... सच कहती हूं मम्मी तुम्हारी याद यहां कभी भी मुझको नहीं सताती. तुमने मुझे मेरे डैडी से इतने दिन क्यों अलग रखा?.. पढ़कर उसे पहली बार लगा था कि वह आज लव मैरिज के साथ शुरू हुए ज़िंदगी के समय में पहली बार अपने ही खून से पराजित हुई है. कैसी अजीब पराजय थी यह.
उखड़े-उखड़े मन को उसने एक बार फिर पत्रिका के पन्नों में उलझाना चाहा, पर वह था कि आवारा बादल की तरह नहीं उलझा सो नहीं उलझा.
वैसे तो अभी भी उसको कई निजी संस्थानों ने नौकरी देने का प्रस्ताव किया था, पर वृन्दा ने तय कर लिया था कि अब वह नौकर-चाकर नहीं कहलाएगी किसी की भी. ठीक भी था. कर ली अट्ठावन वर्ष की उम्र तक नौकरी. ले लिया दो वर्ष का एक्सटेंशन भी और अब तो वह साठ पार कर चुकी है, फिर कोई ख़र्च करने की विवशता वाली स्थिति होती तो बात अलग थी. वह बुदबुदाई, "नहीं रे वृन्दा, अब तू किसी भी विवशता के घंटे से क्यों बंधती है? तू आज़ाद रह. बुढ़ापा शांति और चैन से काट.
वह सोचने लगी. अब वह सैर सपाटे पर निकलेगी. किसी शांत पर्वतीय स्थल पर आराम करेगी. यदि उन्हें अवकाश हुआ घर बार से, तो उन्हें भी ले लेगी. नहीं हुआ, तो गुरुदेव का 'एकला चलो रे...' पढ़ा हुआ किस काम आएगा और वह यह सोच कर मन ही मन भावुक हो उठी.
तभी हवा का एक झोंका आया. उसके कपोलों से अठखेलियां करता और खिड़की में रखा इला
का कनाडा से आया ख़त नीचे गिर गया. किसी शांत जगह पर सोचते-विचारते, उसका मन उसी ख़त की इबारत में उलझ गया. लिखा था- सच कहती हूं, ममा, यहां पर लंबा-चौड़ा बंगला है एकदम नीट और क्लीन काफ़ी बड़ा मौसमी फलों का गार्डन है. लंबे-लंबे क्लिप्टस हैं. सेब, अंजीर, शहतूत और न जाने क्या क्या पेड़ हैं! एक छोटा सा स्वीमिंग पूल भी है ममा. कभी तुम आओ तो..."
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और इन्हीं पंक्तियों के साथ उसे अपनी बेबी पिंकी की, जो इला चौधरी हो गई थी. बहुत याद आने लगी. वह उंगलियों पर हिसाब लगाती रही. पूरे आठ बरस बीत चुके थे उसे देखे. वह फिर अपने आप से कह उठी, "वृन्दा अब तो तू भी इला के पास ही उड चल. यहां तेरा अपना कहलाने वाला एक ही तो है. एक नहीं एक बटा दो है. वह तो एक हां, आधा ही तो है. उसके पति पर तो पार्वती का भी आधा हक़ है."
कुछ रुक कर फिर वह आकूल-व्याकुल हो उठी-"हां, फिर भी वह अब इला कपिल के साथ ही कुछ अर्सा बिताएगी, पर तभी जब कपिल मुनहार कर कहेगा, "अरे ममा, वहां इंडिया में क्या धरा है? बस आप तो यही रहिए न हमारे पास ही. नन्हा रिक भी नानी को पाकर मस्त हो उठेगा, "नहीं, आप इंडिया नहीं जाएंगी अब."
दामाद, बिटिया और नाती की याद आते ही उनके हृदय में दबी वात्सल्य की भावनाएं उभर उठी. वह उसमें डूबने उतराने लगी थीं. एक-एक करके अतीत के कई कतरे उससे आंखें चार करते आते गए, जाते गए.
यह स्थिति उद्घोषित की थी, "मैं कल अदालत में सुधेश के साथ लव मैरिज कर रही हूं."
"अरी, पागल हो गई है."
"क्या वृन्दा! क्या इसी दिन के लिए पेट काट-काट कर पढ़ाया था हमने? वह एक रखैल को पहले ही घर में बैठाए है. तुझे वह क्या देगा? भंवरा है वह तो. कली का रस चूस कर फिर किसी फल पर जा बैठेगा."
उमा चाची ने कई बार फटकारने के बाद अंततः समझाने के मूड में कहा था. शुभा, नूतन और सुप्रिया जैसी सहेलियों ने भी आगाह किया था कि यह शादी कहीं बर्बादी का आलम लेकर न आ जाए तुम्हारे जीवन में... और तब उसे अपनी कही वह इबारत याद आग गई, "मैं कोई अंगूठा छाप हिंदुस्तानी लड़की नहीं हूं. जो भी कदम उठा रही हूं ख़ूब सोच-समझकर ही उठा रही हूं. सुधेश में मैंने अपने सपनों का राजकुमार पाया है. उसमें मुझे अपना पति परमेश्वर नज़र आता है. दूसरा कोई भी उसका स्थान ले ही कहीं पाएगा? जो भी मेरे इस इरादे से टकराएगा चूर चूर हो जएगा."
वह सचमुच ही कर गुज़री अपनी मन की. घर वालों ने आसमान सिर पर उठा लिया था. मृणाल दी के अलावा सभी ने उससे सबंध तोड़ लिए थे. हर किसी को उसका यह निर्णय अखर रहा था. ख़ास कर सुधेश के पास एक अदद पत्नी पहले ही थी तो फिर क्यों कर वृन्दा उसी पर लट्टू हो रही है. उसे याद आया मृणाल'दी ने उसे पत्रों के ज़रिए भी परामर्श दिया था, "वृन्दा, यह ज़िंदगी अजीब क़िस्म का सफ़र है. इसमें भावुक जज़्बातों के सहारे नहीं जिया जा सकता है, फिर तुम तो पढ़ी लिखी हो, सुन्दर हो. अभी कुछ नहीं बिगड़ा है, सिर्फ़ तलाक़ ही तो लेना होगा. उसके लिए ग्राउंड भी मौजूद है."
और उसे सुधेश का ही एक दिन का वह भावुकता भरा क्षण भी याद हो आया. उस दिन वह कह उठा था, "वृन्दा, कहीं ऐसा न हो कि भावुकता के क्षणों में लिया तुम्हारा यह निर्णय तुम्हारे अपने लिए ही नासूर बन कर सारी उम्र बहता रहे. मैंने स्थिति का कोई भी पहलू तुमसे नहीं छिपाया है." "अरे, तो कौन सोचता है ऐसा? क्या तुम्हें, तुम्हारे आंगन में उगी नई वृन्दा पर इतना भरोसा नहीं है?" तभी तप्त होंठों पर सुधेश ने हथेली रख दी थी उसके, फिर कभी उन्होंने, दुनिया क्या कर रही है उस तरफ़ सोचा ही नहीं. दोनों अपने नीड़ में मस्त थे.
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फिल्म की रील की तरह वृन्दा अपने अतीत के कई दृश्य देखती रही. पिंकी पूछ उठी थी, "ममा, सबके पापा तो उनके घर ही रहते हैं. मेरे पापा ही क्यों दूसरे शहर में रहते हैं?"
"बेटे, तेरे पापा को वहां काम ज़्यादा रहता है, फिर नौकरी कोई भाई बन्दी तो है नहीं? मेरी भी सर्विस है इसलिए..."
"तो आप ही नौकरी क्यों नहीं छोड़ देतीं?"
वह अक्सर ऐसे सवाल जवाब के दौरान कह उठती. जब वह कभी-कभी ऐसे क्षणों में से अपनी मम्मी को घूरती, तो वृन्दा को लगता उसके भीतर कुछ पिघलता रहा है. ऐसे कितनी ही बार इसी तरह के प्रश्न शूलों से जूझते जूझते वह जब व्यथित हो उठी, तो एक दिन उसने बड़ी समझदारी से पिंकी को सुधेश और उसकी पत्नी के बारे में बतला दिया. फिर उसके चेहरे पर नज़रें गड़ाई वृन्दा चमक उठी थी. उसे लगता था, जैसे पिंकी की किशोर वय चढ़ती आंखें कह रही हो, "हम तो पहले ही जानते थे मम्मी कि आपने प्रेम के लिए कुर्बानी की है." वृन्दा को वे दिन भी याद हो आए कि कैसे इस संवाद के बाद पिंकी खोई-खोई सी रहने लगी थी. कैसे उसकी शोखी, उसकी चंचलता उसकी उत्सुकता उससे कतराती चली जा रही थी. वह उन्हीं दृश्यों में खोई रही.
तभी उसे ध्यान आया, वह क्षण भी जब सुधेश ने ही उसको यह कहा था, "वृन्दा, पिंकी ने अब बी.ए. कर लिया है. एम.ए. में मैं उसे वहीं एडमीशन दिला रहा हूं. फिर इसकी शादी के लिए भी तो प्रयत्न करना ही होगा. अभी ढूंढूंगा तो कोई अच्छा सा पंछी पकड़ में आएगा.'
सुनकर तब पहली बार वृन्दा को अपने हमदम में एक ज़िम्मेदार पिता का रूप नज़र आया था. उसने इतना ज़रूर कहा था कि, "कहीं तुम्हारी श्रीमती जी को बुरा लगा तो."
"नहीं-नहीं. तुम तो वृन्दा, उससे मिली ही हो कई बार. उसी के प्रस्ताव पर और आलोक आनंद की दीदी के साथ रहने की बलवती इच्छा को देखकर मैंने सोचा कि ऐसा कर लूं. तुम्हें कुछ अखरेगा ज़रूर एकाकी रहना, पर बेटी के भविष्य के लिए..." सुधेश ने कहा था और वह प्रस्ताव के पक्ष विपक्ष में कुछ न कहकर, मां क्यों आड़े आएगी बेटी के भविष्य के लिए, सोचती चुप रह गई थी. पिंकी के पत्रों ने उसकी थोड़ी बहुत रही शंकाओं को समाप्त कर दिया था.
अक्सर उसके हर पत्र में लिखा होता-
मम्मी मेरी असली मां तो अब मिली है शायद मुझे. हाय कितनी स्वीट मदर है यह, और डैडी उनके क्या कहने. आनन्द व आलोक जैसे भाई किसकी क़िस्मत में है? सच मम्मी मदर मुझको ज़रा भी नहीं डांटती. और कॉलेज भी क्या शानदार है यहां का. सच कहती हूं मम्मी तुम्हारी याद यहां कभी भी मुझको नहीं सताती. तुमने मुझे मेरे डैडी से इतने दिन क्यों अलग रखा?.. पढ़कर उसे पहली बार लगा था कि वह आज लव मैरिज के साथ शुरू हुए ज़िन्दगी के समय में पहली बार अपने ही खून से पराजित हुई है. कैसी अजीब पराजय थी यह.
अतीत की इन्हीं स्मृतियों में उलझते-उलझते उसे लगा था कि पानी की प्यास लग रही है. पानी पीकर फिर उन्हीं स्मृतियों में खो गई. उसे याद हो आया सुधेश की पत्नी का वह प्यारा सा ख़त. कितना सरप्राइज़ दिया था उसकी प्रतिद्वन्द्वी ने. लिखा था-
वृन्दा जी. पिंकी की मैरिज तय हो चुकी है. लड़का कनाडा की एक फर्म में चीफ एक्ज़ीक्यूटिव है. पिंकी ने उसे और उसने पिंकी को पसंद कर लिया है. जल्दी थी इसलिए सगाई का दस्तूर भेज दिया है. लडका चट मंगनी पट ब्याह चाहता है सो तारीख़ भी तय कर दी है." और निमंत्रण पत्र भी साथ देखकर वृन्दा चौंक उठी थी. आगे का पत्र उसने पढ़ा ही नहीं था. सुधेश पर उसे प्यार कम ग़ुस्सा अधिक आ रहा था. पिंकी की शादी की उसे ख़बर तक नहीं. कार्ड में उसका नाम नहीं.
खैर, उसे ध्यान आया कि कैसे वह मेहमानों की तरह ऐन वक़्त पर पहुंच पाई थी. सुधेश और उनकी पत्नी ही सब कुछ कर रहे थे. उन्होंने कन्यादान किया तो वृन्दा के पूरे तनबदन में आग लग गई थी. किसी की आवाज़ आई थी उसके कानों में, "अरे यही है सुधेश बाबू की गृहस्थी में आग लगाने वाली चुड़ैल."
तो वह पूरी तरह हिल उठी थी... और उसे याद हो आया पिंकी का वह बिदाई वाला क्षण, वह बोली थी, "मम्मी, कपिल आपको कैसा लगा? ख़ैर, पापा और आप जितनी प्रगतिशील तो मैं हो नहीं पाई. मदर अपने आंगन में ही पाणिग्रहण संस्कार करके विदा कराना चाहती हैं तो क्यों न करूं, आपको अखरा तो नहीं न! मेरा यह निर्णय सच कहती हूं मम्मी. मैंने सोचा आदमी को अपनी औकात, अपनी संस्कृति, अपना पारिवारिक परिवेश आदि को नहीं भूलना चाहिए. सौ मैंने ग़लत तो नहीं किया न मम्मी!"
... और उसे लगा था कि आज फिर वह पिंकी के हाथों ही ज़िदगी के समर में दूसरी बार पराजिता ठहरा दी गई है. अंदर तक वह धधक उठी थी पर लोक लाजवश बेटी दामाद को बिदा देकर उसी दिन बिना किसी से कुछ कहे वह लौट आई थी.
समय की धार उसी रफ़्तार से बहती रही. वह भी उस धार में अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखती बहती रही. पहली बार उसको लगा था कि लव मैरिज करके उसने ग़लती की थी. यदि ऐसा नहीं था तो सुधेश की उससे पिंकी के संबंध तय करने से लेकर विदाई तक के काम में उसी को महत्व देना था, परन्तु अपमान के इस घूंट को भी पीकर वह चुप रह गई थी.
इधर रिटायरमेन्ट के बाद उन्होंने चाहा था कि कम से कम सुधेश अब तो उनके पास सिर्फ़ उनका ही होकर रहे. पर उसका उत्तर जो आया था वह उन्हें अपने फ़ैसले की खिल्लियां उड़ाता ही नज़र आया. लिखा था-
अब तुम भी वृन्दा उसी तितली जैसा व्यवहार चाहती हो. अरे अब तो बुढ़ापा आ गया. अक्तो राम नाम जपो, किसी दिन दरवाज़े पर राम राम सत्य है कहने वालों को भी, जुटाने का वक़्त आ गया. मैं अब तुम्हारे पास आकर लोगों को गड़े मुर्दे उखाड़ने का मौक़ा शायद ही दे पाऊं. फिर आलोक आनन्द की बहुएं क्या कहेंगी."
उसके तन बदन में आग लग गई थी. इसी पत्र के साथ उसका पत्र भी आया था. उस पत्र की इबारतें पढ़कर उसे लगा था कि आग में घृत डाल दिया है उसके अपने खून ने.
लिखा था-
"ममा! मदर और फादर ही नहीं, आलोक, आनन्द और उनकी बहुएं भी सभी हमारे यहां आ रहे हैं. मैंने तो आपका दिया नाम पिंकी तक उखाड़ फेंका है अपने जिस्म से. अब मैं इला हूं कपिल की इला. परसों कपिल ने उनके हवाई टिकट भेज दिए हैं. अपने पूरे परिवार को यहां देखकर मेरा मन मस्त हो जाएगा. ममा. आपका रुख तो मेरे प्रति शुरू से ही अजीब था. आपने कितना बोर किया था हमको. सब कुछ बतलाने की बजाय आप मुझे फादर के बारे में उल्टा सीधा बताती रही थीं. इधर कपिल काफ़ी व्यस्त रहते हैं.
वहां उसका आना तो हो नहीं पाया, अभी तक भी. अब वह या वे सब यहां आ ही रहे हैं तो बड़ा मज़ा आएगा. आप भी अच्छी होंगी ही. कपिल भी आपको नमस्ते लिखवा रहे हैं. कभी कुशल का पत्र दिया करो ममा.
उसे लगा था उसके खून ने या सुधेश की पत्नी ने जाने किसने उसे जीवन संग्राम के समर में तीसरी बार मात दी थी.
... और वह चीख उठी.
नहीं नहीं. वह कहीं नहीं जाएगी. कनाडा बनाडा... लव मैरिज करके वृन्दा ने कोई ग़लती नहीं की थी. अपने ही खून से अपनी कोख जई बेटी से मात खाकर आहत ज़रूर हई है, पर अब चौथी बार मात खाने की ग़लती वह नहीं करेगी. आज पहली बार उसको लग रहा था कि उसको अपना एकाकीपन समाप्त करने के लिए कुछ सक्रिय बने रहना चाहिए, अन्यथा अतीत के ऐसे कितने ही बिंब उसको बारं बार परेशान करते ही रहेंगे.
- विनय कुमार
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