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कहानी- मां (Short Story- Maa)

संविधा को इतना अच्छा लगा कि वह सो गई. लगभग घंटे भर बाद आंख खुली देखा बगल में मां की गोद में सिर रखे अशेष भी सो रहा था. उसने फिर आंखें बंद कर लीं. जब अशेष की आंख खुली तो बालों पर हाथ फेरते हुए कमला ने कहा, "बेटा, घर छोड़कर मैं यहां कब तक पड़ी रहूंगी. पर संविधा अभी कमज़ोर है, इसका ध्यान कौन रखेगा?"

संविधा निश्चिंत होकर सो रही थी. सूर्य भगवान ने उसे ललचाने के लिए सौ प्रतिशत शुद्ध सोने के टुकड़े फेंके, फिर भी वह करवट बदलकर सोई रही.

"मैडम उठो, गरमा-गरम चाय." अशेष ने चाय की ट्रे तिपाई पर रखते हुए संविधा की चादर खींची, पर संविधा पर इसका कोई असर नहीं हुआ और उसके जल्दी उठने का कोई आसार भी नहीं दिखाई दे रहा था.

"संविधा, संपादक का फोन आया है. वह तुम्हें कहीं रिपोर्टिंग पर भेजना चाहता है."

लंबी सांस लेते हुए संविधा उठकर बैठ गई, "सबेरे की शुरुआत कहीं इस तरह की जाती है अशेष?"

"नहीं की जाती. पर तुम्हारे उस संपादक ने मेरी नींद ख़राब कर दी. फोन तुम्हारा और सिर मेरा खाया जा रहा है."

अशेष ने अपने लिए दूध का बड़ा ग्लास तैयार किया, फ्रिज़ से मक्खन निकाला और टोस्टर में टोस्ट डाला. नवविवाहित युगल की सबेरे की शुरुआत ऐसे ही होती थी.

दोनों में प्यार हुआ और आर्य समाज विधि से दोनों ने विवाह कर लिया. लेकिन उस समय दोनों में इस तरह का कोई लिविंग काट्रैक्ट नहीं हुआ था कि आमदनी, घर और काम में किसी तरह का बंटवारा होगा. सब कुछ अपने आप व्यवस्थित हो गया था. सुबह-सुबह बिस्तर से उठना संविधा के लिए सिर दर्द ही था. जबकि अशेष सबेरे ही उठ जाता था. कुंभकर्ण की नींद सोने वाली संविधा के सिर पर तेज़ म्यूज़िक बजाता और बेडरूम की खिड़की खोल देता, शायद संविधा उठ ही जाए. अशेष सबेरे उठने का मतलब था कि वह दूध गरम कर लेता. अख़बार बाहर से अंदर रखता. सुबह का समाचार सुनने के बाद चाय बनाता और संविधा के बेड के पास तिपाई पर चाय रखकर कहता, "मैडम उठो, गरमा गरम चाय."

शादी के पहले अन्य पुरुषों की तरह उसने भी रसोई में कदम ही कहां रखा था. तब तो घर में मम्मी आरती उतारने के लिए तैयार रहती थीं, गरमा-गरम नाश्ते की प्लेट पति और पुत्र के हाथ में रखते हुए उन्हें प्रसन्नता होती थी. तरह-तरह के नाश्ते, व्यंजन की सुगंध हमेशा घर में छाई रहती. मां के शरीर से हमेशा मसाले की सुगंध आती रहती. हमेशा तीज-त्योहारों पर वह तरह-तरह के व्यंजन बनातीं. सहयोग की बात आती तो मां का एक ही ध्रुव वाक्य होता, "रहने दो भई. तुम पुरुषों को यह सब कहां से आएगा."

अशेष का बड़ा भाई अनिमेष ग्रीनकार्ड धारक लड़की से विवाह करके अमेरिका चला गया. तब से अशेष की मां यानी कमला और पापा प्रकाशचंद्र काफ़ी दुखी रहते थे. और उसके बाद कमला अशेष पर कुछ ज़्यादा ही ध्यान देने लगी थी. उस पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए जाते. रविवार को वह घर पर ही रहे, इसके लिए रिश्ते नातेदार के यहां आने-जाने का कार्यक्रम बनाया जाता. कुल मिलाकर मां-पापा की यही कोशिश थी कि अशेष का अपनी जाति की समझदार, धार्मिक व संस्कारों वाली लड़की से विवाह हो जाए और वह अपने पुश्तैनी व्यवसाय को संभाल ले, तो समझ लो गंगा नहा लिया.

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पर समय का लिखा कौन मिटा सकता है. पत्रकारिता का डिप्लोमा करते समय अशेष और संविधा की मुलाक़ात हो गई और दोनों में गहरा प्रेम हो गया. कमला तथा प्रकाशचंद्र की इच्छा न होते हुए भी आर्य समाज के रीति-रिवाज़ के अनुसार दोनों ने एक साधारण से समारोह में विवाह कर लिया.

अशेष को पुश्तैनी व्यवसाय में रुचि नहीं थी. उसे तो अख़बारों, पत्रिकाओं और किताबों में अधिक रुचि थी. रात में नेल्सन मंडेला की आत्मकथा पढ़ने में मशगूल रहता. ऐसे में पापा प्रकाशचंद्र सोचते कि बेटे से व्यवसाय की बात करें या न करें, क्योंकि वह तो किताबों में ही सिर गड़ाए बैठा रहता है. पुश्तैनी व्यवसाय में तो पढ़ाई के समय से ही लड़के हाथ बंटाने लगते हैं.

मां कमला कहती, "देखना मेरे भगवान सब सुन लेंगे. अशेष अभी पढ़ रहा है, अपना ही खून है. अपने खानदानी व्यवसाय को ज़रूर संभालेगा. चिंता की कोई बात नहीं है. कुछ ही दिनों में अशेष ऑफिस आने-जाने लगेगा और आपको छुट्टी दे देगा."

बाद में क्या होने वाला है, यह किसे मालूम होता है. आख़िर कमला के भगवान ने उसका मामला अपने हाथों में नहीं ही लिया. उनका दूसरा सपूत भी अपनी राह चल पड़ा. अशेष ने अपने लिए नौकरी खोज ली थी. एक अंग्रेज़ी अख़बार में जब उसकी नौकरी लगी तो वह ख़ुशी के मारे मां के गले में बांहें डालकर झूल गया था. उसी समय कमला और प्रकाशचंद्र को लग गया था कि अब उनका बेटा पुश्तैनी धंधा शायद ही संभाले. लेकिन अब संतोष करने के अलावा कोई चारा भी नहीं रह गया था.

यह बात ठीक से गले भी नहीं उतरी थी कि अशेष ने दूसरा विस्फोट कर दिया, उसने बताया कि उसने नई कॉलोनी में शादी के बाद रहने के लिए मकान बुक करा लिया है.

अशेष संविधा से प्रेम करता था और उसी से विवाह करना चाहता था. कौन संविधा? वह बॉबकट वाली और जीन्स टी-शर्ट में बुलबुल की तरह फुदकने वाली चुलबुली लड़की? कौन-सी जाति, कौन-सा खानदान? जाति-खानदान से क्या लेना-देना! अशेष तो बस इतना जानता था कि संविधा राजेन्द्र नाथ की बेटी है और अंग्रेज़ी पत्रकारिता जगत में राजेन्द्रनाथ का बड़ा नाम था. उनके लेखों से अख़बारों की बिक्री बढ़ जाती थी. टीवी तथा रेडियो परिचर्चा में भी वह भाग लेते थे. संविधा की मां वैसे तो अध्यापिका थीं, पर वह भी अख़बारों-पत्रिकाओं में लिखती थीं. एक भाई था, जिसका थिएटर जगत में ख़ूब नाम था और उसने कई टीवी धारावाहिकों में भी काम किया था.

इस परिवार की तेज़-तर्रार लड़की संविधा से अशेष विवाह करना चाहता था. 'हां' या 'ना' का कोई सवाल ही नहीं था.

चर्चा, विरोध, फिर समझाने की प्रक्रिया और अंत में क़सम आदि की लक्ष्मण रेखा भी अशेष लांघ गया तो घरवालों को मजबूरन मानना ही पड़ा था.

और अंत में कमला ने भी 'हां' कह दिया. पूजा करते समय उन्होंने अपने भगवान को उलाहना भी दिया था, "इतने दिनों की पूजा-पाठ का यही फल दिया है भगवान तूने मुझे? एक को तो ग्रीन कार्ड वाली ले गई और दूसरे को ले गई अख़बार वाली. मुझसे जितना और जब तक हो सकेगा, करती रहूंगी. पर मेरे बाद यह सब कौन करेगा? आपको प्रसाद कौन चढ़ाएगा?"

ईश्वर ने क्या सोचा, यह किसे मालूम? पर अशेष ने संविधा से विवाह कर लिया. अशेष ने मां को मना लिया, "प्यारी मां, न रीति-रिवाज़, न रिसेप्शन. बस आपके भगवान के पैर छू लूंगा. प्रॉमिस मॉम, अरे मम्मी हमारा तुम्हारा प्रेम थोड़े ही कम होगा, आप लोग जिनका पैर छूने के लिए कहेंगे, छू लूंगा."

पापा के 'हां' 'ना' करने का इंतज़ार कहां करना था! वे भी निराश तो हुए थे, पर आख़िरकार 'हां' कर दिया था और पत्नी को भी समझा दिया था, जो कर रहा है करने दो. ख़ुश रहेगा तो संबंध बना रहेगा, एक तो संबंध तोड़कर चला ही गया है और बचा है दूसरा... और कहीं वो भी... और कमला समझ गई थी. रीति-रिवाज़ों के बंधन से वह भी बाहर आ गई थी और अपना आशीर्वाद दे दिया था दोनों को.

बात यहीं खत्म नहीं हुई थी. अशेष ने प्यार से मम्मी से कहा था, "मम्मी, विवाह में कुछ ख़र्च तो करना नहीं है. इसके बदले कुछ नक़द रुपए हमें दे दीजिए. संविधा ने भी अपने मम्मी-पापा से यही कहा है. हम लोगों ने किश्तों पर एक छोटा-सा फ्लैट देखा है. उसी के लिए डिपॉजिट जमा करना है."

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यह सुनकर कमला की तो आंखें ही फैल गई थीं. वह बोली, "आसान किश्तों पर फ्लैट? यानी तुम हमारे साथ नहीं रहोगे?"

"अरे मम्मी, हम सब एक साथ ही तो हैं. यह तो सुविधा के लिए है, क्योंकि हम लोगों की नौकरी ऐसी है कि देर-सबेर होती रहेगी."

इस बात को भी दूसरी अन्य बातों की तरह कमला समझ गई थी, वैसे देखा जाए तो यह ठीक ही था. जब कुछ दिखाई नहीं देगा तो जलन भी नहीं होगी. रोज़ाना आंखों के सामने बहू जींस, टी-शर्ट, पैरों में जूते पहनकर बिना दुपट्टा के अशेष का हाथ पकड़कर काम पर जाएगी इसकी अपेक्षा यही अच्छा था कि वे आंखों से दूर रहें. प्रकाशचंद्र ने भी सोचा, दुनियाभर के झंझट से यही अच्छा है. इस तरह अलग रहने की व्यवस्था हो गई थी और शादी के बाद दोनों अपने फ्लैट में रहने के लिए आ गए थे.

कमला रोज़ाना सबेरे अपने भगवान की पूजा करती, प्रसाद चढ़ाकर घंटी बजाती, तो घंटी की आवाज़ से दोनों भाइयों की नींद उड़ जाती थी. तभी से अशेष की सबेरे जल्दी उठने की आदत पड़ गई थी. इसलिए वह सुबह ही उठ जाता था. सुबह उठकर वह चाय बनाता, दूध गर्म करता, कभी-कभी तो कुकर भी चढ़ा देता. उसके बाद संविधा को जगाता, हाथ पकडकर उसे डाइनिंग टेबल पर बैठाता और नाश्ता लगाता.

सुबह का चाय-नाश्ता दोनों साथ करते. अख़बार पढ़ते और चर्चा करते. अशेष की नौकरी सबेरे दस बजे से पांच बजे तक थी, जबकि संविधा को दोपहर में जाना रहता था और वह रात में नौ-साढ़े नौ बजे घर लौटती थी. इसलिए सुबह का समय प्रेमी दंपति के लिए बहुत क़ीमती था. उसके बाद तो फोन का ही सहारा रहता था. रविवार और छुट्टियों के दिन दोपहर को ही सबेरा होता था. फिर शाम को कोई अच्छी फिल्म या फिर दोनों में से किसी एक के माता-पिता के यहां मिलने जाने का कार्यक्रम, जिस दिन अशेष के घर जाना होता, उस दिन समझो संविधा के लिए मुसीबत का दिन होता था. सास को अपेक्षा अशेष को ख़ुश करने के लिए संविधा ने कुछ सलवार सूट ख़रीद रखे थे. अशेष की दलील थी कि मेरे मम्मी-पापा पुराने विचारों वाले हैं. इन लोगों को अब मैं इस उम्र में बदल तो नहीं सकता. फिर इसकी ज़रूरत ही क्या है! वे लोग अपनी दुनिया में ख़ुश और हम अपनी दुनिया में ख़ुश, अपनी मर्ज़ी के अनुसार उन्होंने हमें रहने की छूट दी है तो थोड़ा उनकी मर्ज़ी के अनुसार करके उन्हें ख़ुश करने में बुराई क्या है. जीन्स या शर्ट के बदले सलवार सूट पहनने और बिंदी लगाकर हाथ में ब्रेसलेट की जगह चूड़ी पहनने में बुराई क्या है.

संविधा ने अशेष की इस बात को स्वीकार कर लिया था. ससुराल में अनेक दुखों को झेलने की बात उसने सुन रखी थी. उस हिसाब से उसे तो सिर्फ़ कपड़े पहनने का ही दुख था, जबकि मन से यह सब उसे ज़रा भी पसंद नहीं था. ओढनी कंधे पर रुकती ही नहीं थी. हवा में लहराता ढीला-ढाला कुर्ता, कहां फंस जाए, इसकी चिंता उसे हमेशा सताती रहती थी. मंगलसूत्र पहनने से उसे सख्त नफ़रत थी. इसलिए घंटों वाद-विवाद के बाद सोने की जंजीर पहनने पर समझौता हुआ था.

यह सब पहनकर दोनों जब रविवार के दिन घर पहुंचते तो कमला ढेर सारा नाश्ता और मिठाई बनाकर रखे होती थी. संविधा तो पूरा डाइनिंग टेबल भरा देखकर आश्चर्यचकित रह जाती. अकेला व्यक्ति इतना सब कुछ बना सकता है और किसी को इतने व्यंजन बनाना भी आता है, यह बात उसके लिए सबसे आश्चर्यजनक होती थी. उसके घर तो रविवार को अकाल जैसी स्थिति रहती थी. कमला आग्रह करके दोनों को खिलाती और लौटते वक़्त बांधकर भी देती. अशेष यहां इतना अधिक खाता है, यह देखकर संविधा को दुख होता. कमला तो संविधा से कुछ बातें भी कर लेती, लेकिन प्रकाशचंद्र पूरे समय चुप्पी साधे रहते.

वापस लौटते समय वह अशेष से कहती, "देखा अशेष, कितना पूर्वाग्रह है मेरे लिए, मम्मी-पापा ने मुझसे ठीक से बात भी नहीं की. जिस तरह खाने के लिए तुमसे आग्रह कर रहे थे, उस तरह मुझसे आग्रह भी नहीं किया. और एक तुम हो, उनकी पसंद के लिए मुझे जोकरों की तरह सजा देते हो."

अशेष समझाता, "ऐसी बात नहीं है संविधा, वे लोग हम दोनों को चाहते हैं, पर भोले हैं. तुम्हारी भाषा में सॉफिस्टिकेटेड नहीं हैं यानी उन्हें प्रेम का प्रदर्शन नहीं आता."

कमला भी चले जाने पर कहती, "देखो, इतना मेहनत करके बनाया-खिलाया, पर तारीफ़ में एक शब्द भी नहीं कहा. मैंने तो सोचा कि बच्चों को अपने हाथों से बनाकर खिलाऊंगी तो ख़ुश हो जाएंगे, खाने के बाद प्लेट खिसका कर चली गई. पता नहीं, अशेष की क्या हालत होगी."

एक रविवार को पूर्व नियोजित कार्यक्रम होने के बावजूद संविधा और अशेष नहीं आए. फोन भी नहीं आया. रात हो गई. डाइनिंग टेबल पर बैठी कमला इंतज़ार ही करती रही. प्रकाशचंद्र ने कहा, "चलो, हम लोग खा लेते हैं. वे लोग कहीं घूमने चले गए होंगे या फिल्म देख रहे होंगे."

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कमला की आंखें गीली हो गईं, कैसे बच्चे हैं? जरा भी नहीं सोच सके... और वह लड़की... एक तो मुझसे मेरे बेटे को उड़ा ले गई. महीने-पंद्रह दिन में दो घड़ी के लिए मिलने आता है, वह भी देखा नहीं गया. भारी आवाज़ में कहा, "ज़रा फोन तो लगाइए."

प्रकाशचंद्र भी ढीले हो गए‌ थे, "इसके लिए क्या तुम्हें कहना पड़ेगा? कब से मोबाइल मिला रहा हूं. शायद बैटरी डाउन है. लग ही नहीं रहा है."

कमला ने एक लंबी सांस ली, "स्वयं तो फोन लगवा नहीं सकता. हम पैसा दे रहे थे, तो भी नहीं लिया."

उस रात कमला को नींद नहीं आई. दूसरे दिन सबेरे ग्यारह बजे कमला ने अशेष के ऑफिस फोन मिलाया, पता चला कि वह तो तीन दिन से ऑफिस ही नहीं आ रहा है. उनकी पत्नी की तबीयत ख़राब है. कमला चिंतित हो गई. पता नहीं क्या हो गया होगा बहू को? अशेष अकेले कैसे संभाल पाएगा सब कुछ? वह झट से तैयार हो गईं, साथ में खाने का टिफिन भी ले लिया.

"अरे कहां चल दीं भई? हमें भी तो बताओ." प्रकाशचंद्र ने कहा.

"मैं अशेष के यहां जा रही हूं. उसके घर का पता लिखकर टैक्सीवाले को दे दीजिए. वह मुझे पहुंचा देगा. आज तक उसने अपना घर भी मुझे नहीं दिखाया." कहते हुए वह घर से बाहर निकल आईं.

टैक्सीवाले ने कमला को अशेष के घर पहुंचा दिया. कमला को देखते ही अशेष ने कहा, "अरे मम्मी तुम?"

"अंदर आने दोगे कि इसी तरह मैं बाहर खड़ी रहूंगी. लो यह टिफिन... थोड़ा आराम करने दो. शहर के बाहर तो तुम्हारा यह मकान है. और संविधा को क्या हुआ है? डॉक्टर को दिखाया या नहीं? तुम लोग ज़रा सूचना भी नहीं दे सकते थे?"

थोड़ी देर में कमला ने पूरे घर का चार्ज अपने हाथ में ले लिया. एक तो वैसे ही घर अस्त-व्यस्त था, उसमें दो दिन से नौकर भी नहीं आ रहा था. संविधा को तीन दिन से बुखार आ रहा था, उसने आंख तक नहीं खोली थी. उसके मम्मी-पापा भी शहर से बाहर गए हुए थे. वरना उन्हीं को बुलवा लिया होता.

"तुम लोगों ने मुझे फोन क्यों नहीं किया? क्या मैं मर गई थी?"

अशेष के मना करने पर भी जूठे बर्तनों का जो ढेर लग गया था, कमला ने उसे पल भर में साफ़ कर दिया. संविधा के लिए खिचड़ी बनाई. पूरा घर साफ़ किया. गंदे कपड़े इकट्ठे करके बाथरूम में धोने के लिए रख दिया. संविधा लेटे हुए सब कुछ देख रही थी. कमला ने पूरा घर चमका दिया. संविधा को खिलाकर फिर घर के काम में लग गई. उसने देखा कि अपने जिस बेटे को वह घर में एक ग्लास पानी तक नहीं लेने देती थी, वही यहां पत्नी की चाकरी कर रहा है. उसने संविधा का सिर धोया, कपड़े बदलवाए. मां-बेटे ने मिलकर शाम तक घर का काया पलट कर दिय. फ़ुर्सत मिलने पर कमला बहू का सिर दबाने बैठ गई.

संविधा ने हाथ पकड़ लिया, "थैंक्यू मम्मी. आप आईं, मुझे बहुत अच्छा लगा. सिर दबाने के लिए रहने दीजिए. आज आप यहीं रुक जाइए."

"हां, मैं भी यही सोच रही हूं. अरे अशेष, तुम अपने मोबाइल की बैटरी तो चार्ज करा लो. कल कितनी बार फोन मिलाया था, पर वह काम ही नहीं कर रहा था."

"संविधा की चिंता में में बैटरी चार्ज करना ही भूल गया था.‌ पापा चिंता करेंगे. मैं नीचे जाकर फोन करके आता हूं कि आज आप नहीं आएंगी. उन्हें तकलीफ़ तो होगी, पर..."

"उन्हें तो बाहर खाने को मिलेगा, इसलिए वह ख़ुश ही होंगे. संविधा, तुम्हारे लिए काढ़ा बना दूं."

"व्हॉट इज दैट अशेष?"

"चिंता की कोई बात नहीं है. सोंठ डालकर बनाऊंगी तो अच्छा लगेगा."

"मम्मी, आपको हमारे यहां सौंठ नहीं मिलेगी."

"मैं सब कुछ लेकर आई हूं." बेटा-बहू ने रुकने के लिए आग्रह किया था, यह बात कमला को अच्छी लगी थी. वह दो दिन रुकीं.

आते ही घर देखकर उसे बहुत ग़ुस्सा आया था. बहू को घर-गृहस्थी का ज़रा भी ज्ञान नहीं है. किसी भी चीज़ का ठिकाना नहीं और यह अशेष, संविधा का सिर गोद में लेकर दबाता है, पैर तक दबाता है. इसे शर्म भी नहीं आती.

संविधा देख रही थी कि मम्मी कितने पुराने विचारों वाली है. कोने में रखी कृष्ण भगवान की मूर्ति को साफ़ करके तिपाई पर रखा और एक गुलदस्ता रखकर पैर छुए.

"मेरी संविधा को जल्दी ठीक करना भगवान."

और फिर संविधा के पास बैठते हुए पूछा, "तुम्हारे लिए क्या बनाऊं संविधा?"

"मम्मी, आप जब से आई हैं, कितनी मेहनत कर रही हैं. आप आराम से बैठिए, अशेष होटल से..." "बीमारी में कहीं होटल का खाना खाया जाता है. ला बैठे-बैठे सिर में तेल लगा दूं."

अशेष हंस पड़ा, "मां तुम्हें याद है, हम दोनों भाई और पापा आपसे तेल लगवाने के लिए झगड़ पड़ते थे."

संविधा के सिर में हल्के हाथ से तेल लगाते हुए कमला ने कहा, "बेटा, अब तो कोई लड़नेवाला ही नहीं रहा. इसलिए तेल लगाने का आनंद ही चला गया."

संविधा को इतना अच्छा लगा कि वह सो गई. लगभग घंटे भर बाद आंख खुली देखा बगल में मां की गोद में सिर रखे अशेष भी सो रहा था. उसने फिर आंखें बंद कर लीं. जब अशेष की आंख खुली तो बालों पर हाथ फेरते हुए कमला ने कहा, "बेटा, घर छोड़कर मैं यहां कब तक पड़ी रहूंगी. पर संविधा अभी कमज़ोर है, इसका ध्यान कौन रखेगा?"

मां-बेटे थोड़ी देर तक शांत रहे. फिर थोड़ा धीमे से अचकचाते हुए कमला बोली, "संविधा को लेकर घर चलो न अशेष, उसे वहां दो-चार दिन आराम मिल जाएगा और तुम्हारे पापा भी इसे देख लेंगे."

अशेष उठकर बैठ गया. मां का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला, "संविधा से पूछो न मां. बिना उसके पूछे..."

कुकर की सीटी बजी तो कमला उठकर रसोई में चली गई. संविधा लेटे-लेटे उनकी पीठ देखती रही, जब वह वापस आईं, तो संविधा उठकर बैठ गई और बोली, "थैंक्यू मॉम, आपके तेल ने तो गज़ब कर दिया. मुझे नींद ही आ गई. मम्मी आपको एतराज़ न हो, तो एक बात कहूं."

"कहो न बेटा, शाम को मैं चली जाऊंगी, जानती हूं, तुम लोगों को जगह की तकलीफ़ है."

"नहीं मम्मी, मैं सोचती हूं कि कुछ दिन के लिए आपके साथ चलूं. मम्मी आपका थोड़ा काम ज़रूर बढ़ जाएगा, पर ठीक हो जाऊंगी तो... पापा से भी मिलने का मन है. यदि आप कहें तो..."

"मैं तो पहले से ही कह रही थी. शाम को क्या, अभी चलते हैं."

अशेष और संविधा आश्चर्य से कमला को देख रहे थे. कमला बोली, "इस तरह आंख फाड़कर क्यों देख रहे हो? अरे मेरी बहू गांव की थोड़ी ही है. शहर की पढ़ी लिखी बहू है. अख़बार में लिखती है."

अशेष ने उत्साह के साथ सारा सामान पैक किया. कमला ने संविधा को उठाया. सामान लेकर अशेष बाहर निकला, संविधा का हाथ पकड़कर कमला ने भगवान के पैर छुए. कमला को भगवान के पैर छूते देखकर संविधा ने भी भगवान के पैर छुए.

घर से बाहर आकर संविधा बोली, "मम्मी, आप घर से निकलते समय हमेशा भगवान का नाम लेती हैं. आज भगवान का नाम नहीं लेंगी क्या?"

"जय श्रीराम, जय श्री कृष्ण." कमला तुरंत बोली.

"जय श्री राम मां." संविधा बोली और घर के बाहर निकल आई. घर में ताला लगाते हुए कमला हंसी, "संविधा बेटा, आज तुमने भूलकर मुझे मॉम की जगह मां कह दिया."

"हां मां. भूलकर नहीं, जान-बूझकर मां कहा है." सास-बहू दोनों टैक्सी की ओर बढ़ गईं.

- वीरेंद्र सिंह

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