story- Faisla)

ऐसा नहीं था कि मैं अपने परिवार से प्यार नहीं करता था, लेकिन अपने प्यार को जताना मुझे कभी आया ही नहीं. आज झील ने, मेरे अपने ख़ून ने मुझे इस बात का एहसास दिलाया कि हर रिश्ते में प्यार का इज़हार कितना ज़रूरी होता है. पता नहीं ऐसा क्यों था, मैं जिन्हें बेहद प्यार करता था, वे ही मेरे प्यार को तरसते रहे.

Short Story

मेरी पत्नी का देहांत हुए आज बीस दिन हो गए. लोग सच ही कहते हैं, एक पत्नी ही होती है, जो पति की ज़्यादतियों को बर्दाश्त करती है. ईश्‍वर ने औरत को इतनी ज़्यादा सहनशक्ति दे रखी है, जिसकी कोई सीमा नहीं है, इसलिए उसकी तुलना धरती से की गयी है. अपनी मां की बीमारी की ख़बर सुनकर मेरा बेटा बहू के साथ अपनी मां को देखने आया, लेकिन मेरी पत्नी की सांस शायद उसकी एक झलक के लिए ही रुकी हुई थी. जैसे ही झील अपनी मां को पुकारता हुआ उसके कमरे में पहुंचा, उसकी मां ने उसके चेहरे को अपने कमज़ोर हाथों से थामा और हल्की-सी मुस्कान के साथ हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं. झील तो जैसे अपनी मां की मौत से पागल-सा हो गया. उसकी मां ही उसके लिए सब कुछ थी. कुल मिलाकर झील के लिए सारी दुनिया मां तक ही सिमटकर रह गयी थी और आज वही उसे छोड़कर जा चुकी थी.

झील के लिए मेरी भूमिका स़िर्फ एक पालक की ही थी, जो आर्थिक रूप से उसका पालन कर रहा था. झील के साथ मैंने कभी उसकी पढ़ाई या उसके भविष्य की योजनाओं के बारे में बातें नहीं कीं. मेरा काम था धन कमाना और उनकी ज़रूरतों को पूरा करना, बस मेरी ज़िम्मेदारी ख़त्म. कितना ग़लत था मैं? क्या पैसे में इतनी शक्ति होती है? यदि होती तो क्या मैं अपनी पत्नी को बचा ना लेता. ऐसा नहीं था कि मैं अपने परिवार से प्यार नहीं करता था, लेकिन अपने प्यार को जताना मुझे कभी आया ही नहीं. आज झील ने, मेरे अपने ख़ून ने मुझे इस बात का एहसास दिलाया कि हर रिश्ते में प्यार का इज़हार कितना ज़रूरी होता है. पता नहीं ऐसा क्यों था, मैं जिन्हें बेहद प्यार करता था, वे ही मेरे प्यार को तरसते रहे. मेरी पत्नी हर तरह से मेरा ख़याल रखती. उसकी हरदम यही कोशिश रहती कि मुझे किसी प्रकार की शिकायत ना हो. उसके इस समर्पण में प्यार के साथ-साथ एक प्रकार का डर भी शामिल रहता था, क्योंकि मैं बहुत ग़ुस्सैल प्रवृत्ति का इंसान था. किस बात पर नाराज़ हो जाऊं, कोई जान नहीं सकता था. मैंने बिना वजह कई बार अपनी पत्नी पर हाथ भी उठाया. मुझे याद है एक बार मेरी पत्नी ने कहा था, “ये सच है कि कमज़ोर ही मार खाता है, लेकिन मारनेवाला उससे भी ज़्यादा कमज़ोर होता है.” उसकी गूढ़ बातों का रहस्य समझकर भी मैं नासमझी दिखाता था, क्योंकि मैं जानता था कि वो बिल्कुल सच कह रही है.

आज मुझे मेरे बेटे ने ये एहसास दिला दिया कि ना मैं एक अच्छा बेटा था, ना अच्छा पति और ना ही अच्छा पिता और इन सब बातों का सारांश ये है कि मैं अच्छा इंसान ही नहीं रहा.

मेरी पत्नी की तेरहवीं के दूसरे दिन सारे मेहमान चले गए. घर में हम स़िर्फ तीन प्राणी ही रह गए. मेरा बेटा, बहू और मैं. बहू तो मुझसे बात कर लेती थी, लेकिन झील तो जिस कमरे में मैं रहता था, वहां से उठकर चला जाता. उसे देखकर ऐसा लगता जैसे अपनी मां की मौत का ज़िम्मेदार वो मुझे ही समझता हो. कुछ ही दिन बीते थे कि बहू ने बताया कि वे लोग वापस जा रहे हैं, शायद झील इस घर में मां के बगैर रहना ही नहीं चाहता था. मुझसे तो बात करता नहीं था, बहू के द्वारा कहलवा दिया कि कल रात की ट्रेन से वे जा रहे हैं. मैंने सोचा, अभी तो इनके जाने में पूरा एक दिन का समय बाकी है. रात को खाने के बाद बहू को समझा दूंगा कि कुछ दिन और रुक जाओ. रात के खाने पर झील नहीं दिखा. बहू ने बताया कि वो अपने दोस्त के यहां गए हैं.

मैंने उस समय कुछ नहीं कहा. जानता था सोने के पहले बहू दवाई देने के बहाने आएगी तभी कह दूंगा. लगभग दस मिनट बाद दरवाज़े पर दस्तक हुई. मैं समझ गया झील आ गया होगा. मैंने हमेशा अपने बेटे से दूरी बनाई रखी. वो तरसता रहा मुझसे बात करने के लिए, लेकिन मेरे ग़ुस्सैल चेहरे को देखकर उसकी कभी भी हिम्मत ही नहीं हुई और आज ऐसा व़क़्त आया है कि मेरी इच्छा हो रही है कि झील थोड़ी देर मेरे पास बैठे तो वो मुझ से दूर भाग रहा है, लेकिन अपने इस अकेलेपन का ज़िम्मेदार मैं ख़ुद था.

थोड़ी देर बाद बहू दवाई लेकर कमरे में आई. मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने एक लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ यह कहते हुए बढ़ाया कि ‘पापा झील ने आपके लिए दिया है. बहू के जाते ही मैंने पत्र खोला. पिता बनने के बाद ये पहली बार हुआ था कि झील ने मेरे लिए कुछ लिखा था. मैंने भीगी पलकों को पोंछा, जो न जाने क्यों बरसने पर तुली थीं. पत्र की हेडिंग पढ़कर ही दिल में एक टीस हुई. झील अपनी मम्मी के लिए हमेशा ‘डियर मम्मी’ या ‘मेरी स्वीट मम्मी’ इस तरह का संबोधन देता था. लेकिन मेरे लिए उसने लिखा था.

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आदरणीय पापा,

प्रणाम!

पता नहीं क्यों आपके लिए पत्र लिख रहा हूं ये जानते हुए कि आपके पत्थर दिल पर कुछ असर नहीं होगा. फिर भी मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं. पापा अब शायद मैं यहां कभी नहीं आऊंगा, क्योंकि मम्मी की वजह से ही मैं यहां आता था, जब वो ही नहीं रहीं तो… पापा इंसान को हमेशा ये क्यों लगता है कि वो हमेशा शक्तिशाली रहेगा, कभी किसी का सहारा नहीं लेगा. क्या ये सच है पापा, क्योंकि ये आपके ही शब्द हैं. पापा आप हमेशा स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते थे. आपने कभी किसी को इ़ज़्ज़त नहीं दी. कभी किसी के साथ कोमलता से पेश नहीं आये. मैंने सुना था एक पुरुष यदि अच्छा पति साबित नहीं होता, तो वो एक क़ामयाब पिता होता है. लेकिन आपने तो कोई भी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभाई. पापा आपने मम्मी को भी वो सम्मान नहीं दिया, जिसकी वो हक़दार थीं. जबकि उन्होंने हमेशा आपकी ख़ुशियों का ख़याल रखा. आपके बदलने की आस लगाए वो इस दुनिया से चली गयीं. मैंने कई बार मम्मी को आपके व्यवहार से दुखी होकर रोते देखा है. मैंने कभी उन्हें खुलकर हंसते नहीं देखा. उनकी हर हरकत, हर ख़ुशी में मैंने आपका दबाव महसूस किया है. पता नहीं वो आपको किस तरह बर्दाश्त कर रही थीं. आपका डर उन पर इस तरह हावी रहता था कि आपकी गैरमौजूदगी में भी आपके वजूद का एहसास उनके साथ होता था और वो हमेशा डरी-सहमी रहती थीं. मुझे याद है एक बार मैंने नासमझी में कह दिया था, “मम्मी आपको दूसरे पापा नहीं मिले जो आपने इन्हें हमारा पापा बना दिया.” आज मुझे इस बात का एहसास होता है कि ये बात कर मैंने मम्मी का दिल दुखाया था, लेकिन मम्मी हंस दी थीं. शायद मेरी उम्र ही ऐसी थी कि थप्पड़ नहीं मार सकती थीं. उन्होंने हंसकर कहा था, “यदि ये तुम्हारे पापा न होते तो मुझे तुम्हारे जैसा प्यारा बेटा कैसे मिलता.” जब मैं समझदार हुआ, रिश्तों को समझने लगा, तब समझा कि प्यार में वो शक्ति होती है, जो हर ग़म को सहने की ताक़त देती है और कुछ इसी तरह का प्यार मम्मी आपसे करती थीं. पापा मैं जानता हूं आपको मम्मी की कमी का एहसास हो रहा होगा. वो इसलिए नहीं कि आप उनसे प्यार करते थे, बल्कि इसलिए कि आपके हाथों में जो डोर रह गयी, उसकी कठपुतली ही नहीं रही, जिस पर आप हुकूमत चला सकें.

पापा, मम्मी की ख़ातिर मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं, कल हम लोग जा रहे हैं. यहां ऐसा कोई नहीं, जो आपकी देखभाल कर सके. इसलिए मैं चाहता हूं आप हमारे साथ चलें. यहां आपको अकेले छोड़ दूंगा, तो मम्मी की आत्मा मुझे कभी माफ़ नहीं करेगी. पापा ऐसा कहना तो ग़लत होगा कि मैं आपसे प्यार नहीं करता. हां, ये बात अलग है कि आपके कठोर व्यवहार में मेरा प्यार कहीं दब गया है, फिर भी कहता हूं पापा मुझे आपसे प्यार है और इसी प्यार का सहारा का वास्ता देकर कहता हूं कि आप हमारे साथ चलें.

आपका बेटा,

झील

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आज मेरे बेटे ने मुझे यह एहसास दिला ही दिया कि मैंने अपनी ज़िंदगी की कितनी अनमोल घड़ियों को यूं ही गंवा दिया. काश! मैं अपने बेटे को बता सकता कि मैं उससे और उसकी मम्मी से कितना प्यार करता हूं. आज मैंने यह निश्‍चय किया कि जो कुछ गंवा बैठा हूं, उसे तो ला नहीं सकता, पर जितना बचा है उसे तो संभाल ही सकता हूं. आज मैंने ऐसा फ़ैसला किया, जिसका इंतज़ार मेरी पत्नी को हमेशा रहा था. मेरे फैसले से मेरा मन इतना शांत हुआ कि मुझे पहली बार बहुत मीठी नींद आई. आज की सुबह लिए एक नया एहसास लाई थी. नाश्ते की टेबल पर झील नहीं दिखा. बहू ने बताया देर तक जागे हैं, इसलिए अब तक नहीं उठे. मैंने नाश्ता ख़त्म किया और अपने कमरे में आ गया. झील की मम्मी की तस्वीर के आगे जाकर पहले तो क्षमा मांगी, फिर धीरे से उससे वो कहा, जो वो सुनना चाहती थी. न जाने ऐसा क्यों लगा जैसे वो तस्वीर में भी मुस्कुरा रही है. बाहर आकर मैं लॉन में बैठा ही था कि अचानक मुझे एहसास हुआ कि मेरे ठीक पीछे कोई ख़ड़ा है. पलटकर देखा तो झील खड़ा था और थोड़ी ही दूर पर बहू खड़ी थी. मैं वापस मुड़ा और बिना पीछे देखे ही बहू को संबोधित करते हुए कहा, “मेरा सामान पैक कर लो, मैं भी चलूंगा.” मैं बगैर देखे ही दोनों की प्रतिक्रिया का अनुमान लगा सकता था. शायद बहू चली गयी थी.

मैंने पलटकर देखा, झील मेरी तरफ़ ही देख रहा है. बरबस ही मेरी बांहें फैलीं और झील एक अबोध बच्चे की तरह मुझसे लिपट गया व फूट-फूट कर रोने लगा. मेरी आंखों से भी आंसुओं की धार बह निकली. हम दोनों के आसुओं ने हमारे बीच की सारी दूरियां मिटा दीं. मैंने झील की तरफ़ देखा तो ऐसा लगा कि यही तो मेरी सच्ची पूंजी है. हम दोनों ने ख़ामोश रहकर भी एक-दूसरे से सब कुछ कह दिया. शाम को घर से निकलते हुए ऐसा लगा जैसे झील की मम्मी की आत्मा भी हमारे साथ है और होती भी क्यों ना, आज उसकी आत्मा जो ख़ुश थी.

– मीना राज तांडिया

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