पहला अफेयर: वो लूनावाली लड़की (Pahla Affair: Wo Loonawali Ladki)

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पहला अफेयर: वो लूनावाली लड़की (Pahla Affair: Wo Loonawali Ladki)

आज भी याद है वो 27 साल पहले की दोपहर, जब बड़ी दीदी अचानक ही घर आईं और आते ही बोलीं, “चल राजेश, तेरे लिए किसी ने एक बहुत ही अच्छी लड़की सुझाई है. पास ही के एक स्कूल में पढ़ाती है. चलकर देख आते हैं.”

मेरी पढ़ाई हाल ही में पूरी हुई थी और मैं शिक्षा के क्षेत्र में पैर जमाने की कोशिश में था. अभी दो-चार साल तक तो मैं शादी करने के मूड़ में ही नहीं था, तो मैंने दीदी को टालने की कोशिश की, “क्या दीदी, आप भी. अच्छा लगता है क्या किसी लड़की के स्कूल में जाकर इस तरह से शादी के हिसाब से उसे देखना. क्यों स्टूडेंट्स के सामने उसका तमाशा बनाना.”

लेकिन दीदी भला कहां माननेवाली थीं. तुरंत ही बोल पड़ीं, “अरे, किसी के एडमिशन के बहाने जाकर देख आएंगे. उसे तो पता भी नहीं चलेगा कि हम उसे देखने आए हैं.”

“ऐसा ही है, तो क्यों न बाद में जाकर उसके घर पर ही देख आएं.” मैंने फिर टालने की कोशिश की.

“घर जाकर देखने पर तो हमारी मंशा स्पष्ट हो जाएगी और अगर लड़की पसंद न आई, तो उसे मना करने पर उसका दिल भी बहुत आहत होगा. इससे तो अच्छा है चुपचाप देख आते हैं. पसंद आई, तो घर जाकर बात कर लेंगे.” दीदी ने सुझाया.

उनके तर्क के आगे मैं कुछ न कह सका और मुझे उनके साथ जाना ही पड़ा. स्कूल पहुंचकर दीदी ने कहा, “मैं पता लगाती हूं कि प्रिया किस क्लास में पढ़ा रही होगी, तब तक तू बाइक पार्क करके आ.”

मैंने उन्हें स्कूल की इमारत के सामने उतारा और पार्किंग स्पेस में चला गया. दो मिनट बाद ही स्कूल की मुख्य इमारत से एक युवती बाहर आई. कुछ क्षणों तक वह खड़ी होकर अपने पर्स में कुछ टटोलती रही, फिर उसने चाबी निकाली और आगे बढ़ गई. न जाने उसके नमकीन चेहरे में क्या आकर्षण था, मैं अपनी सुध-बुध खोकर उसे ही एकटक निहारे जा रहा था.

सीधी-सादी-सी, मासूम-सी थी वो. आगे बढ़कर उसने अपनी लूना निकाली और स्टार्ट करके निकल पड़ी. बस, 5-7 मिनट तक उसका दीदार हुआ होगा, लेकिन इस बीच जो कुछ भी मेरे दिल में हुआ, वो बस मैं ही जानता हूं. शायद इसे ही कहते हैं पहली नज़र का प्यार! मैंने मन ही मन तय कर लिया कि शादी करूंगा, तो इसी लूनावाली लड़की से, वरना किसी से नहीं.

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तभी दीदी आईं, तो उनके सामने मैंने अपने दिल का हाल बयां कर दिया, ताकि वो मुझे लड़की देखने के लिए फोर्स न करें. दीदी हैरान थीं कि कहां तो मैं लड़की देखने के लिए इतनी आनाकानी कर रहा था और कहां मुझे 5 मिनट में प्यार हो गया. वो बोलीं, “कौन थी, कहां से आई थी, न उसकी

जात-पात का पता, न परिवार का. यह कैसी ज़िद है तेरी? और अगर वो शादीशुदा हुई तो?”

पर मैं तो अपनी ज़िद पर अड़ा हुआ था. मेरी हालत देख, दीदी ने सोचा कुछ तो करना होगा. वहीं ग्राउंड पर कुछ स्टूडेंट्स खेल रहे थे, दीदी ने उनसे पूछताछ की कि अभी-अभी जो नीली लूना पर गई थी, वो कौन थी? ज़्यादातर बच्चों ने तो देखा ही नहीं था, लेकिन एक छात्रा ने कहा, “वो तो दुबे मैडम थीं, प्रिया दुबे.”

दीदी ने राहत की सांस ली. “ओह, तो ये वही लड़की थी, जिसे हम देखने आए थे. ले, तू तो अभी से दीवाना हो गया. ये अनोखी अरेंज मैरिज होगी.”

फिर तो दीदी और घरवालों ने मुझे जमकर चिढ़ाया. मैंने दीदी से मिन्नत की कि जल्दी से लूनावाली लड़की के घर जाकर बात पक्की कर दो. दीदी ने सब कुछ तय कर दिया.

शादी के लिए 3 महीने इंतज़ार का समय भी मैंने बड़ी बेसब्री से बिताया. सचमुच मेरा पहला प्यार एकदम अनोखा था. आज भी वो नीली लूना हमने संभालकर रखी है. जब भी उसे देखता हूं, अपनी पहली नज़र के प्यार की यादें ताज़ा हो जाती हैं.

– डॉ. विनीता राहुरीकर

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