कहानी- प्रश्‍नों के चौराहे पर खड़...

कहानी- प्रश्‍नों के चौराहे पर खड़ी मां (Story- Prashno Ke Chaurahe Par Khadi Maa)

Hindi Short Story
पर मेरी हर चाहत शादी के मंडप में जलकर राख हो गई. तब मैं आईने में ख़ुद को देख-देख कर रोती रहती और सवाल करती भगवान से कि आख़िर उसने मुझे लड़की क्यों बनाया? पर अभिषेक को पाकर ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं रही.

मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि मेरे सामने ऐसे प्रश्‍न आकर खड़े हो जाएंगे, जिनका उत्तर मेरे पास है ही नहीं. आज मेरा सबसे बड़ा सहारा भी मेरी ही ग़लती के कारण मुझसे दूर हो गया है, मुझसे नाराज़ हैं- मेरे अभिषेक. क्या करूं? दो महीने पहले लिए गए इस फैसले से कितनी ख़ुश थी मैं! लगा था जैसे कोई जंग जीत ली है. घरवालों के लाख मना करने पर भी अभिषेक को मना-समझाकर मैंने ही सोनल को कैम्प पर जाने की इज़ाज़त दे दी. और करती भी क्या? मां हूं मैं उसकी और फिर मैं भी तो इसी दौर से गुज़र चुकी थी. सोनल का वो मासूम चेहरा मुझे बिल्कुल उसी तरह नज़र आया, जैसे बीस वर्ष पहले मैं ख़ुद आईने के सामने खड़ी थी- मजबूर… लाचार.
पढ़ाई में अव्वल, खेल-कूद में भी मैं आगे ही रहती थी, पर पापा की सख़्त हिदायत थी, “तुम हरगिज़ नाच-गाना या खेल-कूद में हिस्सा नहीं ले सकती. खेलना ही है तो कैरम या चेस खेलो. पर बाहर जाकर खेलना, नाचना या गाना, ये सब हमारी परम्परा में नहीं है. हमारे घर की लड़कियां गृहलक्ष्मी होती हैं और घर की शोभा बनती हैं.” ऐसे में मेरी हर ख़्वाइश अधूरी रह गई.
कुछ समय बाद जब मेरा ग्रेजुएशन ख़त्म हुआ तो न चाहने पर भी मेरी शादी तय कर दी गई. ग्रेजुएशन में अच्छे अंक मिले थे और मैं एम.ए करना चाहती थी. पर मेरी हर चाहत शादी के मंडप में जलकर राख हो गई. तब मैं आईने में ख़ुद को देख-देख कर रोती रहती और सवाल करती भगवान से कि आख़िर उसने मुझे लड़की क्यों बनाया? पर अभिषेक को पाकर ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं रही. पापा-मम्मी मेरे ख़ुशहाल जीवन से ख़ुश थे. हालांकि ससुरालवाले भी वैसे ही संकीर्ण मनोवृत्ति के थे, पर अभिषेक के प्रयासों से मैं घर की चारदीवारी से बाहर के जहां में ख़ुद को तलाशने में सफल हो सकी. अभिषेक ही थे, जिन्होंने मेरे मन की चाहतों को समझा और एम. ए. करने की इज़ाज़त दे दी. साथ ही आगे और कुछ करने का भी हौसला देते रहे. पर ससुरालवालों की इच्छा का खण्डन न करते हुए मैंने घर को ही अपना कर्मक्षेत्र मान लिया और इसके बाद से वातावरण शांतिमय हो गया था.
कुछ समय बाद हमारे यहां चांद-सी सोनल का जन्म हुआ. वह अपने भोलेपन और सुन्दरता से सबको मुग्ध कर देती. तोतली आवाज़ में कुछ गाती या लड़खड़ाते क़दमों से ठुमके लगाने की कोशिश करती तो पूरा माहौल ही मस्त हो जाता.
“बिटिया, नाच के दिखाओ… सोनू बेटा, वो टीवी वाला गाना सुनाओ.” सबकी आंखों का तारा थी सोनल. मैं उसके प्रति निश्‍चिंत हो गई कि जो कुछ मैं न कर पाई, वो सोनल ज़रूर कर पाएगी. इतने सौहार्दपूर्ण वातावरण में पली-बढ़ी सोनल को किसी प्रकार की कोई रोक-टोक होगी, ये स्वप्न में भी न सोचा था मैंने.
जब पहली बार उस पर रोक लगायी गयी कि वो अपने स्कूल के ‘एन्वल डे’ में हिस्सा नहीं ले सकती, तो मैं आश्‍चर्यचकित रह गई. ‘ये क्या? क्या सोनल पर भी वही रोक-टोक?’ मेरा मन विद्रोह कर उठा. मैं सभी को मनाने लगी. बच्ची की चाहत से अधिक ये मेरा निजी मसला बन गया था. अभिषेक को मनाकर सोनल को स्कूल के हर कार्यक्रम में हिस्सा लेने की इज़ाज़त दिलवाया मैंने. सोनल ने भी मुझे अपने परिश्रम और लगन का फल ट्रॉफी के रूप में दिलाकर आत्मसंतोष का भागीदार बनाया. इसी कारण घर पर भी मुझे कोई कुछ नहीं कह पाया. जब भी कोई ऐसा मौक़ा आता, तो मैं सोनल को इस तरह तैयार कराती जैसे हिस्सा वो नहीं, मैं ले रही हूं. ख़ैर, ज़िंदगी अपनी गति से बढ़ती गई. और फिर नन्हीं मीनल हमारे यहां दुगुनी ख़ुशी लिए आई. उसकी चाहतें भी बिना किसी रोक-टोक के पूरी की गईं और उसके लिए मुझे कोई परिश्रम भी नहीं करना प़ड़ा, जो सोनल के समय करना पड़ा था. जब भी दोनों बच्चों को उनकी क़ामयाबी पर ख़ुश होते देखती, तो लगता जैसे ये मेरी क़ामयाबी है.
हर तरह की आज़ादी जो उन्हें मिलनी चाहिए, वो उन दोनों को देने के बाद मन को एक सच्ची ख़ुशी हासिल होती रही कि मैं एक क़ामयाब मां हूं, जिसने अपने बच्चों को एक स्वच्छन्द वातावरण में जीने का अवसर दिया. पर जब भी मैं अपनी मां से मिलने जाती और अपनी ख़ुशी का इज़हार उनके सामने करती, तो मां की आंखों में ख़ुशी के साथ-साथ आशंका की परछाइयां भी महसूस करती. न जाने ये शंका कैसी थी और क्यों थी? हां, मां कुछ कहती नहीं थी. मेरे ख़याल से मां इसलिए चुप रहती, क्योंकि उनके मन में ये संकोच था कि वे तो मुझे वो ख़ुशियां दिलाने में कभी सफल ही न हो पाईं, जिसकी मैं हक़दार थी.
सोनल कैम्प से लौट आई. सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि एकाएक सोनल ने ये ऐलान कर दिया कि वो अपनी मर्ज़ी से शादी करना चाहती है. वो अपने कॉलेज के एनसीसी गाइड, जो जाति में तो हमसे अलग है, साथ ही उम्र में भी उससे दुगुना बड़ा है, को अपना जीवनसाथी बनाना चाहती है. उसके इस फैसले से घर पर सभी को लगता जैसे ये सब मेरे कारण ही हुआ. ख़ुद अभिषेक ने भी इस बात को लेकर चुप्पी साध ली. और मैं, जो सोनल पर कल तक गर्व किया करती थी, आज उसी के कारण किसी से नज़रें मिलाने के भी क़ाबिल न रही. पहली बार उस पर मुझे ग़ुस्सा आ रहा था. फिर भी मैं उसे समझाने लगी, “ऐसा इसलिए नहीं हो सकता, क्योंकि ये हमारे यहां नहीं हो सकता. ऐसा नहीं है बेटा, बल्कि इसलिए, क्योंकि ये तुम्हारे लिए ही सही नहीं है.” पर सोनल मानने को तैयार न थी. वह अपनी ज़िद पर अड़ी रही. तब मैं उस पर पहली बार बरस पड़ी, “तुम्हें आज़ादी देने का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि तुम अपनी मनमानी करो.” मेरा इतना कहना ही था कि सोनल झट से कह उठी, “मम्मी, आप कब से इतनी नैरो माइण्डेड हो गईं, आप तो ऐसी न थीं!” मेरे पैरों तले जैसे ज़मीं खिसक गई. मुझे आज गहरा धक्का लगा है. मेरी अपनी सोनल ने मुझसे ऐसा कहा! यानी मैं, मेरी मानसिकता संकीर्ण है?
आज वो अपनी आज़ादी चाहती है. जीवन के सबसे अहम् फैसले के लिए? आज मुझसे आधुनिकता की मांग कर रही है मेरी वो बच्ची, जिसे हर क़दम पर, हर मोड़ पर मैंने ही सहारा दिया. आज मैं एकाएक ही तन्हा हो गई हूं. मेरे अन्तर्मन को झकझोरकर रख दिया है उसके इस एक शब्द ‘नैरो माइण्डेड ने.
आज मुझे मां की आंखों की वो शंका समझ में आने लगी है. अभिषेक का कथन कि बच्चों पर कभी-कभार रोकटोक अच्छी होती है, भी सही लगने लगा है. आज मुझे हर दूसरी औरत ज़्यादा ज़िम्मेदार और समझदार मां लगने लगी है. आज मैं ख़ुद को आईने के सामने खड़ा करने का दुःसाहस भी नहीं कर पा रही हूं. मुझे ख़ुद पर ग़ुस्सा आ रहा है. ये मैंने क्या कर दिया? क्या मैं एक कुशल मां नहीं हूं? क्या ममता और स्नेह में बहकर मां का कर्त्तव्य निभाने में कहीं चूक गई मैं? यदि मैं एक कुशल मां होती, तो मेरी अपनी बच्ची आज मुझे प्रश्‍नों के चौराहे पर यूं ला खड़ा न करती. मैंने आज़ादी का ऐसा अर्थ उसे कब समझा दिया कि वो संस्कारों को तोड़कर किसी ऐसे रिश्ते में बंधना चाहती है, जो ना तो समाज को मंजूर है, ना मेरे घरवालों को और न ही ख़ुद मुझे? इन सारे प्रश्‍नों से मैं घिर गई हूं, जिनका उत्तर कदाचित केवल व़क़्त के पास है! या फिर ये ऐसा चौराहा है, जहां खड़ी मैं जीवनभर राह तलाशती रहूंगी.

– तहसीन तरन्नुम

 

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