कहानी- सिसकता आसमान (Short Story- Siskata Aasman)

कहानी
अपने बोझिल शरीर को समेटते हुए दीपा खिड़की के क़रीब पहुंची. तब तक तेज़ बारिश होने लगी थी. पानी की बौछारों ने उसके चेहरे को भिगो दिया. दीपा को लगा जैसे आसमान भी उसकी हालत पर सिसक उठा है. खिड़की बंद कर उसने अपने गालों पर ढुलक आए आंसुओं को पोंछा और पास रखी कुर्सी पर ढेर हो गयी.

 

रात्रि का आधा प्रहर बीत चुका था. लखनऊ से सैकड़ों कि.मी. दूर हिमाचल की सुरम्य पहाड़ियों में बसे छोटे से कस्बे रुद्रपुर के निवासी निद्रा के आगोश में खोए हुए थे. किंतु दीपा की आंखों से नींद कोसों दूर थी. वो जीवन के ऐसे मोड़ पर आ पहुंची थी, जहां से आगे बढ़ने का रास्ता उसे नहीं सूझ रहा था. वातावरण में छायी निस्तब्धता आनेवाले तूफ़ान का पूर्वाभास दे रही थी. दीपा ने खुली हुई खिड़की से बाहर झांका, खुले आसमान में भी उसके जीवन की भांति अंधेरा छाया हुआ था. अचानक तेज़ हवाएं चलनी लगीं. खिड़कियों के पल्ले आपस में टकराकर शोर उत्पन्न करने लगे. अपने बोझिल शरीर को समेटते हुए दीपा खिड़की के क़रीब पहुंची. तब तक तेज़ बारिश होने लगी थी. पानी की बौछारों ने उसके चेहरे को भिगो दिया. दीपा को लगा जैसे आसमान भी उसकी हालत पर सिसक उठा है. खिड़की बंद कर उसने अपने गालों पर ढुलक आए आंसुओं को पोंछा और पास रखी कुर्सी पर ढेर हो गयी.

“दीपा-दीपा, कहां हो तुम? बोलती क्यों नहीं? तुम्हारे बिना ये दीप बुझ जाएगा.” घर में घुसते हुए दीपक तेज़ स्वर में चिल्लाया.

“क्यों बेशर्मों की तरह इतना चिल्ला रहे हो. कोई सुन लेगा तो क्या कहेगा.” दीपा ने कुर्सी से उठकर तेज़ स्वर में डपटा.

“यही सोचेगा कि दीपा के बिना दीपक और दीपक के बिना दीपा अधूरी है. दोनों जन्म-जन्मांतर से एक-दूसरे के लिए बने हैं.” दीपक ने हंसते हुए दीपा को अपनी बांहों में भर लिया.

दीपा भी खिलखिलाते हुए कटी हुई बेल की भांति उसके सीने से लिपट गयी. उसे दीपक की बांहों में एक अजीब-सा सुकून मिलता था. मन करता था कि समय यहीं पर ठहर जाए और वो हमेशा यूं ही दीपक के सीने से लिपटी रहे.

तभी दरवाज़े पर हुई दस्तक से दीपा चौंक पड़ी. इसका मतलब वो लखनऊ में दीपक की बांहों में नहीं, बल्कि रुद्रपुर के कॉटेज में लकड़ी की इस कुर्सी में समायी हुई थी. आगे बढ़कर उसने कमरे का दरवाज़ा खोल दिया. सामने उसकी मां की बचपन की दोस्त मालती जोशी खड़ी थीं.

“बेटा, बहुत तेज़ तूफ़ान आया है, खिड़कियां बंद कर लेना.” मालती जोशी ने तेज़ हवा से उड़े जा रहे अपने आंचल को संभालते हुए कहा.

फिर बोलीं, “किसी चीज़ की कमी हो तो निसंकोच बता देना.”

“ठीक है.” दीपा ने मुस्कुराने का प्रयत्न किया. उनके जाने के बाद दरवाज़ा बंद कर दीपा एक बार फिर कुर्सी पर ढेर हो गयी. ‘कमी’ यह एक छोटा-सा शब्द कितना बड़ा होता है, ये दीपा ही जानती है. बचपन से पिता की कमी. दूसरों के कपड़े सिलकर उसे पढ़ा रही मां के हाथों में पैसों की कमी. इतनी बड़ी दुनिया में अपनों की कमी. जब से होश संभाला था उसने, कमी ही कमी देखी थी. अभावों से भरी उसकी दुनिया में ख़ुशियों की सौगात लेकर दीपक एक धूमकेतु की तरह आया था.

लखनऊ विश्‍वविद्यालय में प्रवेश लिए हुए उसे एक महीना ही बीता था कि वहां पर वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन हुआ. दीपक उससे दो वर्ष सीनियर था. वो बहुत ही प्रभावशाली वक्ता था. दो वर्षों से वो ही इस प्रतियोगिता में प्रथम आ रहा था. इस बार भी सभी को उसी के प्रथम आने की उम्मीद थी.

इस बार फ़ाइनल में दीपक और दीपा आमने-सामने थे. मुख्य अतिथि ने स्टेज पर रखे छोटे से बॉक्स से एक पर्ची निकाली. इस बार का विषय था ‘दहेज आज के समाज की आवश्यकता या अभिशाप.’

दीपा हल्का-सा मुस्कुरायी, फिर मुख्य अतिथि की ओर मुड़ते हुए बोली, “सर, अगर आप अनुमति दें तो मैं दहेज के पक्ष और विपक्ष दोनों में ही बोलना चाहती हूं. पहले इसे आज की आवश्यकता और फिर अभिशाप सिद्ध करना चाहती हूं.”

मुख्य अतिथि ने दीपा को दोनों ही विषयों पर बोलने की अनुमति दे दी. दीपा ने पहले दहेज की आवश्यकता पर बोलना शुरू किया. करियर प्रारंभ करनेवाले दंपतियों के आरंभिक जीवन की कठिनाई पर प्रकाश डालते हुए उसने उनके सुखमय जीवन के लिए दहेज की आवश्यकता के पक्ष में इतने अकाट्य तर्क दिए कि एक बार लगने लगा कि वास्तव में दहेज अभिशाप नहीं, बल्कि बदलते हुए समाज की आवश्यकता है. इसके बाद उसने दहेज को अभिशाप बताते हुए जब बोलना शुरू किया तो सुननेवालों के रोंगटे खड़े हो गए. दीपा ने जब बोलना समाप्त किया, तो तालियों की जो गड़गड़ाहट प्रारंभ हुई, वो थमने का नाम ही नहीं ले रही थी.

कुछ देर बाद संचालक ने जब दीपक का नाम पुकारा, तो वो मंच पर पहुंचा. उसने पहले दीपा को घूरकर देखा, फिर उपस्थित जनसमुदाय पर दृष्टि दौड़ाते हुए बोला, “मेरी प्रतिद्वंद्वी ने बहुत कुछ बोला है, लेकिन मैं आप लोगों का ज़्यादा समय नष्ट नहीं करूंगा. मैं तो स़िर्फ इतना कहना चाहूंगा कि दीपा लखनऊ विश्‍वविद्यालय के आकाश में दीप्तिमान एक सूर्य है और सूर्य को दीपक दिखाने की धृष्टता यह दीपक नहीं कर सकता. निर्णायकों से अनुरोध है कि इस प्रतियोगिता का प्रथम और द्वितीय दोनों ही पुरस्कार मेरी इस अद्वितीय प्रतिभा संपन्न प्रतिद्वंद्वी को दे दें.”

पूरा सभागार एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. उस दिन दीपा और दीपक की हुई पहली मुलाक़ात जल्द ही गहरी मित्रता और फिर प्यार में परिवर्तित हो गयी. दीपा को लगता था जैसे वे दोनों जन्म-जन्मांतर से एक-दूसरे के लिए ही बने हैं. विश्‍वविद्यालय से निकलने के पश्‍चात गोमती के तट पर बैठ कर दोनों भावी जीवन के सपने बुनते रहते.

दीपा जब बी.एससी के फ़ाइनल में पहुंची तब दीपक ने एम.एससी पास कर पी.एच.डी. की तैयारी प्रारंभ कर दी थी. दीपक ने भी सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थीं, लेकिन दीपा ने हमेशा की तरह सर्वोच्च अंक प्राप्त किए थे. घंटों लाइब्रेरी में घुसे रहना उसका प्रिय शौक़ था.

एक बार दीपक दो दिन नज़र नहीं आया. तीसरे दिन जब मिला, तो उसका चेहरा उतरा हुआ था. कारण पूछने पर उसने बताया कि काफ़ी मेहनत करने पर भी उसे अपने एक विषय से संबंधित आंकड़े नहीं मिल पा रहे हैं. कुछ देर इधर-उधर की बात करने के बाद दीपा लाइब्रेरी चली गयी. एक घंटे बाद जब वापस लौटी, तो उसके हाथ में एक काग़ज़ था. उसे पढ़ते ही दीपक ख़ुशी से उछल पड़ा, “तुम ये आंकड़े कहां से लायी. इन्हें ढूंढ़ने के लिए तो मैंने कई पुस्तकालयों की खाक छान मारी थी.”

“जनाब, पुस्तकालयों की खाक छानने से कुछ नहीं होता. कुछ ढूंढ़ने के लिए वहां रखी किताबों को चाटना पड़ता है” दीपा हंसते हुए बोली.

“किताब चाटना तो तुम दीमकों का काम है. मैं तो कुछ और चाटूंगा.” दीपक का स्वर गंभीर हो उठा.

“क्या?” दीपा ने अपनी बड़ी-बड़ी पलकों को ऊपर उठाया.

“अपने पथ-प्रदर्शक के सिंदूरी गाल.” दीपक ने प्रणय चिह्न के रूप में प्रथम चुंबन दीपा के गालों पर अंकित कर दिया.

दीपा का सर्वस्व कांप उठा और अधर कंपकंपाए, “दीपक, ये क्या शरारत है.”

“आज से तुम मेरी गुरु हुई और ये शरारत नहीं, बल्कि मेरी गुरुदक्षिणा है.” दीपक शरारत से मुस्कुराया.

“अगर गुरुदक्षिणा देनी है तो मेरे चरण स्पर्श करो.”

“तुम्हारे चरण स्पर्श भी किए जाएंगे. लेकिन यह पुनीत कार्य मैं नहीं, बल्कि हमारे बच्चे करेंगे.” दीपक ने तर्जनी से दीपा के चेहरे को ऊपर उठाते हुए उसकी आंखों में झांकते हुए कहा.

“दीपा, मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं. मेरी शादी अगर होगी तो तुम्हीं से होगी.” दीपक बोला.

उस दिन के बाद से उसने दीपक के शोध की आधी ज़िम्मेदारी उठा ली थी. वो लाइब्रेरी से खोज-खोजकर आंकड़े और संदर्भ जुटाती और दीपक उन्हें मनचाहा रूप दे देता. दीपा की मेहनत से उसका शोधग्रंथ बहुत जल्दी ही पूरा हो गया था. दीपा की मां भी उसे बहुत पसंद करने लगी थी. मन ही मन उन्होंने दीपक को अपना दामाद स्वीकार कर लिया था.

दीपा की प्रेरणा से उसने अपने शोधग्रंथ को अमेरिका के एक जरनल में छपने भेज दिया था. इस बीच उसने एक कम्प्यूटर भी ख़रीद लिया था. शोधग्रंथ छपते ही दीपक के ईमेल पर बधाइयों का तांता लग गया. अमेरिका के कई विश्‍वविद्यालयों एवं वैज्ञानिक संस्थाओं ने उसे उच्च शोध करने के लिए स्कॉलरशिप देने का प्रस्ताव भी भेजा था. दीपा के समझाने पर दीपक ने एक विश्‍वविद्यालय की स्कॉलरशिप स्वीकार कर ली.

अमेरिका जाने से पहले दीपक अपना कम्प्यूटर दीपा को दे गया था. वहां पहुंचते ही उसने दीपा को ईमेल किया. अमेरिका की भव्यता, वहां की चकाचौंधभरी ज़िंदगी और अपनी ख़ुशियों का वर्णन करने के बाद उसने दीपा की प्रशंसा के पुल बांध दिए थे. उसका हर ईमेल प्यार की ख़ुशबू से सराबोर रहता.

दीपा एम.एससी फ़ाइनल में पहुंच चुकी थी. हमेशा की तरह इस बार भी प्रथम आने के लिए वो दिन-रात मेहनत कर रही थी. तभी एक दिन दीपक का ईमेल मिला. उसने लिखा था… ‘दीपा, यहां की ज़िंदगी बहुत कठिन है. मैंने अभी तक तुम्हें सच्चाई नहीं बतायी थी, लेकिन अब लगता है कि मुझे अपनी रिसर्च बीच में ही छोड़नी पड़ेगी. दरअसल, स्कॉलरशिप में यहां का ख़र्चा पूरा नहीं हो पाता है. इसलिए मुझे पार्ट टाइम नौकरी भी करनी पड़ रही है. उसमें इतना थक जाता हूं कि रिसर्च का काम पिछड़ता जा रहा है. विश्‍वविद्यालय से मुझे चेतावनी भी मिल चुकी है. अगर तुम चाहो तो मुझे इस परेशानी से बचा सकती हो. ईमेल पढ़ दीपा व्यथित हो उठी. उसने फौरन उत्तर भेजा, ‘दीपक, तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकती हूं, फिर ये संकोच कैसा. अधिकारपूर्वक बताओ कि मुझे क्या करना है.’

दो घंटे बाद ही ईमेल पर दीपक का उत्तर आया, ‘मैं यहां की कुछ लाइब्रेरीज़ के ईमेल एड्रेस और अपने रिसर्च के टॉपिक्स भेज रहा हूं. यहां की लाइब्रेरीज़ की सारी पुस्तक इंटरनेट पर उपलब्ध हैं. तुम हमारे टॉपिक्स से संबंधित सामग्री डाउनलोड करके अच्छी-सी रिपोर्ट तैयार कर ईमेल से भेज दो. कुछ सामग्री तुम वहां की लाइब्रेरी से भी ले सकती हो. तुम्हें मेहनत तो बहुत करनी पड़ेगी, लेकिन प्लीज़ मेरे वास्ते इतना कर दो. मैं अपने शोधग्रंथ पर अपने साथ तुम्हारा नाम भी संयुक्त रूप से दूंगा.

पंद्रह दिनों तक लगातार मेहनत कर दीपा ने एक टॉपिक पर रिपोर्ट तैयार की और उसे ईमेल से दीपक को भेज दिया. अंत में उसने लिखा था- शोधग्रंथ पर मेरा नाम देने की आवश्यकता नहीं है. तुम्हारे लिए कुछ करके मुझे आंतरिक ख़ुशी होती है.

उसी दिन दीपक का उत्तर आया, ‘ईराक युद्ध के बाद अमेरिका का वीज़ा मिलना बहुत कठिन हो गया है. अगर शोधग्रंथ पर तुम्हारा नाम रहेगा, तो तुम्हें आसानी से वीज़ा मिल जाएगा और तुम आराम से हमारे पास आ सकती हो.’

दीपा का मन-मयूर नाच उठा. उसका श्रम सार्थक हो गया. इसके बाद ये क्रम ही बन गया. दीपक एक-एक करके टॉपिक्स भेजता रहा और उसके प्यार में डूबी दीपा पूरी मेहनत से उन पर रिपोर्ट तैयार करके अमेरिका भेजती रही. इन सबसे उसकी पढ़ाई बुरी तरह चौपट हो गयी और उसे फ़ाइनल की परीक्षा छोड़नी पड़ी, किंतु उसे इसका कोई अफ़सोस न था.

एक दिन उसने दीपक के शोधग्रंथ के अंतिम चैप्टर को टाइप करके ईमेल किया ही था कि उसकी पुरानी सहेली हिमानी आ गयी. बी.एससी करने के बाद उसकी शादी कम्प्यूटर इंजीनियर से हो गयी थी और वो उसी के साथ अमेरिका चली गयी थी.

हिमानी को देख दीपा उसके गले से लिपट गयी. दोनों काफ़ी देर तक अपनी पुरानी सहेलियों के बारे में बातें करती रहीं.

अचानक दीपा ने कहा, “तुझे अपने कॉलेज के दीपक की याद है, वो आजकल अमेरिका में ही है. कभी उससे मुलाक़ात हुई कि नहीं.”

“अरे, वो तो बहुत बड़ा आदमी हो गया है. उसकी और उसकी बीवी के लिखे रिसर्च पेपर्स की तो अमेरिकन जरनल में धूम मची हुई है.” हिमानी ने बताया.

“दीपक के रिसर्च पेपर्स की तो धूम हो सकती है, लेकिन उसकी बीवी बीच में कहां से आ गयी. दीपक की तो अभी तक शादी ही नहीं हुई है. तुम्हें कोई ग़लतफ़हमी हुई होगी. दीपक की शादी अभी नहीं हुई है.” दीपा ने डूबते स्वर में कहा. उसे अपना ही स्वर अंजाना-सा जान पड़ा.

“कोई ग़लतफ़हमी नहीं हुई है. हम लोग एक ही शहर में रहते हैं. महीने के अंतिम शनिवार को वहां के सारे भारतीय एक साथ वीकएंड मनाते हैं. तब वो नीलोफर के साथ वहां आता है.” हिमानी ने बताया.

“तू कहीं किसी दूसरे दीपक की बात तो नहीं कर रही.” दीपा ने तिनके का सहारा लेने की कोशिश की. हिमानी की बात सुन उसे अपना कलेजा बैठता हुआ महसूस हो रहा था.

“अरे, मैं उसी दीपक की बात कर रही हूं, जिसके साथ हुई वाद-विवाद प्रतियोगिता में तुझे प्रथम और द्वितीय दोनों ही पुरस्कार मिले थे और जिसके साथ तुम्हारे इश्क़ की हल्की-फुल्की अफ़वाहें भी उड़ी थीं.” हिमानी ने ज़ोर देते हुए बताया.

अब कहने-सुनने को कुछ शेष न बचा था. सारे सपने रेत के महल की तरह ढह गए. हिमानी तो चली गयी, लेकिन एक ऐसा बवंडर छोड़ गयी थी, जिसमें फंसी दीपा को कुछ भी नहीं सूझ रहा था. वह अस्तित्वहीन-सी होकर रह गई थी.

क्या उसका दीपक उसे इतना बड़ा धोखा दे सकता है? मन के किसी कोने में अभी भी आशा की किरण शेष थी. कुछ सोच कर दीपा ने इंटरनेट पर ‘इंडियन रिसर्च एवं डेवलेपमेंट सोसाइटी, नयी दिल्ली’ नाम की एक काल्पनिक संस्था के नाम से नया ईमेल एड्रेस तैयार किया. दीपक और नीलोफर के पेपर्स की भूरि-भूरि प्रशंसा करने के बाद उसने दीपक को अपनी पत्नी के साथ संस्था के वार्षिक समारोह में आने के लिए निमंत्रण भेज दिया. उसने दोनों को आने-जाने का टिकट देने का वायदा भी कर दिया था.

पूरी रात करवटें बदलते बीती. अगली सुबह जब उसने ‘इंडियन रिसर्च एवं डेवलेपमेंट सोसाइटी’ का ईमेल खोला, तो दीपक का संदेश मुंह चिढ़ा रहा था. उसने पत्नी के साथ आने की सहमति भेज दी थी.

इतना बड़ा धोखा. दीपा का अंतर्मन घृणा से भर उठा. उसे दीपक की शादी का इतना अफ़सोस न था, जितना इस बात का था कि दीपक ने उसे मोहरे की तरह इस्तेमाल किया था. उसने हर तरह के शोषण की बात सुनी थी, लेकिन इतना बड़ा मानसिक शोषण? दीपक के प्यार में डूबी वो अपना करियर बर्बाद कर पेपर्स तैयार करती रही और उनके आधार पर वो वहां ऐश कर रहा है. दीपा का चेहरा आंसुओं से भीग उठा.

वो जितना सोचती, निराशा के गर्त में उतना ही डूबती जाती. मां की अनुभवी आंखों ने जल्द ही बेटी का दर्द भांप लिया. सच्चाई जान एकबारगी उन्हें भी दुनिया उजड़ती नज़र आयी, किंतु अपने को संभालते हुए उन्होंने दीपा को समझाया, “तेरी जूठन चाट वो इतना बड़ा आदमी बन गया है तो सोच तू क्या बन सकती है. पूरी ज़िंदगी पड़ी है तेरे सामने. जो हुआ उसे भूल अपनी पढ़ाई में जुट जा. तुझे इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचना है, जहां देखने में भी दीपक को डर लगेगा.”

समझाना बहुत आसान है किंतु जिसके ऊपर बीतती है वो ही जानता है कि दर्द क्या होता है. फिर भी मां की बातों ने दीपा को बहुत सांत्वना दी. वो दीपक को तो नहीं भुला पायी, लेकिन उसने पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर केंद्रित कर दिया. अगले वर्ष उसने एम.एससी. की परीक्षा लखनऊ विश्‍वविद्यालय के इतिहास में सर्वोच्च अंक लेकर उत्तीर्ण की. उसके बाद तो सफलता जैसे पंख फैलाकर उसका स्वागत कर रही थी.

जिस समर्पण एवं तन्मयता से उसने दीपक का शोधग्रंथ तैयार किया था, उससे दुगुनी शक्ति से वो अपना शोधग्रंथ तैयार करने में जुट गयी. उसकी मेहनत रंग लायी. यूजीसी ने उसके शोधग्रंथ को दशक का सर्वश्रेष्ठ शोधग्रंथ घोषित किया. इस बीच उसके कई पेपर्स राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जरनल में प्रकाशित हो चुके थे. उसकी प्रतिभा से प्रभावित हो विश्‍व बैंक ने उसे हिमाचल प्रदेश में होने वाली अपनी एक परियोजना का तकनीकी सलाहकार नियुक्त कर दिया.

समय बड़े से बड़े घावों को भर देता है. दीपा ने अब तक दीपक की यादों को अपने अंतर्मन से उखाड़ फेंका था. एक बुरे स्वप्न के अलावा दीपक का अब उसकी ज़िंदगी में कोई अस्तित्व न था. परियोजना को अंतिम रूप देने के लिए विश्‍व बैंक की टीम शिमला आ रही थी. प्रारंभिक तैयारी करने के लिए दीपा एक दिन पहले वहां पहुंच गयी. उसकी मां की बचपन की सहेली मालती जोशी शिमला से पांच कि.मी. दूर रुद्रपुर में रहती थीं. उनके आग्रह पर वो शिमला के किसी होटल के बजाए रुद्रपुर में रुक गयी थी.

आज फ़ाइल में उसने जब विश्‍व बैंक की टीम के मुखिया का नाम पढ़ा तो चौंक पड़ी. दीपक मल्होत्रा- यही वो नाम था जिसे दीपा सपने में भी याद नहीं करना चाहती थी, किंतु सुस्वाद व्यंजनों के बीच मुंह में आ गए कंकड़ की भांति ये नाम मुंह चिढ़ा रहा था. कुछ सोच कर उसने विश्‍व बैंक के स्थानीय प्रतिनिधि हेमंत गुलाटी से पूछा, “आप विश्‍व बैंक की टीम को रिसीव करने एअरपोर्ट जाएंगे, लेकिन उन्हें पहचानेंगे कैसे?”

“मैडम, मैंने ईमेल से उनकी फोटो मंगवा ली है.” हेमंत गुलाटी ने मुस्कुराते हुए जानकारी दी.

“क्या मैं वो फ़ोटो देख सकती हूं.” दीपा ने धीमे स्वर में पूछा. किसी अनहोनी की आशंका से उसके दिल की धड़कनें बढ़ने लगी थीं.

हेमंत गुलाटी ने एक फ़ाइल से फ़ोटो निकालकर दीपा की ओर बढ़ायी. दीपा ने कांपते हाथों से फ़ोटो को थाम लिया. उसकी आशंका सही साबित हुई. सात सदस्यीय टीम के बीचो-बीच नीलोफर के साथ दीपक खड़ा था. उसके होंठों पर एक मुस्कान तैर रही थी. तो इस परियोजना पर उसे दीपक के साथ काम करना पड़ेगा. वो दीपक जिसने उसका ऐसा शोषण किया है कि जिसकी कोई मिसाल नहीं. प्यार में अक्सर लोग साथी के तन को अपवित्र कर देते हैं, लेकिन दीपक ने तो उसके मन को अपवित्र कर दिया था. क्या उसका अंतर्मन, मन के शोषक का सामना करने के लिए तैयार है, शायद नहीं, वो तो दीपक की यादों से भी अपने को दूर रखना चाहती है. उसके मनहूस साये से भी अपने को बचाना चाहती है. फिर उसके साथ काम कर पाने का तो प्रश्‍न ही नहीं उठता. दीपा के माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आयीं.

“मैडम, आपकी तबीयत तो ठीक है?” हेमंत गुलाटी ने दीपा के पीले पड़ गए चेहरे को देखते हुए पूछा.

उत्तर देने के बजाय दीपा ने मेज पर रखे पानी के ग्लास को उठाकर होंठों से लगा लिया. एक ही सांस में उसने ग्लास खाली कर दिया, किंतु मन की अग्नि को शांति नहीं मिली. वो कंपकंपाते हाथों से ग्लास मेज़ पर रखते हुए बोली, “मि. गुलाटी, मेरी तबीयत ठीक नहीं है. मैं रुद्रपुर जा रही हूं.”

“मैडम, कल 11 बजे मीटिंग है. आप थोड़ा पहले आकर फ़ाइल देख लीजिएगा.” हेमंत गुलाटी ने कहा.

“मैं नहीं आ सकूंगी, आप स्वयं सब संभाल लीजिएगा.” दीपा ने कहा. इससे पहले कि हेमंत गुलाटी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त कर पाते, अपना पर्स उठा वो तीर की तरह वहां से निकल गयी.

विश्‍व बैंक की परियोजना से सलाहकार के रूप में जुड़कर वो बहुत प्रसन्न थी. इतनी कम उम्र में इतना बड़ा पद मिल जाना निश्‍चय ही सौभाग्य की बात थी. सफलता के द्वार उसके स्वागत में खुले हुए थे, किंतु अब इस पद पर कार्य कर पाना संभव न था.

रुद्रपुर आकर उसने अपना त्यागपत्र लिख डाला. किंतु इससे उसके मन को शांति नहीं मिली. उसका सिर दर्द से फटा जा रहा था. मालती जोशी ने गोली दी. किंतु कोई लाभ नहीं हुआ. वो चुपचाप कमरे में पड़ी रही. धीरे-धीरे रात हो गयी. आसमान में छायी काली चादर की भांति उसके जीवन में भी कालिमा छा गयी थी. कल सुबह होते ही वो शिमला से दूर चली जाएगी… उसने मन ही मन निर्णय लिया.

अचानक तेज़ गड़गड़ाहट से चारों दिशाएं गूंज उठीं. इसी के साथ चमकी बिजली से आसपास की पहाड़ियां रौशनी से नहा उठीं. क्षण भर के लिए ही सही किंतु उच्च शिखर की ओर जा रही पगडंडी अंधकार का सीना चीर जगमगा उठी थी. तो क्या उसके जीवन मार्ग के सभी रास्ते बंद हो चुके हैं? उनमें रौशनी की कोई किरण शेष नहीं बची है? दीपा की सोच को झटका लगा.

इस अंधकार से बचकर वो कहां जाएगी? जहां जाएगी क्या पराजय का दंश उसे चैन से जीने देगा? झंझावातों से मुंह मोड़ लेने पर क्या मन को शांति मिल जाएगी? क्या पलायन समस्या का हल है? यदि नहीं तो फिर वो पलायन क्यूं करे? स़िर्फ इसलिए कि वो एक स्त्री है, कमज़ोर है, उसका शोषण हुआ है?

स्त्री होना और अंजाने में शोषित होना कोई अपराध नहीं है. अगर अपराध है तो शोषण का प्रतिकार न करना अपराध है. कायरता दिखाना अपराध है. नहीं, वो कायर नहीं है. पूरी शक्ति के साथ वो दीपक का सामना करेगी. अडिग, अविचल और अजेय रहेगी. अगर परिस्थितियों से भागना है तो दीपक भागेगा, वो नहीं.

दीपा ने निर्णय लिया. उसका आत्मविश्‍वास एक बार फिर जाग उठा था. पर्स खोलकर उसने त्यागपत्र निकाला और उसे फाड़कर हवा में उछाल दिया. बाहर आया तूफ़ान शांत हो चुका था. उसने आगे बढ़कर खिड़की खोल दी. ठंडी हवा के झोंकों ने बांहें फैलाकर उसके निर्णय का स्वागत किया. अपनी बिखर गयी लटों को समेटते हुए वो बिस्तर पर आकर लेट गयी.

अगले दिन वो जान-बूझकर बैठक कक्ष में देरी से पहुंची. दीपक बैठक का संचालन कर रहा था. दीपा ने हल्की-सी दस्तक देकर दरवाज़ा खोला. आहट पा सभी दरवाज़े की ओर देखने लगे. दीपा ने पहले दायां पैर भीतर रखा फिर मज़बूती से एक-एक क़दम रखते हुए आगे बढ़ने लगी. उसे देख दीपक के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि दीपा से इन परिस्थितियों में मुलाक़ात हो सकती है.

“मि. दीपक, आई एम दीपा रस्तोगी. इस प्रोजेक्ट की टेक्निकल एडवाईज़र.” भरपूर आत्मविश्‍वास के साथ दीपा ने हाथ आगे बढ़ाया.

दीपक कसमसाकर रह गया. दीपा से हाथ मिलाने का साहस करना तो दूर, वो उसकी ओर देख पाने का भी साहस नहीं जुटा पा रहा था.

“कम ऑन मि. दीपक, हमें इस प्रोजेक्ट पर मिलकर काम करना है, इसलिए हाथ मिलाने में कोई बुराई नहीं है.” दीपक की हालत देख दीपा विजयी मुद्रा में मुस्कुरायी.

अपनी उखड़ती सांसों को काबू में करने का असफल प्रयास करते हुए दीपक ने कंपकंपाता हुआ हाथ आगे बढ़ाया. दीपा ने उसे थाम गर्मजोशी से हिलाते हुए कहा, “मेरे रहते आपको परेशान होने की आवश्यकता नहीं, मैं आंकड़े भी जुटा लूंगी और प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी तैयार कर दूंगी. बस उस पर नाम हम दोनों का होना चाहिए.”

सड़ाक… सड़ाक…. सड़ाक… जैसे नंगी पीठ पर कोड़े बरसाए जा रहे हों. दीपक का सर्वांग सूखे पत्ते की भांति कांप उठा. उसकी ज़ुबान तालू से चिपककर रह गयी. वह चाह कर भी कुछ नहीं कह पा रहा था.

दीपा ने उसके चेहरे पर उपेक्षा भरी दृष्टि डाली और इत्मीनान से अपनी कुर्सी पर आ बैठी. उसने कुर्सी की पुश्त पर पीठ टिका कर उसे हल्का-सा पीछे किया और भरपूर आत्मविश्‍वास के साथ बोली, “मि. दीपक, बीता हुआ समय वापस नहीं लौटता है, इसलिए उसे बर्बाद करने के बजाय आज की बैठक की कार्यवाही शुरू कीजिए.”

दीपक की समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करे. सिसकता आसमान अंगारे बरसाने लगा था. उसकी तपिश में झुलसने के अलावा और कोई चारा न था.

 

9

   संजीव जायसवाल ‘संजय’

 

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