पेन्टर ने मैनेजर को घायल कर दिया, मैनेजेर मुंह के बल फ़र्श पर पड़ा रहा और पेन्टर विजय तथा गर्व के जोश में खड़ा हांफता रहा, कि इतने में वह हुआ जिसकी उनमें से किसी को भी आशा न थी.
पेन्टर के वास्तविक नाम से कोई भी परिचित न था. पिछले कई वर्षों से वह सिनेमा के बोर्ड बना रहा था. लोग उसके वास्तविक नाम से कभी ज़रूर परिचित रहे होंगे, लेकिन धीरे-धीरे उसके पेशे की छाप उसके नाम पर पड़ गई. लोग उसके नाम को भूल गए और सिर्फ़ 'पेन्टर' कहकर पुकारने लगे. धीरे-धीरे नाम खो गया काम ज़िंदा रहा.
महाराष्ट्र के किसी सुदूर इलाके में भूखमरी के दानव ने जब पेन्टर के मां-पिता की भेंट स्वीकार कर ली तो वह गाड़ियों में भीख मांगता हुआ मुंबई पहुंच गया. लालबाग में मजदूर इलाके में नौकरी मिल गई जहां वह फ़र्श धोता रहा, कर्सियां झाड़ता रहा. लोग मराठी भाषा में उसे 'मुलगा' कहते रहे. कुछ बड़ा हुआ तो गेट पर पहरा देने लगा. खाली वक़्त वह सिनेमा के बूढ़े पेन्टर के पास खड़े होकर उसके ब्रश की हर आड़ी-तिरछी हरकत और उसमें से उभरती हर रेखा को बड़े ध्यान से देखता रहता.
चूने से रंगे हुए सफ़ेद बोर्ड पर विभिन्न प्रकार की स्याही अंकित टेढ़े-मेढ़े शब्द उसके कच्चे मस्तिष्क पर उड़ती धूल की तरह फैलते रहे और धीरे-धीरे शब्दों की उस जादुई धुन्ध में किसी अनदेखे मुलायम हाथ की कोमल उंगलियां जैसे उसकी आंखों को मलती रहती और शब्दों के संसार को वह आहिस्ता आहिस्ता पहचानने लगा. इस रहस्यमयी दुनिया की तहों में छिपे सैकड़ों भेद धीरे-धीरे उस पर खुलने लगे. अपनी उंगलियों से देर तक वह शब्दों की लम्बाई-चौड़ाई और गोलाई नापता रहता, लेकिन इन शब्दों के पीछे कहीं कोई गहराई छिपी हुई थी, जो उसे अपनी तरफ़ खींचती रही. उसका अन्वेषण जारी रहा और फिर एक दिन शायद शब्दों की दुनिया ने उसे पहचान लिया.
बूढ़े पेन्टर ने जब पहली बार ब्रश उसके हाथ में थमाया तो उसके दिल की धडकन तेज हो गई जिसकी आवाज़ देर तक उसके कानों में बसी रही. पूरे शरीर पर जैसे उसने शब्दों का कोमल स्पर्श अनुभव किया और देर तक उसकी उंगलियां कांपती रही. उस दिन पेन्टर ने उल्लास के पहले आंसू बहाए थे.
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बड़े पेन्टर की मृत्यु के पश्चात वह सिनेमा का पेन्टर हो गया.
अनाथ पेन्टर की सूनी ज़िंदगी में कोई कभी नहीं आया था. उसकी भूखी आत्मा मुहब्बत के अर्थों से अनजान थी, पर कभी-कभी उसे यूं लगता मानो उसके दिल को किसी ने मुट्ठी में जकड़ लिया हो. कभी वह महसूस करता जैसे कोई उसे मीठी-मीठी थपकियां देकर सुला रहा हो. किसी मीठी लोरी का अनुभव उसे अपनी कोमल बांहों में ले लेता. मुहब्बत की एक धुंधली सी भावना थी, जो उड़ते बादल की तरह उसके मस्तिष्क के अंतरिक्ष में तैरती और भटकती रहती और फिर कहीं खो जाती.
एक रात सिनेमा के पिछवाड़े बैठकर पेन्टर किसी नई फिल्म के बोर्ड बना रहा था. सिर उठा कर उसने पिछली ओर के मकान की तरफ़ देखा. सफ़ेद साड़ी में लिपटी हुई एक लड़की पहली मंज़िल की बालकनी में बैठी कोई किताब पढ़ रही थी. लैम्प की सीमित सी रोशनी में उसके चेहरे का धुंधला सा आकार नज़र आ रहा था. पेन्टर देर तक उसकी ओर देखता रहा.
दूसरे दिन पेन्टर को पता लगा कि नई लड़की किसी स्कूल में अध्यापिका का काम करती है. हर रोज़ शाम को वह कुछ किताबें लेकर बालकनी में बैठ जाती और रात गए देर तक पढ़ती रहती. पेन्टर में उससे जान पहचान करने का साहस कभी पैदा न हुआ. पर किताब और शब्द की रहस्यमयी दुनिया उसे अपनी तरफ़ बुलाती रही, पेन्टर भी अब रात को देर तक सिनेमा के पिछवाड़े बैठा बोर्ड बनाता रहता, कभी-कभी अध्यापिका भी उचटी हुई उसकी ओर देख लेती.
सिनेमा के नौकर बालकनी की ओर अक्सर घूरते रहते, आवाज़ें करते पर अध्यापिका अपनी पढ़ाई में मगन रहती.
धीरे-धीरे सिनेमा में अफ़वाहें उड़ने लगीं. एक नौकर कहता अध्यापिका कनखियों से उसकी ओर देखती है, दूसरा कहता कि उसकी ओर देख कर मुस्कुराती है. सिनेमा के गेटकीपर का दावा था कि अध्यापिका अपने कमरे से उसे इशारे करती है, जबकि बुकिंग क्लर्क का इसरार था कि वह चोरी छिपे उससे मिला करती है. पर पेन्टर ने इन अफ़वाहों पर कभी कान न धरा, वह जानता था कि अध्यापिका सुबह स्कूल जाती है और स्कूल छूटने के बाद तुरन्त घर चली आती है. खाना पकाती है और थोडा आराम करने के बाद किताबें लेकर बालकनी में बैठ जाती है.
फिल्मी गाने और बड़े बोल दिल के संतोष का एक साधन है. सिनेमा का हर नौकर अध्यापिका की मुहब्बत का दावेदार था. कई बार उनके झगड़े हुए, लेकिन पेन्टर ने इन झगड़ों में कभी दिलचस्पी नहीं ली. अलबत्ता दबे शब्दों में वह सिनेमा के नौकरों से अक्सर कह दिया करता था, "क्यों डींगें मारते हो? वह पढ़ी लिखी है. कहां वह, कहां हम. किताब की दुनिया से तुम लोग परिचित नहीं."
सिनेमा के नौकर उसकी बातों को मज़ाक में उड़ा देते.
पेन्टर ने अध्यापिका को देखकर कभी आवाज़ें नहीं की थी, कभी इशारे नहीं किए थे. अध्यापिका ने दूसरों की ओर जहां कभी आंख उठा कर भी नहीं देखा था, वहां कभी-कभी पेन्टर की ओर देख लेती थी, जो ब्रश की टेढ़ी-मेढी रेखाओं में बोर्ड पर फिल्मों के गिने चुने शब्द लिखता रहता. शब्दों का जादू अब उसके लिए कोई नई बात नहीं थी, क्योंकि इन शब्दों का घेरा सीमित था, पर पेन्टर को अब नए दायरों की तलाश थी. हर शब्द उसके लिए किसी नई दुनिया का दरवाज़ा था. इन बन्द किवाड़ों को कौन खोले? पेन्टर बालकनी की ओर देखता, नई अध्यापिका शायद उसे शब्दों की नई दुनिया में ले जा सके. एक अस्पष्ट सा ख़्याल उसके दिमाग़ में फैलता हुआ गुज़र जाता. एक गुबार सा उठता और फट जाता, इन बन्द किवाड़ों को कौन खोले?
पेन्टर मां, बाप या प्रियतमा किसी भी प्यार से परिचित न था फिर भी एक अजीब सी अनुभूति उसकी सांसों को तेज करने लगती. उसके दिल को कोई नर्म से हाथ जैसे सहलाने लगते और कभी-कभी जैसे पिघला हुआ शीशा उसके वक्ष में भर जाता.
अध्यापिका से अब तक उसकी कोई बात नहीं हुई थी.
एक दिन सिनेमा का मैनेजर बदल गया. नया मैनेजर एक सुन्दर युवक था. पहले दिन से ही सिनेमा में उसकी तांक-झांक के चर्चे होने लगे और फिर एक दिन अफ़वाह उड़ी कि नए मैनेजर ने मामला जमा लिया है. नया मैनेजर साफ़ सुथरे कपड़े पहनकर बैठता और देर तक सिनेमा के पिछवाड़े पेन्टर के पास खड़ा रहता और नए बोर्ड के बारे में हिदायतें देता रहता. अध्यापिका बालकनी में बैठी पढ़ने में संलग्न रहती.
नया मैनेजर बालकनी की ओर देर तक देखता रहता. एक दो बार उसने पेन्टर से इशारों में बात करनी चाही, लेकिन पेन्टर ने टाल दिया. दिल आश्वस्त था, क्योंकि उसकी उपस्थिति में अध्यापिका ने कभी भी मैनेजर की ओर नहीं देखा था.
एक दिन अध्यापिका ने अचानक ही बालकनी में बैठना छोड़ दिया. पेन्टर उस रात कुछ न लिख सका. बार-बार बालकनी की ओर झांकता रहा. अध्यापिका के कमरे की रोशनी भी बन्द थी. सिनेमा की बालकनी से उसने अध्यापिका के कमरे में देखने की कोशिश की लेकिन कुछ नज़र न आया.
दूसरे दिन सिनेमा में अफ़वाह उड़ी कि नए मैनेजर ने अध्यापिका को रास्ते में घेर लिया था. उस रात भी अध्यापिका बालकनी में नज़र नहीं आई तो पेन्टर का खून खौलने लगा. दफ़्तर में पहुंचा. मैनेजर कुर्सी पर ख़ामोश बैठा था. पेन्टर ने कोई सवाल न किया, मैनेजर को गर्दन से पकड़कर उसे दोनों हाथों से मारना शुरू कर दिया. मैनेजर बौखला कर दफ़्तर से बाहर भागा, लेकिन पेन्टर ने उसे अपनी फौलादी भुजाओं में जकड़ लिया. देर तक गुत्थम-गुत्था होते रहे. सिनेमा के कर्मचारी इकठ्ठे हो गए. लेकिन किसी ने बीच में पड़ कर छुड़ाने की कोशिश न की.
मैनेजर से किसी को भी हमददीं न थी. उसने उनसे झूठी उम्मीदों का सहारा छीन लिया था, लेकिन यह किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि पेन्टर अध्यापिका के लिए मैनेजर से लड़ाई मोल लेगा. फिर भी वह उनका नायक था और अपने नायक को भारी पड़ते देख कर सबके दिल खिल उठे थे.
दोनों जंगली गैंडों की तरह लड़ते रहे. जैसे असभ्यता के युग के स्वाभाविक हत्या काण्ड ने एक तृष्णा बन कर उनके सभी अंगों को पीस दिया हो. मानवीय विकास के सभी चिह्न मिट गए हों.
खून की उस गर्मी में पेन्टर सब कुछ भूल गया, कई वर्षों की भरी हुई कड़वाहट को पहली बार निकास का रास्ता मिला था. पेन्टर ने मैनेजर को घायल कर दिया, मैनेजेर मुंह के बल फ़र्श पर पड़ा रहा और पेन्टर विजय तथा गर्व के जोश में खड़ा हांफता रहा, कि इतने में वह हुआ जिसकी उनमें से किसी को भी आशा न थी.
अध्यापिका ज़िन्दगी में पहली बार सिनेमा में दाख़िल हुई. वही जानी पहचानी सफ़ेद साड़ी और वही सांवला रंग, पर उसमें क्रोध का लाल रंग घुल गया था. उसने मुर्छित मैनेजर के पास बैठ कर उसका सिर अपनी जांघों पर रख लिया और उसके घावों में से रिसने वाला खून अपने आंचल से पोंछने लगी.
और दूसरे पल पेन्टर पुलिस चौकी में खड़ा अपने अपराध का इक़बाल कर रहा था.
- प्रीतम बेली
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