कहानी- परिवर्तन (Short Story- Parivartan)

‘‘एक साधारण-सी दिखनेवाली स्त्री जिसे अबला कहा जाता है, वो भीतर से कितनी बलशाली है. उसके अंदर सोए स्वाभिमान को यदि जगा दिया जाए, तो वो क्या कर सकती है, इस बात का जीवंत उदाहरण है सामने बैठी मेरी सहेली और व्यवसाय में मेरी सहभागी वृंदा. दुखों से जूझती नारी को मैंने बस सहारा दिया और थोड़ा-सा मार्गदर्शन किया, तो उसने मेरे छोटे से काम को विस्तृत बना दिया. आज मुझे जो सम्मान मिला है, उसकी असली हक़दार वही है, क्योंकि वो स्वयंसिद्धा है.’’

Kahani

धीमे क़दमों से घर की ओर आती वृंदा को देखकर उसके बच्चों में उत्साह जागा और वो दौड़कर उससे लिपट गए. वृद्धा सास ने हाथ का सहारा देकर उसके सिर पर रखी सब्ज़ी की टोकरी उतरवायी, ‘‘ये क्या? आज भी कुछ ज़्यादा बिक्री नहीं हुई?’’ उसके प्रश्‍न में पीड़ा छिपी हुई थी. दाने-दाने को मोहताज होते परिवार की आमदनी का एकमात्र ज़रिया यही था. फटे आंचल से चेहरे पर आयी पसीने की बूंदों को साफ़ करके वृंदा धम्म से बैठ गयी. सारा दिन यहां-वहां सिर पर बोझ लादे पैदल चलती रही. इस आशा से कि शायद आज तो उसे मेहनत का फल मिलेगा, पर हमेशा की तरह आज का दिन भी व्यर्थ गया. बच्चों के पीले पड़ते चेहरे की ओर दृष्टिपात करते ही उसकी आंखों से दर्द आंसुओं के रूप में बहने लगा.

तब सास ने ढांढ़स बंधाया, ‘‘कोई बात नहीं, हो सकता है कल ज़्यादा बिक्री हो जाए. चल सब्ज़ी को गीली बोरी में लपेट दे, ताकि सबेरे तक ताज़ी रहे.’’ पत्नी को निराशा से घिरी देखकर अंदर बिस्तर पर पड़े रोगी पति गोपाल का कलेजा मुंह को आ गया. वो अपने भाग्य को कोसने लगा. यदि दुर्घटना में मेरा अंग भंग न होता, तो मेरे परिवार की ये दुर्दशा न होती. ‘‘सुन, तू कोई दूसरा काम क्यों नहीं कर लेती?’’ उसने पत्नी को सलाह दी.

‘‘दूसरा काम… भूल गए क्या, पहले मेरे साथ क्या हुआ था? मेरी ईमानदारी का मालिकों ने क्या सिला दिया था. उनके घर का सब काम मैं पूरी लगन के साथ किया करती थी, लेकिन नौकर की कोई इ़ज़्ज़त नहीं होती. उनके कमरे से पांच सौ रुपए जो उनके ही बेटे ने चुराए थे, उसकी चोरी का इल्ज़ाम उन्होंने मुझ पर लगाया. रातभर पुलिस थाने में बिठवाया. वो तो मैंने एक पुलिस वाले साहब के घर थोड़े दिन काम किया था, उनकी मेमसाब ने दया दिखायी और मुझे झंझट से छुटकारा दिलवाया. बाद में सारी सच्चाई सामने आ गई, पर उससे मेरा खोया हुआ मान तो वापस नहीं आया. इसलिए तौबा, अब किसी के घर में काम नहीं करूंगी.’’

‘‘सब मेरा ही दोष है. यदि मैं हाथ-पैर से लाचार न होता तो आज ये दिन तो नहीं देखने पड़ते. तुम दर-दर की ठोकरें खा रही हो. मां इस बुढ़ापे में मेरी सेवा कर रही है और हमारे दोनों बच्चों का तो बचपन ही छिन गया. ’’ कहते-कहते गोपाल रो पड़ा.

‘‘सुनिए, दिल छोटा मत कीजिए. जब वो दिन नहीं रहे तो ये दिन भी नहीं रहेंगे. जब तक आप भले-चंगे थे तब तक मैंने सुख भोगा. अब मेरा दायित्व है कि मैं आपका हर तरह से ध्यान रखूं. आख़िर मैं आपकी अर्धांगिनी हूं. जब सुख साथ बांटा है तो दुख में भी साथी बनूंगी.’’ वृंदा ने दिलासा दिया और घर का काम निपटाने चली गयी. रातभर वो सोचती रही कि ऐसा क्या करे, जिससे उसके अपनों का दुख-दर्द कम हो जाए. पति एक प्राइवेट कंपनी में ड्राइवर था. आमदनी ठीक थी, सो गुज़ारा अच्छे से हो जाता था. एक सड़क दुर्घटना में पति की जान तो बच गई, पर दोनों पैर और एक हाथ कट गया. जो कुछ रुपया-ज़ेवर पास में था, वो सारा इलाज में ख़र्च हो गया. पेट भरने के लिए उसे बाहर क़दम रखना पड़ा. सास के पास चांदी की एक जोड़ी पायल बची थी, जिसे बेचकर सब्ज़ी बेचने का काम शुरू किया, पर उसकी माली हालत को देखकर कोई उससे सौदा लेना तो क्या, उसकी ओर देखना भी पसंद नहीं करता था. वो दूर-दूर तक भटकती तब कहीं जाकर दो पैसे कमा पाती, जिससे घर के लोगों को दाल-रोटी नसीब हो पाती. आंखों ही आंखों में सारी रात बीत जाती. बच्चों से घर की हालत छिपी नहीं थी. वो अपनी इच्छाओं का दमन करके अपने माता-पिता को सहयोग दे रहे थे.

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सुबह सूरज के उगते ही वृंदा घर का काम निपटाकर सब्ज़ी टोकरी में सजा निकल पड़ी. आधा दिन बीत गया, पर बोहनी नहीं हुई. मन-ही-मन ईश्‍वर से दया की प्रार्थना कर रही थी कि तभी उसके कानों में शब्द टकराए, ‘‘ऐ भाजीवाली, ज़रा सुन तो, इधर आ.’’ वो मुड़ी, ‘‘अरे जया तू….’’ ‘‘कौन… वृंदा… तू इस हालत में!’’ घर के दरवाज़े पर खड़ी महिला दौड़ती हुई बाहर आयी और अपनी सखी का हाथ पकड़कर अंदर ले गयी. ‘‘ये क्या हाल बना रखा है तूने? बिखरे बाल, फटे हुए कपड़े. क्या हो गया है तुझे?’’ उसने प्रश्‍न किया. ‘‘जब भाग्य ख़राब हो तो ऐसी ही दशा हो जाती है. एक हादसे में ये हाथ-पैरों से लाचार हो गए. जो कुछ पास में था, वो एक-एक करके बाज़ार में बिक गया. घर की गाड़ी पलट गयी. पढ़ी-लिखी तो ़ज़्यादा हूं नहीं, जो कहीं नौकरी कर लेती. नौकरानी का काम करके भी कुछ हाथ नहीं आया तो यही काम शुरू कर दिया. मेरी छोड़, तू बता कैसी गुज़र रही है?’’ वृंदा ने विषय को बदला, ‘‘अपनी आंखों से देख ले कि एक समय काम से जी चुराने वाली तेरी ये सहेली अब क्या कर रही है, चल आ.’’ इतना कहकर वो घर के पिछवाड़े ले गई. वहां का दृश्य देखकर वृंदा की आंखें विस्मय से फैल गईं. छह-सात महिलाएं पापड़ बना रही थीं, कुछ महिलाएं एक ओर बड़ियां बना रही थीं, ‘‘तू ये सब क्या..’’

‘‘हां, घर में रहकर मैं अपना छोटा-सा व्यवसाय चला रही हूं. न बाहर जाने का झंझट और न ही किसी की चाकरी. आत्मसम्मान भी बरकरार. है ना मज़े की बात.’’ जया ने खुलासा किया.

‘‘इसमें तो बहुत ख़र्चा आया होगा.’’ वृंदा दुखी मन से बोली.

जया ने उसके मन के भावों को ताड़ लिया, कहने लगी, ‘‘नहीं रे, ये सब तो सूझ-बूझ से कर लिया. जानती तो है तू. पति की छोटी-सी नौकरी में गृहस्थी का ख़र्च चलाना कितना मुश्किल होता है. नौकरी तो अच्छे-अच्छे डिग्रीवालों को नहीं मिलती तो हमें कहां से मिलेगी. मुझे हाथ का काम आता था सो मैंने इसी को व्यवसाय बना लिया.’’

‘‘काम तो मैं भी करती हूं, पर सब्ज़ी बिकती ही नहीं. अब तो इसे भी बंद करने की नौबत आ गयी है. समझ में नहीं आता कि कौन-सा काम करूं?’’

‘‘पहला काम तो यह कर कि मुझे सब्ज़ी दे.’’ जया ने तुरंत आस-पड़ोस की महिलाओं को बुलाया और सब्ज़ियों को बेचकर वृंदा के हाथ में पैसे रख दिए.

जिसको बेचने के लिए वो दो दिन से पसीना बहा रही थी, उसे जया ने कितनी कुशलता से कुछ ही मिनटों में बेच दिया. ‘‘समय बहुत हो गया है. अब चलती हूं.’’ वृंदा ने जया से विदा ली और घर आ गयी. सास ने जब टोकरी को खाली देखा तो उसके चेहरे पर संतोष छा गया. बच्चों के भी चेहरे खिल गए. शाम को भोजन के बाद उसने पति और सास को जया और उसके कामकाज के बारे में बताया, ‘‘तेरी सहेली तो बड़ी समझदार है. उससे ही कुछ गुर सीख ले, ताकि तेरी परेशानी कम हो और घर का गुज़ारा भी हो सके.’’ सासू मां ने सुझाव दे डाला. ‘‘मांजी, आप ठीक कहती हैं. मैं उससे बात करूंगी.’’ रात्रि में उसको बीता समय याद आने लगा. हर काम को बाद में करने का बहाना करने वाली उसकी सहेली जया को सब आलसी कहकर पुकारते थे और वो भी अपने इस नाम से ख़ुश रहती थी. वहीं दूसरी ओर वृंदा घर-भर की दुलारी थी. मां का रसोई में दौड़कर हाथ बंटाती, छोटे भाई-बहनों को भी बख़ूबी संभालती. मोहल्ले में किसी के घर में भी ज़रूरत होती तो वृंदा मदद करने फौरन पहुंच जाती. उसके हाथ का बना अचार तोे सब चटकारे लेकर खाते. सुबह उठी तो वृंदा को लगा कि उसके जीवन में आया अमावस का अंधेरा छंटने वाला है और सुनहरी किरणें तमस को चीरती हुई उसकी ओर आ रही हैं. अगले दिन दोपहर के समय मन में दृढ़ निश्‍चय कर वो जया के घर पहुंची. ‘‘मुझे ख़ुशी होगी कि मैं तेरे कुछ काम आ सकूं.’’ जया ने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया. ‘‘जया, मैं भी तेरी तरह आत्मसम्मान से जीना चाहती हूं. आत्मनिर्भर बनना चाहती हूं.’’ ‘‘इसमें कोई मुश्किल नहीं है, पर सबसे पहले तो तुझे अपने हुलिए पर ध्यान देना होगा. अरे पहले ये दुनिया चमक-दमक ही देखती है. सामान की पैकिंग यदि अच्छी होगी तो ग्राहक ख़ुद उसकी ओर दौड़ेगा. यदि वो ही ठीक नहीं तो वस्तु कितनी ही अच्छी हो, सब व्यर्थ है.’’

‘‘मेरे पास तो इनके अलावा कपड़े ही नहीं हैं.’’ वृंदा ने अपनी मजबूरी बयान की. ‘‘मैं किसलिए हूं. सहेली क्या बहन नहीं होती. मेरे पास कुछ कपड़े नए रखे हैं, वो तू पहन लेना. किसी भी काम को करने के लिए बहुत ऊंची शिक्षा पाना ज़रूरी नहीं, बस आपके भीतर लगन होनी चाहिए. नारी को स्वयंसिद्धा यूं ही नहीं कहा जाता. उसके भीतर असीमित शक्ति का भंडार होता है. बस उसे जगाने की ज़रूरत है, फिर देख वो कठिनाई को कैसे सरलता में बदल देती है. तुझे भी यही करना है. अपनी क्षमता को पहचान और अपने व्यक्तित्व में थोड़ा बदलाव ला. देखना सफलता तेरे भी क़दम चूमेगी. आज से क्या, बल्कि अभी से तुम मेरे कुटुम्ब की सदस्य हो. हम मिलकर काम करेंगे और जो चार पैसे मिलेंगे, उन्हें आपस में बांट लेंगे.’’

‘‘जया तू तो पूरी की पूरी टीचर बन गई है.’’ वृंदा ने चुटकी ली. दोनों खिलखिलाकर हंस दीं. नए क्षितिज को पाने के लिए वृंदा ने पहली सीढ़ी पर क़दम रख दिया. वो रोज़ आकर काम में हाथ बंटाने लगी.?इससे जुड़कर उसे अपनेपन का एहसास हो रहा था. घर में आय भी बराबर होने लगी. जब उसने निर्माण की प्रक्रिया को भली-भांति समझ लिया तब जया ने उसे लोगों के बीच अपने उत्पाद को बेचने का काम दिया. पहले जो वृंदा फटे कपड़ों, उड़े चेहरा और उलझे बालों में सब्ज़ी बेचने जाया करती थी, वही अब करीने से पहनी हुई साड़ी, सादी-सी चोटी और चेहरे पर आत्मविश्‍वास की चमक से भरपूर बिना किसी हिचक के घर-घर जा रही थी. उसके नए अंदाज़ पर किसी ने उसे फटकार नहीं लगायी, उसका सामान हाथों-हाथ बिकने लगा. अब उसने कुटुम्ब में अचार बनाने का काम भी शुरू कर दिया. अब आमदनी लगातार बढ़ने लगी.

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परिवर्तन चहुं ओर आया. जीवन जो मरुस्थल की भांति बेजान हो गया था, उसको अपनी मेहनत से उपजाऊ भूमि में बदलकर उसमें नए प्राण फूंक दिए. उसके पति गोपाल के लिए उसने एक-एक रुपया जोड़कर कृत्रिम पैरों की व्यवस्था की, बच्चों के नाम स्कूल में लिखवाए. पति ख़ुद को उपेक्षित महसूस न करें, इसके लिए उसने घर बैठे कुछ काम शुरू करवाए. गोपाल ने काग़ज़ से थैली और लिफ़ा़फे बनाने का काम शुरू किया, जिससे उसका मन भी लगने लगा और समय का सदुपयोग भी होने लगा. बच्चे और सास भी इसमें सहायता करने लगे. जो लोग पहले उनकी गरीबी का उपहास करते थे, अब वो उनकी प्रगति से ईर्ष्या कर रहे थे. दिन-महीनों में बीतते चले गए. वृंदा के क़दम विकास के पथ पर निरंतर अग्रसर होते रहे. छोटे से कुटीर उद्योग को उसने बड़े व्यवसाय का रूप दे दिया. जया ने भी अपनी सखी को उसके परिश्रम का फल अपने व्यवसाय में भागीदार बनाकर दिया. वृंदा ने अपने परिवार को फिर से ख़ुशहाल बना दिया… ये सब कमाल उसके व्यक्तित्व में आए परिवर्तन का था. एक दिन जब उनके उद्योग को सरकार की ओर से पुरस्कार मिला, तो जया ने अपनी सफलता का सारा श्रेय वृंदा को दिया, ‘‘एक साधारण-सी दिखनेवाली स्त्री जिसे अबला कहा जाता है, वो भीतर से कितनी बलशाली है. उसके अंदर सोए स्वाभिमान को यदि जगा दिया जाए, तो वो क्या कर सकती है, इस बात का जीवंत उदाहरण है सामने बैठी मेरी सहेली और व्यवसाय में मेरी सहभागी वृंदा. दुखों से जूझती नारी को मैंने बस सहारा दिया और थोड़ा-सा मार्गदर्शन किया, तो उसने मेरे छोटे से काम को विस्तृत बना दिया. आज मुझे जो सम्मान मिला है, उसकी असली हक़दार वही है, क्योंकि वो स्वयंसिद्धा है.’’ सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा और वृंदा की आंखों से ख़ुशी के आंसू छलकने लगे… आज उसने सब कुछ पा लिया था.

– राजेश्‍वरी शुक्ला

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