Editor’s Note - Editorial

Editorial याद है मुझे वो शबनमी रात, जब चांद शरमाया था तुम्हारे रूप को देखकर. फ़िज़ाओं में संगीत बिखरा था तुम्हारी हंसी के साथ, तुम्हारे ख़ामोश लबों से जब अल्फ़ाज़ मोती बनकर बिखरे थे... तुम्हारी संदली ख़ुशबू सांसों को महका गई थी और तुम्हारे साथ उम्र गुज़ारने की ख़्वाहिश इस दिल का अरमान बन गई. आज भी उसी राह पर तुम्हारे हुस्न को सजदा करने बैठे हैं हम.

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