कहानी- बेशऊर 3 (Story Serie...

कहानी- बेशऊर 3 (Story Series- Beshur 3)

प्रेम की सनातन चाह सब को होती है. उसे भी थी, पर कच्चे धागेवाला प्यार भी उतना ही स्वार्थी निकला, जितना की मंगलसूत्र से बंधा रिश्ता. सब ने उसकी परवाह करना छोड़ दिया, तो वह भी सब का साथ त्यागकर अकेले रहने लगी. अकेले रहते-रहते वह बेपरवाह-सी हो गई थी. कभी खाना बनाती, कभी मन नहीं होता, तो नहीं बनाती. कभी नहाती, कभी नहीं नहाती. कभी-कभी मां मिलने आती, तो उसे देख रो पड़ती. अपने हाथों से उसके बाल संवारती, कपड़े बदलवाती और उसके गंदे कपड़े धोती.

‘‘नहीं भैया… उसने दूसरी शादी कर उस लड़की को घर ले आया था.’’ वह रूक-रूक कर किसी तरह बोली. तो इस बार भैया की जगह पर भाभी बोली, “क्यों नहीं करेगा वह शादी, जब इसे पति के साथ रहने का शऊर ही नहीं था, दूसरी लड़की होती तो इतने दिनों में अपने प्यार और सेवा से पति को बांध ली होती. इस तरह बैग उठाए यहां नहीं चली आती.
पर यह क्यों न आए, एक मुफ़्त की नौकरानी जो बैठी है इनकी सेवा के लिए और भाई ने भी तो पैसों के पेड़ उगा ही रखे हैं, तो किस बात की चिंता.’’ फिर भैया की तरफ़ मुखातिब हुई, ‘‘जाइए इसे इसके ससुराल में छोड़कर आइए. देखते हैं, वे लोग कैसे नहीं रखते हैं.
तब मां ने कहा था, ‘‘बेटा, छोड़ दे इसे. जाने कैसी-कैसी प्रताड़ना झेलकर आई है. सोच-समझकर जो करना होगा, किया जाएगा.”
‘‘उन्हे यूंं ही छोड़ दूं. पूरे 15 लाख दिए थे पापा ने गिनकर. सारे पैसे उन्हे कैसे पचा लेने दूं?’’
वह चुप क्या करे? बिना अपराध यहां भी सुनना, बिना अपराध वहां भी सुनना. बिना कुछ किए भैया से क्षमा मांगती रही जैसे ससुराल में सासू मां से बिना अपराध क्षमा मांगती रहती थी. कभी-कभी उसे लगता जब उसे सब से क्षमा ही मांगते रहना है, तो मां को उसका नाम ही क्षमा रख देना चाहिए था.
दूसरे दिन ही मानसिक विक्षिप्तता का आरोप लगाकर तलाक़ का नोटिस आ गया. फिर शुरू हुआ केस-मुक़दमा. ऐसे-ऐसे आरोप और उसके पागलपन के मनगढ़ंत कहानियां कोर्ट में पेश की गई कि जिसे सुनकर वह पानी-पानी हो गई. फिर भैया ने समझौता का रूख अपनाया. कुछ रुपया महीना गुज़ाराभत्ता पर तलाक़ हो गया. भाभी ने साफ़ इंकार कर दिया, ज़िंदगीभर वह बोझ नहीं ढ़ोएगी.
मकान अभी भी मां के नाम पर था. चौथे माले पर एक कमरा बना था, जिसे उन्होंने अंजली को सौप दिया. तब से अंजली का वह बसेरा बन गया. कभी पापा द्वारा वहां ढेर सारे गमले रखे गए थे, जो अब बेतरतीब पड़े थे. अंजली ने फिर से उसे संभाल लिया था. ज़रूरत का सामान एक बार जाकर ले आती, फिर वह नीचे नहीं उतरती.

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प्रेम की सनातन चाह सब को होती है. उसे भी थी, पर कच्चे धागेवाला प्यार भी उतना ही स्वार्थी निकला, जितना की मंगलसूत्र से बंधा रिश्ता. सब ने उसकी परवाह करना छोड़ दिया, तो वह भी सब का साथ त्यागकर अकेले रहने लगी. अकेले रहते-रहते वह बेपरवाह-सी हो गई थी. कभी खाना बनाती, कभी मन नहीं होता, तो नहीं बनाती. कभी नहाती, कभी नहीं नहाती. कभी-कभी मां मिलने आती, तो उसे देख रो पड़ती. अपने हाथों से उसके बाल संवारती, कपड़े बदलवाती और उसके गंदे कपड़े धोती. उसे हिदायत
कुछ काम-धंधा करने की सोच.
वह हंस कर रह जाती. पहले उसने बहुत कोशिश की थी कि कोई नौकरी मिल जाए. उसने जगह-जगह इंटरव्यू दिए. पर उसका आत्मविश्‍वास इतना टूट चुका था कि कहीं भी ठीक ढंग से बात ही नहीं कर पाती थी. हर जगह उसे निराशा ही हाथ लगी. नौकरी देने के बदले लोग उसका मज़ाक उड़ाते. घर लौटने पर भाभी कहती, ‘‘इसे नौकरी कौन देगा? इतनी अक्ल होती, तो तलाक़ नहीं होता.’’

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

Rita kumari

रीता कुमारी

 

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